जागरण संवादी देहरादून: 'गांधी के विचार आज की पीढ़ी तक पहुंचाने हैं, तो मुन्ना भाई की शैली अपनानी होगी'
तेजी से बदलती पाठकीय रुचियों के बीच साहित्य में मिनिमलिज्म एक नई आवश्यकता के रूप में उभर रहा है। दैनिक जागरण के 'संवादी' कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने क ...और पढ़ें

देहरादून में मसूरी रोड स्थित फेयरफील्ड बाय मैरियट होटल में अभिव्यक्ति के उत्सव जागरण संवादी के दूसरे दिन प्रथम सत्र हिंदी साहित्य में मिनिमलिज्म में जागरण बेस्टसेलकर उपन्यासकार मनोज राजन त्रिपाठी, जागरण बेस्टसेलर लेखक अनिमेष मुखर्जी व जागरण बेस्टसेलर अनुवादक आशुतोष गर्ग से सवांद करते अनुपम त्रिपाठी। जागरण
HighLights
साहित्य में मिनिमलिज्म समय की नई आवश्यकता के रूप में उभरा
कम शब्दों में गहन विचार, प्रभावशाली अभिव्यक्ति पर जोर दिया गया
गजल, दोहा जैसी विधाएं मिनिमलिज्म का श्रेष्ठ उदाहरण हैं
विजय जोशी, देहरादून। साहित्य का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा है और आज का दौर भी इससे अछूता नहीं है। तेजी से भागती जिंदगी, सीमित समय और बदलती पाठकीय रुचियों के बीच साहित्य में मिनिमलिज्म (अतिसूक्ष्मवाद) एक नई आवश्यकता के रूप में उभर रहा है।
कम शब्दों में गहन विचार, व्यापक संदर्भ और प्रभावशाली अभिव्यक्ति प्रस्तुत करना अब केवल एक शैली नहीं, बल्कि समय की मांग बनता जा रहा है।
दैनिक जागरण के ‘संवादी’ कार्यक्रम में इसी विषय पर आयोजित विशेष विमर्श में साहित्यकारों और लेखकों ने मिनिमलिज्म के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा की।
मसूरी रोड स्थित होटल फेयरफील्ड बाय मैरियट में आयोजित इस सत्र में जागरण बेस्टसेलर अनुवादक आशुतोष गर्ग, जागरण बेस्टसेलर उपन्यासकार मनोज राजन त्रिपाठी और जागरण बेस्टसेलर लेखक अनिमेष मुखर्जी ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन लेखक अनुपम त्रिपाठी ने किया।
वक्ताओं ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, लेकिन बदलते समय में इसकी प्रस्तुति का स्वरूप भी बदलना स्वाभाविक है। आज का पाठक लंबी और जटिल रचनाओं की अपेक्षा संक्षिप्त, सारगर्भित और प्रभावशाली लेखन को अधिक पसंद कर रहा है।
ऐसे में लेखक के लिए सबसे बड़ी चुनौती कम शब्दों में अधिक अर्थ और भाव संप्रेषित करना है। चर्चा में गजल, दोहा और क्षणिका जैसी विधाओं को मिनिमलिज्म का श्रेष्ठ उदाहरण बताया गया।
वक्ताओं के अनुसार, 'दो पंक्तियों में पूरी कहानी कह देना ही लेखन की असली दक्षता है।' उन्होंने कहा कि सीमित शब्दों में व्यापक संदर्भ और गहरे अर्थ समाहित कर देना ही अतिसूक्ष्मवाद की पहचान है। विमर्श के दौरान यह भी कहा गया कि पौराणिक ग्रंथों जैसे वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस का भी प्रभावी संक्षिप्तीकरण संभव है, बशर्ते लेखक केवल आवश्यक और सार्थक तत्वों का चयन करे।
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वक्ताओं ने माना कि ओटीटी प्लेटफार्म, इंटरनेट मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने नई पीढ़ी की रुचियों को प्रभावित किया है। छोटे एपिसोड, त्वरित कंटेंट और संक्षिप्त अभिव्यक्ति का दौर साहित्य को भी प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष स्पष्ट था यदि आज की पीढ़ी तक गांधी के विचार पहुंचाने हैं, तो कभी-कभी ‘मुन्ना भाई’ की शैली अपनानी होगी।
भविष्य का साहित्य वही होगा जो कम शब्दों में अधिक प्रभाव छोड़ सके। मिनिमलिज्म केवल एक साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि बदलते समय की अनिवार्य अभिव्यक्ति है।
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