भारत ने बाघ संरक्षण में रचा नया इतिहास: दुनिया के 70% बाघ देश में, सरिस्का और पन्ना बने वैश्विक मॉडल
भारत ने बाघ संरक्षण में नया इतिहास रचा है, जहाँ दुनिया के 70% बाघ अब देश में हैं। सरिस्का और पन्ना जैसे मॉडल वैश्विक स्तर पर सफल रहे हैं। ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर।
HighLights
भारत में अब दुनिया के 70% जंगली बाघ मौजूद
सरिस्का और पन्ना बाघ पुनर्स्थापना के सफल वैश्विक मॉडल
भविष्य में वैज्ञानिक प्रबंधन व मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व पर जोर
जागरण संवाददाता, देहरादून। भारत ने बाघ संरक्षण के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। एक समय जिन जंगलों से बाघ पूरी तरह समाप्त हो चुके थे, वहां आज फिर उनकी दहाड़ गूंज रही है।
इसके साथ ही देश अब बाघ संरक्षण के अगले चरण में प्रवेश कर चुका है, जहां लक्ष्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि पूरे वन परिदृश्य, वन्यजीव गलियारों, आनुवंशिक विविधता और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व को वैज्ञानिक आधार पर मजबूत करना है।
राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघ पुनर्स्थापना अभियान की शुरुआत के 18वें वर्ष के अवसर पर आयोजित विशेष कार्यक्रम में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने "भारत में बाघों की पुनर्स्थापना एवं आबादी पुनर्जीवन" तथा "भारत में बाघों के सक्रिय प्रबंधन का रोडमैप" शीर्षक से दो महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रिपोर्ट जारी कीं।
सरिस्का को इसलिए चुना गया क्योंकि 28 जून 2008 को यहीं दुनिया की पहली सफल वैज्ञानिक बाघ पुनर्स्थापना परियोजना शुरू हुई थी, जिसने भारत को वैश्विक स्तर पर बाघ संरक्षण का अग्रणी देश बना दिया।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), देहरादून की ओर से तैयार इन रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2022 तक भारत में 3,682 जंगली बाघ दर्ज किए गए, जो दुनिया की कुल जंगली बाघ आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हैं।
वर्ष 1973 में जहां देश में केवल 9 टाइगर रिजर्व थे, वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 58 हो चुकी है, जो लगभग 85 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं।
कार्यक्रम में राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा, भारतीय वन्यजीव संस्थान (देहरादून) के निदेशक डॉ. रमेश सी. वाधवा, संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं बाघ विशेषज्ञ डॉ. बिलाल हबीब, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न राज्यों के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव), क्षेत्र निदेशक और देशभर के वन्यजीव विशेषज्ञ मौजूद रहे।
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बाघों की पुनर्स्थापना का सफर
- टाइगर रिजर्व-शुरुआत- वर्तमान बाघ संख्या
- सरिस्का (राजस्थान)- 2008- 56
- पन्ना (मध्य प्रदेश)- 2009- 88
- संजय-डुबरी- 2013- 24
- मुकुंदरा हिल्स- 2018- 7
- सतकोसिया- 2018- 0
- वीरांगना दुर्गावती- 2018- 30
- राजाजी (उत्तराखंड)- 2020- 5
- रामगढ़ विषधारी- 2022- 8
- नवेगांव-नागजीरा- 2023- 23
- माधव राष्ट्रीय उद्यान- 2023- 8
- सिमलीपाल- 2024- 32
- सह्याद्री-2025- 7
यह है बाघ पुनर्स्थापना
बाघ पुनर्स्थापना केवल एक जंगल से दूसरे जंगल में बाघ छोड़ देने की प्रक्रिया नहीं है। यह कई वर्षों तक चलने वाली वैज्ञानिक योजना है। पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि संबंधित जंगल में पर्याप्त वन क्षेत्र, पानी, शिकार प्रजातियां और सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध हो।
इसके बाद अवैध शिकार, जंगलों के क्षरण और अन्य कारणों को दूर किया जाता है। जरूरत पड़ने पर चीतल, सांभर, नीलगाय और जंगली सूअर जैसी शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाई जाती है।
