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    केदारनाथ रोपवे ने पकड़ी रफ्तार, पहाड़ों का 3डी एक्स-रे तैयार; 30 मिनट में तय होगा 13 किमी रास्ता

    Updated: Thu, 25 Jun 2026 09:05 AM (IST)

    केदारनाथ रोपवे परियोजना अब कागजों से निकलकर जमीन पर उतरने की दिशा में तेजी से बढ़ रही है, लिडार सर्वे से पूरे मार्ग का 3डी डिजिटल मैप तैयार हो गया है। ...और पढ़ें

    अब जमीन पर उतरेगा केदारनाथ रोपवे. Fle Photo

    अब जमीन पर उतरेगा केदारनाथ रोपवे. Fle Photo

    HighLights

    1. लिडार सर्वे से पूरे रोपवे मार्ग का 3डी डिजिटल मैप तैयार

    2. 13 किमी केदारनाथ यात्रा अब 30-40 मिनट में पूरी होगी

    3. भूस्खलन संभावित क्षेत्रों का सूक्ष्म अध्ययन कर सुरक्षित स्थान चिह्नित

    अश्वनी त्रिपाठी, जागरण, देहरादून। केदारनाथ रोपवे परियोजना अब कागजों से निकलकर जमीन पर उतरने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। पहाड़ों, घाटियों व कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से गुजरने वाले इस प्रोजेक्ट का पूरा रूट अब डिजिटल रूप में तैयार हो चुका है।

    लिडार सर्वे और वीडियोग्राफी के बाद सोनप्रयाग से गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ तक का पूरा पहाड़ी क्षेत्र थ्री-डी डिजिटल मैप में बदल दिया गया है। पहाड़ों के हर ढलान, चट्टानों की मजबूती और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों का सूक्ष्म अध्ययन कर सुरक्षित अलाइनमेंट और टावरों के संभावित स्थान चिह्नित किए गए हैं। अब परियोजना डिजाइन के चरण से आगे बढ़कर निर्माण की दिशा में कदम बढ़ा रही है।

    केदारनाथ रोपवे से यात्रा आसान होगी, केदारनाथ का 13 किमी लंबा रास्ता 30 से 40 मिनट में तय होगा।

    लिडार तकनीक ने किया पूरे रूट का 3डी एक्स-रे

    लिडार तकनीक के तहत हेलीकाप्टर से लाखों लेजर पल्स भेजकर पूरे क्षेत्र की डिजिटल मैपिंग की गई। इससे पहाड़ों की ऊंचाई, ढलान, घाटियों, नालों, चट्टानों की स्थिति और संभावित भूस्खलन वाले क्षेत्रों की पहचान की गई।

    पूरे इलाके का एक थ्री-डी डिजिटल माडल तैयार हुआ। इसके साथ कैमरों से की गई वीडियोग्राफी के जरिए पूरे रूट की रिकार्डिंग कर मौसम संबंधी परिस्थितियों, प्राकृतिक बाधाओं और मशीनों की पहुंच का अध्ययन किया गया। इससे टावरों के संभावित स्थान, केबल का मार्ग और पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करने में सहायता मिली।

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    गहराई से लिए नमूनों से मिली पहाड़ के अंदर की तस्वीर

    परियोजना क्षेत्र में जियो-टेक्निकल जांच के तहत बोरहोल ड्रिलिंग कर गहराई से मिट्टी और चट्टानों के नमूने लिए गए। इनका परीक्षण कर यह पता लगाया गया कि जमीन कितना भार सह सकती है, चट्टानों में दरारें हैं या नहीं और किस स्थान की नींव कितनी मजबूत है। कंप्यूटर आधारित विश्लेषण से यह तय करने में मदद मिल रही है कि रोपवे टावर और अन्य संरचनाओं की नींव कहां और कितनी गहराई तक बनाई जाए।

    ऐसे तय हुआ कहां सुरक्षित बनेंगे स्टेशन

    गौरीकुंड और सोनप्रयाग स्टेशन के लिए जियो-टेक्निकल और टोपोग्राफी सर्वे पूरे कर लिए गए हैं। ड्रोन, जीपीएस और अन्य आधुनिक उपकरणों की मदद से क्षेत्र की ऊंचाई, ढलान, पहाड़, घाटियां और अन्य भौगोलिक स्थितियों का विस्तृत नक्शा तैयार किया गया, जिससे सुरक्षित स्थानों की पहचान आसान हुई।

    इस बीच शुरुआती अलाइनमेंट तैयार कर लिया गया है और अंतिम अलाइनमेंट पर काम जारी है। वहीं, देहरादून से सोनप्रयाग तक वास्तविक आकार के कंटेनरों के साथ लाजिस्टिक्स का ड्राई रन भी पूरा हो चुका है, ताकि भारी मशीनों और निर्माण सामग्री को सुरक्षित तरीके से परियोजना स्थल तक पहुंचाने की तैयारी सुनिश्चित की जा सके। इससे यह भी पता चला कि भारी मशीनें और निर्माण सामग्री परियोजना स्थल तक पहुंचाने में चुनौती कहां पर आएगी।

    ‘केदारनाथ रोपवे प्रोजेक्ट में फारेस्ट लैंड क्लीयरेंस पर तेजी से कार्य किया जा रहा है। सभी आवश्यक सर्वे निर्धारित समयसीमा में पूरे कराकर कार्य को धरातल पर जल्द शुरू कराया जाएगा।’
    -आनंद बर्द्धन, मुख्य सचिव, उत्तराखंड

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