कुप्रबंधन का 'अड्डा' बना दून मेडिकल कॉलेज, छात्रों को मिल रहा कीड़े वाला खाना
दून मेडिकल कॉलेज कुप्रबंधन, रैगिंग और सांप्रदायिक विवादों का अड्डा बन गया है, जहां छात्रों को कीड़े वाला भोजन मिल रहा है और मैस ठेकेदार का 80 लाख बकाय ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अंकुर अग्रवाल, देहरादून । उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था का 'चेहरा' कहे जाने वाले राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में हालात अब इतने बिगड़ चुके हैं कि यह संस्थान मेडिकल शिक्षा का केंद्र कम और विवादों का स्थायी अड्डा ज्यादा नजर आने लगा है। यहां रैगिंग 'रुटीन' बन चुकी है।
प्रशासनिक अव्यवस्था चरम पर है, धार्मिक विवाद कैंपस तक पहुंच चुके हैं और अब छात्रों को कीड़े वाला भोजन परोसने का मामला सामने आया है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि छात्रों से मैस फीस लेने के बावजूद ठेकेदार को भुगतान तक नहीं किया गया। प्रदेश की राजधानी के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज की यह तस्वीर सिर्फ एक संस्थान की बदहाली नहीं, बल्कि पूरे सरकारी मेडिकल सिस्टम की सड़ांध को उजागर करती है।
छात्रों की थाली में कीड़े, अफसरों की चुप्पी
ताजा विवाद ने कॉलेज प्रशासन की संवेदनहीनता की पोल खोल दी है। हास्टल में रहने वाले छात्रों ने भोजन में कीड़े मिलने और खाने की गुणवत्ता बेहद खराब होने की शिकायतें उठाईं।
इंटरनेट मीडिया पर तस्वीरें प्रसारित हुईं, लेकिन सिस्टम की तरफ से वही पुराना जवाब 'जांच कराएंगे।' लेकिन असली विस्फोट तब हुआ, जब मैस ठेकेदार ने छह माह का लगभग 80 लाख रुपये भुगतान बकाया होने का आरोप लगाते हुए शुक्रवार से भोजन आपूर्ति बंद कर दी। सवाल सीधा है कि जब छात्रों से नियमित फीस वसूली गई, तो पैसा गया कहां?
रैगिंग का गढ़ बनता जा रहा मेडिकल कॉलेज
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में रैगिंग की घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं। जूनियर छात्रों के मानसिक उत्पीड़न और डर के माहौल की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।
एंटी रैगिंग कमेटियां सिर्फ कागजों में सक्रिय दिखीं, जबकि कैंपस में सीनियरों की दबंगई का माहौल बना रहा। मेडिकल जैसे संवेदनशील प्रोफेशन में जहां संवेदनशीलता सिखाई जानी चाहिए, वहां छात्रों को अपमान और भय का 'कल्चर' दिया जा रहा है। कई छात्र खुलकर बोलने से भी डरते हैं, क्योंकि उन्हें कार्रवाई से ज्यादा प्रताड़ना का भय रहता है।
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कॉलेज में घुस गया सांप्रदायिक जहर
कुछ हफ्ते पहले पैथोलाजी विभाग की विभागाध्यक्ष पर महिला कर्मचारी को पूजा-पाठ से रोकने के आरोप लगे। मामला देखते ही देखते सांप्रदायिक विवाद में बदल गया। कुछ हिंदू संगठनों ने कॉलेज परिसर में हंगामा किया, नारेबाजी हुई और माहौल तनावपूर्ण हो गया।
सवाल यह है कि एक मेडिकल संस्थान, जहां इलाज और शिक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, वहां धार्मिक विवादों की नौबत क्यों आई? क्या प्रशासन ने समय रहते स्थिति संभालने की कोशिश की? या हमेशा की तरह विवाद बढ़ने का इंतजार किया गया।
मेडिकल कॉलेज या अव्यवस्थाओं की प्रयोगशाला
दून मेडिकल कॉलेज अब उत्तराखंड की स्वास्थ्य शिक्षा का माडल नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही का केस स्टडी बनता जा रहा है। सवाल केवल कीड़े वाले भोजन या 80 लाख के बकाये का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या सरकार राजधानी के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान को बचाने के लिए कभी सर्जिकल स्ट्राइक करेगी या भविष्य के डाक्टर यूं ही सड़े सिस्टम के बीच तैयार होते रहेंगे।
बड़ा सवाल- जिम्मेदार कौन?
हर विवाद के बाद जांच बैठती है। बयान जारी होते हैं। कुछ दिनों बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। लेकिन कभी किसी बड़े अधिकारी की जवाबदेही तय नहीं होती। यही कारण है कि दून मेडिकल कॉलेज में अव्यवस्था अब 'सिस्टम' बन चुकी है। जो छात्र दिन-रात मरीजों की जिंदगी बचाने को लेकर पढ़ाई कर रहे हैं, वे खुद बुनियादी सुविधाओं, सम्मानजनक माहौल व साफ भोजन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इससे बड़ा प्रशासनिक दिवालियापन और क्या होगा।