हिमालयी ग्लेशियरों पर चरम मौसम का प्रभाव: आईआईटी इंदौर के अध्ययन ने चौंकाया
आईआईटी इंदौर के एक अध्ययन से पता चला है कि हिमालयी ग्लेशियरों पर चरम मौसमी घटनाओं, जैसे हीटवेव और भारी बर्फबारी, का गहरा असर हो रहा है।

ग्लेशियर

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जागरण संवाददाता, देहरादून। हिमालयी क्षेत्रों में अल्पकालिक लेकिन अत्यधिक तीव्र मौसमीय घटनाएं, जैसे भीषण हीटवेव और अचानक भारी बर्फबारी ग्लेशियरों के स्वास्थ्य और उनके पिघलने की गति को गहराई से प्रभावित कर रही हैं।
विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्रायोस्फीयर (बर्फीला तंत्र) पहले से अधिक संवेदनशील होता जा रहा है और अब साल-दर-साल ग्लेशियरों के व्यवहार में चरम मौसम की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।
यह निष्कर्ष आइआइटी इंदौर के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए एक नए अध्ययन में निकाला गया है। जिसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन में पश्चिमी हिमालय के सबसे अधिक निगरानी किए जाने वाले ग्लेशियरों में शामिल छोटा शिगरी का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
शोधकर्ताओं हिमांशु कौशिक, मोहम्मद आज़म और मोहम्मद आरिफ हुसैन ने मौसम के लिहाज से दो बिल्कुल विपरीत वर्षों 2021-22 और 2022-23 का तुलनात्मक अध्ययन कर यह दिखाया कि ग्लेशियर मौसमी चरम घटनाओं के प्रति कितने संवेदनशील हो चुके हैं।
वर्ष 2021-22 में भीषण हीटवेव ने बढ़ाई बर्फ पिघलने की रफ्तार
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2021-22 के दौरान छोटा शिगरी ग्लेशियर ने अपने रिकार्ड का ''सबसे नकारात्मक मास बैलेंस'' दर्ज किया। इसका मुख्य कारण क्षेत्र में पड़ी तीव्र गर्मी की लहरें थीं, जिन्होंने बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को तेज कर दिया।
विज्ञानियों ने पाया कि असामान्य रूप से गर्म वसंत ऋतु के कारण ग्लेशियर की ऊपरी सफेद बर्फ जल्दी पिघल गई और नीचे मौजूद गहरी रंगत वाली बर्फ सतह पर आ गई। गहरे रंग की सतह सूर्य की अधिक ऊष्मा अवशोषित करती है, जिससे गर्मियों में पिघलने की गति और तेज हो गई।
वर्ष 2022-23 में भारी गर्मी के बीच अचानक बर्फबारी ने बदली तस्वीर
इसके ठीक विपरीत, अगले वर्ष परिस्थितियां नाटकीय रूप से बदल गईं। जुलाई 2023 में ग्लेशियर क्षेत्र में असामान्य रूप से भारी ग्रीष्मकालीन हिमपात हुआ। अध्ययन के अनुसार आठ से 10 जुलाई 2023 के बीच 300 मिमी से अधिक बर्फबारी दर्ज की गई।
इस ताजा बर्फ ने ग्लेशियर की सतह को फिर से उजला बना दिया, जिससे उसकी परावर्तन क्षमता (अल्बीडो) बढ़ गई और सूर्य की गर्मी कम अवशोषित हुई। परिणामस्वरूप बर्फ पिघलने की दर धीमी पड़ गई।
इसी कारण वर्ष 2022-23 में ग्लेशियर ने हल्का सकारात्मक वार्षिक मास बैलेंस दर्ज किया, जबकि वैश्विक स्तर पर 2023 अब तक का सबसे गर्म वर्ष माना गया।
अध्ययन में बताया गया कि छह से 24 जुलाई 2023 के बीच ग्लेशियर ने लगभग 250 मिमी जल-समतुल्य द्रव्यमान प्राप्त किया, जबकि इसी अवधि में 2022 में उसे 532 मिमी जल-समतुल्य द्रव्यमान का नुकसान हुआ था।
मलबे से ढके हिस्सों में भी घटी पिघलने की दर
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि ग्लेशियर के उन हिस्सों में, जो पत्थरों और मलबे से ढके हुए थे, बर्फ पिघलने की दर वर्ष 2023 के हिमपात वाले वर्ष में 2021-22 की हीटवेव अवधि की तुलना में लगभग 45 से 50 प्रतिशत तक कम रही।
वैज्ञानिकों की चेतावनी, इसे ग्लेशियरों की वापसी न समझें
हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि ऐसी एक-दो घटनाओं को ग्लेशियरों की ''रिकवरी'' नहीं माना जाना चाहिए। विज्ञानियों के अनुसार वर्ष 2021-22 और 2022-23 जैसे विपरीत वर्ष यह दिखाते हैं कि लगातार बढ़ते तापमान के बीच चरम मौसमीय घटनाओं का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।
सकारात्मक मास बैलेंस वाले वर्ष दीर्घकालिक गिरावट के बीच केवल अस्थायी उतार-चढ़ाव हैं, इन्हें जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
दीर्घकालिक रुझान अब भी चिंताजनक
दीर्घकालिक आंकड़े बताते हैं कि छोटा शिगरी ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहा है। अध्ययन के मुताबिक यह ग्लेशियर औसतन हर वर्ष लगभग 0.47 मीटर जल-समतुल्य द्रव्यमान खो रहा है। यह प्रवृत्ति पूरे हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों को दर्शाती है।
तापमान बढ़ने पर और ज्यादा बर्फबारी की होगी जरूरत
अध्ययन में भविष्य को लेकर भी गंभीर चेतावनी दी गई है। विज्ञानियों के अनुसार यदि वार्षिक तापमान में हर 01 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो ग्लेशियर को स्थिर बनाए रखने के लिए लगभग 80 मिमी अतिरिक्त ग्रीष्मकालीन बर्फबारी की आवश्यकता पड़ेगी।
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