फिर मजबूत बाघ आबादी वाले क्षेत्रों से आनुवंशिक रूप से उपयुक्त बाघों का चयन कर उन्हें नए जंगल में छोड़ा जाता है तथा रेडियो कॉलर, कैमरा ट्रैप और वैश्विक स्थान निर्धारण प्रणाली की सहायता से वर्षों तक उनकी निगरानी की जाती है।
अंतिम उद्देश्य ऐसी स्वावलंबी बाघ आबादी तैयार करना होता है जो बिना मानव सहायता के प्राकृतिक रूप से बढ़ती रहे।
सरिस्का और पन्ना बने दुनिया के माडल
राजस्थान का सरिस्का टाइगर रिजर्व दुनिया का पहला सफल उदाहरण है, जहां पूरी तरह समाप्त हो चुकी बाघ आबादी को दोबारा बसाया गया।
वर्ष 2005 तक यहां सभी बाघ शिकारियों के कारण खत्म हो चुके थे। 28 जून 2008 को रणथंभौर से पहला बाघ यहां लाया गया और आज यहां 56 बाघ मौजूद हैं।
इसी प्रकार मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व में वर्ष 2009 तक प्रजनन करने वाले सभी बाघ समाप्त हो चुके थे।
कान्हा, बांधवगढ़ और पेंच से लाए गए बाघों के आधार पर यहां नई आबादी विकसित की गई और वर्तमान में यहां 88 बाघ हैं।
दोनों परियोजनाओं ने साबित किया कि यदि वैज्ञानिक योजना, मजबूत सुरक्षा, पर्याप्त शिकार आधार और स्थानीय समुदाय का सहयोग मिले तो समाप्त हो चुकी बाघ आबादी को भी सफलतापूर्वक पुनर्जीवित किया जा सकता है।
उत्तराखंड के लिए भी बड़ी उपलब्धि
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 में राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी हिस्से में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से 2 नर और 3 मादा, कुल 5 बाघ लाकर आबादी को मजबूत किया गया।
इसका उद्देश्य आनुवंशिक विविधता बढ़ाना और भविष्य में प्राकृतिक प्रजनन को प्रोत्साहित करना है। साथ ही देहरादून-राजाजी-कार्बेट-रामनगर-पीलीभीत-दुधवा वन परिदृश्य को उत्तर भारत का सबसे महत्वपूर्ण बाघ क्षेत्र बताया गया है।
यहां वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा, सड़क और रेलवे परियोजनाओं में वन्यजीव-अनुकूल संरचनाओं तथा मानव-बाघ संघर्ष कम करने पर विशेष जोर दिया गया है।
अब शुरू होगा बाघ संरक्षण का नया दौर
नई रिपोर्ट में सक्रिय प्रबंधन को भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण संरक्षण रणनीति बताया गया है। इसका उद्देश्य केवल बाघों का स्थानांतरण नहीं, बल्कि पूरे वन परिदृश्य का वैज्ञानिक प्रबंधन करना है।
विशेषज्ञों के अनुसार कई टाइगर रिजर्व अपनी वहन क्षमता के करीब पहुंच चुके हैं। ऐसे में युवा बाघ नए क्षेत्र की तलाश में जंगल छोड़कर गांवों और खेतों तक पहुंच जाते हैं। इससे मानव-बाघ संघर्ष बढ़ता है।
सक्रिय प्रबंधन के तहत ऐसे बाघों को वैज्ञानिक तरीके से उन सुरक्षित जंगलों में बसाया जाएगा, जहां पर्याप्त आवास और शिकार उपलब्ध हैं, लेकिन बाघों की संख्या कम है।
तीन स्तरों पर लागू होगी नई रणनीति
नई कार्ययोजना के तहत बाघ संरक्षण तीन स्तरों पर आगे बढ़ाया जाएगा। पहले स्तर पर जंगलों की सुरक्षा, अवैध शिकार पर रोक, शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाना और कानून का प्रभावी पालन होगा।
दूसरे स्तर पर बाघों की सुरक्षित आवाजाही, मानव-बाघ संघर्ष में कमी, आनुवंशिक विविधता का संरक्षण और बीमारियों की निगरानी की जाएगी।
तीसरे स्तर पर जलवायु परिवर्तन के अनुरूप संरक्षण रणनीति, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, प्रकृति आधारित आजीविका तथा पर्यावरण-अनुकूल विकास परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जाएगा।
दुनिया के लिए भी अहम भारतीय माडल
भारत अब केवल सबसे अधिक जंगली बाघों वाला देश नहीं, बल्कि वैज्ञानिक बाघ संरक्षण का वैश्विक नेतृत्वकर्ता भी बन चुका है।
सरिस्का और पन्ना की सफलता, राजाजी में आनुवंशिक सुदृढ़ीकरण और नए सक्रिय प्रबंधन रोडमैप से यह स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में भारत का ध्यान केवल बाघों की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र, वन्यजीव गलियारों और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखने पर रहेगा।