अल नीनो के बावजूद जुलाई में सामान्य बारिश, AI भी नहीं समझ पाया मानसून का बदला मिजाज
इस साल जुलाई में सामान्य वर्षा ने मौसम विज्ञानियों के अनुमानों को गलत साबित किया, जबकि जून में भारी कमी थी। ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
सुमन सेमवाल, देहरादून। इस वर्ष जुलाई का मानसून मौसम विज्ञानियों के सभी प्रमुख अनुमानों को चुनौती देता नजर आया।
जून में देश में 40 प्रतिशत वर्षा की कमी और अल नीनो के तेजी से विकसित होने के बाद भारतीय मौसम विभाग (आइएमडी) समेत कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने जुलाई में सामान्य से कम वर्षा की आशंका जताई थी। लेकिन जुलाई के अंत तक देश में वर्षा सामान्य श्रेणी में पहुंच गई।
मौसम विज्ञान तथा एआई को साथ लेकर चलना होगा
विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना इस बात का संकेत है कि अब केवल अल नीनो के आधार पर भारतीय मानसून का पूर्वानुमान लगाना पर्याप्त नहीं है। इसी बीच जुलाई 2026 में प्रकाशित दो महत्वपूर्ण विज्ञानी शोध ने भी पुष्टि की है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित अत्याधुनिक मौसम माडल भी भारतीय मानसून के बदलते व्यवहार को पूरी तरह समझने में सक्षम नहीं हैं।
विज्ञानियों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की प्रकृति तेजी से बदल रही है और भविष्य के पूर्वानुमान के लिए पारंपरिक मौसम विज्ञान तथा एआई दोनों को साथ लेकर चलना होगा।
जून में सूखे जैसे हालात, जुलाई ने बदल दी तस्वीर
इस वर्ष जून में पूरे देश में 99.5 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जबकि सामान्य वर्षा 165.4 मिलीमीटर होती है। यानी जून में लगभग 40 प्रतिशत वर्षा की कमी रही। यह वर्ष 1901 के बाद पांचवां सबसे शुष्क जून माना गया।
इसी आधार पर भारतीय मौसम विभाग ने जुलाई में दीर्घकालिक औसत (एलपीए) के लगभग 94 प्रतिशत वर्षा होने का अनुमान जारी किया था। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने भी अल नीनो के मजबूत होने की चेतावनी देते हुए कमजोर मानसून की आशंका जताई थी।
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जलवायु परिवर्तन ने कमजोर कर दिया अल नीनो का पुराना प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार पहले अल नीनो का मतलब लगभग निश्चित रूप से कमजोर मानसून माना जाता था, लेकिन अब वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण यह संबंध पहले जितना मजबूत नहीं रह गया है।
गर्म वातावरण पहले की तुलना में अधिक जलवाष्प धारण कर रहा है। इससे लंबे शुष्क अंतराल के बाद अचानक अत्यधिक वर्षा देखने को मिल रही है। यही कारण है कि एक ही मौसम में कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे जैसी स्थिति बन रही है।
'समुद्रऐस' मॉडल भी नहीं समझ पाया मानसून
इसी बदलते मानसून को समझने के लिए आइआइटी मद्रास, गौहाटी विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के विज्ञानियों ने समुद्रऐस नामक त्रि-आयामी एआई पृथ्वी तंत्र माडल विकसित किया। इसे 150 वर्षों के वैश्विक जलवायु आंकड़ों पर प्रशिक्षित किया गया और इसकी सहायता से 300-300 वर्षों के तीन अलग-अलग जलवायु अनुकरण किए गए।
यह मॉडल महासागर और वायुमंडल दोनों को एक साथ जोड़कर मौसम का पूर्वानुमान तैयार करता है तथा एक शक्तिशाली ग्राफिक्स प्रोसेसर पर लगभग 1500 वर्षों का मौसमीय अनुकरण एक दिन में पूरा कर सकता है।
शोध में पाया गया कि वास्तविक भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा की परिवर्तनशीलता 83.2 मिलीमीटर है। एआई मॉडल ने इसे केवल 64 मिलीमीटर आंका। यानी मानसून के उतार-चढ़ाव को लगभग 23 प्रतिशत कम दर्शाया गया।
वास्तविक वातावरण में लगभग 42 दिन का सक्रिय मानसूनी चक्र मिलता है, लेकिन मॉडल उसकी शक्ति का 50 प्रतिशत से भी कम हिस्सा पकड़ पाया। इसके बजाय मॉडल ने 60 दिन का कृत्रिम चक्र अधिक मजबूत दिखाया, जो वास्तविक मौसम से मेल नहीं खाता।
अल नीनो का प्रभाव भी सही नहीं समझ पाया एआई
वैज्ञानिकों ने पाया कि वास्तविक अल नीनो क्षेत्र (नीनो-3.4) का समुद्री तापमान परिवर्तन 0.632 डिग्री सेल्सियस था। मॉडल ने इसे केवल 0.435 डिग्री सेल्सियस दर्शाया। उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का तापमान लगभग 1 डिग्री सेल्सियस कम आंका गया।
मानसून और अल नीनो के बीच बनने वाला संबंध लगभग एक वर्ष तक खिसक गया, जिससे मौसमी पूर्वानुमान प्रभावित हो सकता है।
गूगल का ग्राफकास्ट भी रहा कमजोर
दूसरे शोध में वैज्ञानिकों ने गूगल के एआई मौसम मॉडल ग्राफकास्ट का मूल्यांकन किया। इसके लिए 2021 से 2024 तक के मानसून मौसम का विश्लेषण किया गया। मॉडल के 24, 48 और 72 घंटे के पूर्वानुमानों की तुलना वास्तविक मौसम और उपग्रह आंकड़ों से की गई।
अध्ययन में सामने आया कि मॉडल सामान्य वर्षा का वितरण तो अच्छी तरह दिखाता है। लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में वास्तविकता से अधिक वर्षा का अनुमान लगाता है। दूसरी ओर अत्यधिक वर्षा की घटनाओं को कम दर्शाता है। वर्षा के वास्तविक उतार-चढ़ाव को पकड़ने की क्षमता बेहद कमजोर रही। इसका परिवर्तनशीलता अनुपात केवल 0.14 पाया गया।
अर्थात मॉडल वास्तविक वर्षा की विविधता का केवल 14 प्रतिशत ही सही ढंग से समझ सका। दूसरी तरफ बादलों के विकास और भारी वर्षा के लिए जिम्मेदार निचले वायुमंडल की ऊष्मा (क्यू1 प्रोफाइल) का आकलन भी कमजोर पाया गया।
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