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    जसपाल राणा: जब नरेंद्र सिंह नेगी के 'बंदूक्या' गीत ने एक निशानेबाज को लोकगीतों में अमर किया

    Updated: Fri, 12 Jun 2026 01:41 PM (IST)

    भारतीय निशानेबाजी के दिग्गज जसपाल राणा के निधन के बाद उनकी खेल उपलब्धियों के साथ सांस्कृतिक जगत में उनकी खास पहचान की चर्चा हो रही है। ...और पढ़ें

    भारतीय निशानेबाजी के दिग्गज जसपाल राणा का शुक्रवार को निधन हो गया।

    भारतीय निशानेबाजी के दिग्गज जसपाल राणा का शुक्रवार को निधन हो गया।

    HighLights

    1. जसपाल राणा की सांस्कृतिक पहचान, लोकगीत में दर्ज

    2. नरेंद्र सिंह नेगी ने गाया 'बंदूक्या जसपाल राणा' गीत

    3. खेल और संस्कृति का दुर्लभ संगम, उत्तराखंड की स्मृति

    अंकुर अग्रवाल, देहरादून। खेल इतिहास में पदक जीतने वाले खिलाड़ी बहुत हुए, लेकिन विरले ही ऐसे होते हैं जो लोककथाओं, गीतों और जनस्मृति का हिस्सा बन जाएं।

    भारतीय निशानेबाजी के महानायक जसपाल राणा के असमय निधन के बाद उत्तराखंड में एक बार फिर वह गीत गूंज रहा है, जिसने तीन दशक पहले एक खिलाड़ी को लोकनायक बना दिया था 'बंदूक्या जसपाल राणा'।

    आज जब पूरा देश जसपाल राणा को एशियाई खेलों के स्वर्ण विजेता, अर्जुन पुरस्कार व द्रोणाचार्य सम्मान के लिए याद कर रहा है, तब उत्तराखंड उन्हें उस युवा चेहरे के रूप में याद कर रहा है, जिसके लिए गढ़वाल के लोकसम्राट नरेन्द्र सिंह नेगी ने पूरा गीत रच डाला था।

    दरअसल, यह सिर्फ प्रशस्ति गीत नहीं था, बल्कि यह पहाड़ की बेचैनी की कहानी भी थी। 'बंदूक्या जसपाल राणा' की कहानी उतनी ही दिलचस्प है, जितनी उसकी लोकप्रियता।

    लोक प्रचलित विवरणों के अनुसार नरेन्द्र सिंह नेगी एक कार्यक्रम के सिलसिले में पौड़ी जिले के असवालस्यूं की ओर जा रहे थे। रास्ते में लोगों से बातचीत के दौरान वन्यजीवों और आदमखोर बाघों के आतंक की चर्चा छिड़ी।

    ग्रामीणों ने मजाकिया, लेकिन उम्मीद भरे अंदाज में कहा कि अगर जसपाल राणा जैसा निशानेबाज यहां आ जाए तो समस्या का समाधान हो जाए।

    यही प्रसंग बाद में गीत की मूल प्रेरणा बना। यानी यह गीत केवल एक शूटर की उपलब्धियों का गुणगान ही नहीं था, बल्कि उस दौर के पहाड़ की सामाजिक मनःस्थिति का भी दस्तावेज था, जहां लोग अपने बीच से निकले एक विश्वस्तरीय खिलाड़ी में असाधारण क्षमता और उम्मीद देखते थे।

    कैसेट युग का सुपरहिट, आज भी जिंदा

    डिजिटल युग आने से बहुत पहले यह गीत कैसेटों के जरिये घर-घर पहुंचा। उपलब्ध संगीत रिकार्ड बताते हैं कि यह गीत 1990 के दशक के उत्तरार्ध में जारी एलबम का हिस्सा था व 1999 के आसपास व्यापक रूप से प्रसारित हुआ। आज भी यह गीत प्रमुख संगीत मंचों पर उपलब्ध है व नई पीढ़ी इसे सुनती है।

    उस समय पहाड़ के गांवों में शादी, मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों में यह गीत खूब बजता था। जसपाल राणा का नाम केवल खेल पन्नों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोकसंस्कृति का हिस्सा बन गया।

    लोकगीत में दर्ज हो गई थी एक पीढ़ी की आकांक्षा

    उत्तराखंड के लोकसंगीत में प्रवास, पहाड़ की पीड़ा, सामाजिक सरोकार और सांस्कृतिक चेतना प्रमुख विषय रहे हैं।

    'बंदूक्या जसपाल राणा' दरअसल एक खिलाड़ी की जीवनी नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की सामूहिक आकांक्षा थी, जो पहाड़ से निकलकर दुनिया जीतने के सपने देख रही थी। इस गीत ने जसपाल राणा को खेल नायक से आगे बढ़ाकर सांस्कृतिक प्रतीक बना दिया।

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    अब गीत बन गया श्रद्धांजलि

    जसपाल राणा के निधन के बाद इंटरनेट मीडिया पर हजारों लोग इस गीत को साझा कर रहे हैं। शायद यही किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है कि जब उसकी कहानी इतिहास की किताबों में नहीं, लोगों की स्मृतियों और गीतों में जीवित रहे।

    जसपाल राणा ने निशानेबाजी में भारत को गौरव दिलाया, लेकिन 'बंदूक्या जसपाल राणा' ने उन्हें अमर कर दिया।

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