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उत्तराखंड में नेपाल त्रासदी जैसा खतरा! 64% बढ़ा केदारताल का क्षेत्रफल, 45 मिनट में गंगोत्री तक पहुंच सकती है बाढ़

By Rena Edited By: Nirmala Bohra
Published: Sat, 05 Sep 2026 02:15 PM (IST)Updated: Sat, 05 Sep 2026 03:17 PM (IST)

केदारताल झील का क्षेत्रफल 35 वर्षों में लगभग 64% बढ़ा है, जिससे ग्लेशियल झील फटने (GLOF) का खतरा बढ़ गया ...और पढ़ें

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रीना डंडरियाल, रुड़की। हिमालयी क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों के कारण ग्लेशियल झीलों से अचानक बाढ़ आने के भविष्य के जोखिम को लेकर विज्ञानियों ने चिंता जताई है।

राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (एनआइएच) रुड़की के विज्ञानियों के ऊपरी गंगा बेसिन में केदारताल झील पर किए अध्ययन से पता चला है कि गत 35 वर्ष में इसके क्षेत्रफल में लगभग 64 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। नतीजों से पता चलता है कि झील अब कई दशक पहले की तुलना में काफी अधिक पानी जमा कर रही है। ऐसे में विज्ञानियों ने इस झील की लगातार निगरानी और बेहतर तैयारी की जरुरत पर जोर दिया है।

रुड़की स्थित एनआइएच के विज्ञानियों की टीम ने उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित केदारताल झील में हुए बदलावों को समझने के लिए सैटेलाइट इमेज और पुराने आंकड़ों की जांच की। एनआइएच रुड़की के विज्ञानी डा. लवकुश कुमार पटेल ने बताया कि अध्ययन में पाया गया कि 1990 की तुलना में केदारताल झील का क्षेत्रफल करीब 64,456 वर्ग मीटर से बढ़कर 2025 तक 1,33,823 वर्ग मीटर हो गया था।

क्षेत्रफल बढ़ने से अब झील कई दशक पहले की तुलना में काफी ज्यादा पानी जमा कर रही है। उन्होंने बताया कि शोध में कंप्यूटर आधारित बाढ़ सिमुलेशन का भी इस्तेमाल किया गया। जिससे कि यह समझा जा सके कि अगर झील की प्राकृतिक रुकावट अचानक टूट जाती है तो सबसे खराब स्थिति में क्या हो सकता है।

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बाढ़ की एक शक्तिशाली लहर केदार-गंगा घाटी से तेजी से गुजर सकती है

सिमुलेशन से पता चला कि बाढ़ की एक शक्तिशाली लहर केदार-गंगा घाटी से तेजी से गुजर सकती है। इस काल्पनिक स्थिति में बाढ़ की लहर लगभग 45 मिनट में गंगोत्री क्षेत्र तक पहुंच सकती है। हालांकि नीचे की ओर बढ़ते हुए इसकी ताकत कम हो जाएगी।

इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि घाटी के संकरे हिस्सों में पानी का स्तर कई मीटर तक बढ़ सकता है। जबकि नदी के संगम के पास के इलाकों और आबादी वाले क्षेत्रों में भारी बाढ़ आ सकती है। ये नतीजे बताते हैं कि किसी असल आपात स्थिति के आने से पहले ही खतरे वाले इलाकों की पहचान करना कितना जरूरी हो गया है।

डा. लवकुश पटेल कहते हैं कि हालांकि यह अध्ययन यह भविष्यवाणी नहीं करता है कि केदारताल से ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ की घटना होगी ही। बल्कि यह सबसे खराब स्थिति का आकलन करता है। ताकि संभावित नतीजों को समझा जा सके और अधिकारियों को ऐसी घटना के लिए तैयार रहने में मदद मिल सके।

भले ही ऐसी घटना होने की संभावना कम हो लेकिन यह खतरनाक हो सकती हैं। अध्ययन करने वाली विज्ञानियों की टीम में शिव शंकर यादव, आदर्श पाढ़ी, मधुसूदन थपलियाल और सुरजीत सिंह शामिल हैं।

नियमित निगरानी पर जोर

अध्ययन के नतीजे ग्लेशियल झीलों की नियमित निगरानी पर जोर देते हैं। साथ ही अर्ली वार्निंग सिस्टम (समय से पहले चेतावनी देने वाले सिस्टम) लगाने एवं उन्हें मजबूत करने, खतरे वाले इलाकों एवं बुनियादी ढांचे की पहचान करने और स्थानीय समुदायों व पर्यटकों के बीच अधिक जागरूकता लाने को भी महत्वपूर्ण मानते हैं।

कब बनती हैं ग्लेशियल झीलें

ग्लेशियल झीलें तब बनती हैं जब पिघलते ग्लेशियर बड़ी मात्रा में पानी छोड़ते हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ने के कारण हिमालयी ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, ऐसी कई झीलें बड़ी होती जा रही हैं। कुछ मामलों में अगर पानी को रोके रखने वाली प्राकृतिक चट्टान और तलछट की रुकावट अस्थिर हो जाती है या टूट जाती है, तो अचानक पानी का बहाव हो सकता है। जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) कहा जाता है।

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बढ़ता तापमान बन रहा वजह

शोधकर्ताओं ने इस इलाके में तापमान बढ़ने और बहुत अधिक वर्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी की भी साफ प्रवृत्ति देखी है। बढ़ता तापमान ग्लेशियरों के पिघलने और ग्लेशियल झीलों के फैलने की वजह बन रहा है। जबकि जोरदार वर्षा इन ऊंचाई वाली झीलों पर और दबाव डाल सकती है।

बचाव के उपाय करने में मदद

विज्ञानी डा. लवकुश पटेल कहते हैं कि जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन हिमालय के परिदृश्य को बदल रहा है तो इस तरह के अध्ययन विज्ञानियों एवं अधिकारियों को नए खतरों को बेहतर ढंग से समझने और बचाव के उपाय करने में मदद कर सकते हैं। इनका मकसद डर पैदा करना नहीं, बल्कि तैयारी को बेहतर बनाना है। समय पर जानकारी, लगातार निगरानी और असरदार अर्ली वार्निंग सिस्टम पहाड़ों से जुड़े संभावित खतरों से निपटने के दौरान जान-माल के नुकसान को कम कर सकते हैं।