चमोली के तमकनाला में उफान का होगा वैज्ञानिक विश्लेषण, 15 दिन में सौंपनी होगी रिपोर्ट
चमोली के तमकनाला में अत्यधिक जलप्रवाह और मलबे की घटना का उत्तराखंड सरकार वैज्ञानिक अध्ययन कराएगी। आपदा प्रबंधन सचिव ने प्रमुख संस्थानों को 15 दिन के भ ...और पढ़ें

फाइल फोटो।
HighLights
तमकनाला घटना का सरकार कराएगी वैज्ञानिक अध्ययन
प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों को 15 दिन में देनी होगी रिपोर्ट
भविष्य के जोखिमों और अर्ली वार्निंग पर सुझाव
राज्य ब्यूरो, जागरण, देहरादून। चमोली जिले के ज्योतिर्मठ-मलारी मार्ग पर तमकनाला में सोमवार को अत्यधिक जलप्रवाह और बड़ी मात्रा में मलबा आने की घटना का सरकार वैज्ञानिक अध्ययन कराएगी। आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने इस सिलसिले में देश के प्रमुख वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों को पत्र भेजकर घटना के कारणों और भविष्य के संभावित जोखिम का विस्तृत अध्ययन करने का अनुरोध किया है। संबंधित संस्थानों को 15 दिन के भीतर रिपोर्ट उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को उपलब्ध कराने को कहा गया है।
आपदा प्रबंधन सचिव ने इस संबंध में प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों को भेजा पत्र
सचिव सुमन ने जिन संस्थानों के निदेशकों को पत्र भेजा है, उनमें वाडिया हिमालयी भू-विज्ञान संस्थान, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र, भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान, उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र, भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण, भारत मौसम विज्ञान विभाग और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान शामिल हैं।
पत्र में तमकनाला के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र का अध्ययन कर अचानक बढ़े जलप्रवाह के वास्तविक स्रोत की पहचान करने को कहा गया है।
जलप्रवाह और मलबे के स्रोत से लेकर भविष्य के जोखिम की होगी जांच
यह भी जांच होगी कि जलप्रवाह सामान्य वर्षा, अत्यधिक स्थानीय वर्षा, बादल फटने, तीव्र सतही बहाव या किसी अन्य कारण से बढ़ा। मलबे के स्रोत और उत्पत्ति क्षेत्र के साथ भूस्खलन, भू-धंसाव, ढलान विफलता, चट्टानों के टूटने और अन्य भू-आकृतिक गतिविधियों की भूमिका भी इस अध्ययन के जरिये जांची जाएगी।
आधुनिक तकनीक से होगा विश्लेषण
अध्ययन में घटना से पहले और बाद की स्थिति के तुलनात्मक आकलन के लिए उपग्रह चित्र, हाई रिजाल्यूशन रिमोट सेंसिंग, ड्रोन सर्वेक्षण और जीआईएस आधारित विश्लेषण का उपयोग किया जाएगा। साथ ही उपग्रह व राडार आधारित वर्षा आंकड़ों और स्थानीय वर्षामापी केंद्रों के आंकड़ों से बारिश की तीव्रता व अवधि का अध्ययन होगा।
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अर्ली वॉर्निंग पर भी मिलेगी विशेषज्ञ राय
संभावित भूस्खलन, राकफाल, मलबा प्रवाह और फ्लैश फ्लड के जोखिम के साथ हिमनद, हिमक्षेत्र और जल निकायों की भी पड़ताल होगी। विशेषज्ञों से अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, रियल टाइम मॉनिटरिंग, वर्षामापी, जलस्तर सेंसर और कैमरा आधारित निगरानी की आवश्यकता पर सुझाव मांगे गए हैं। सचिव सुमन के अनुसार अध्ययन के निष्कर्ष भविष्य में सीमावर्ती क्षेत्र में सड़क, पुल व अन्य महत्वपूर्ण ढांचों की योजना और आपदा प्रबंधन रणनीति को मजबूत करने में उपयोगी साबित होंगे।