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    कारगिल युद्ध ने देवभूमि को बनाया वीरभूमि, कुमाऊं के 17 रणबांकुरों ने दिया था सर्वोच्च बलिदान

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 12:15 PM (IST)

    कारगिल युद्ध में उत्तराखंड ने अपनी वीरभूमि होने का प्रमाण दिया, जहां 75 सपूतों ने बलिदान दिया, जिनमें नैनीताल के मेजर राजेश अधिकारी को महावीर चक्र मिल ...और पढ़ें

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    किशोर जोशी, नैनीताल। 1999 के कारगिल युद्ध में देवभूमि ने खुद को वीरभूमि साबित किया है। कारगिल जंग में देवभूमि के सपूतों ने जो जौहर दिखाया, अंतिम सांस तक दुश्मन को नाकों चने चबवाए, जरूरत पड़ी तो मां भारती की रक्षा में बलिदान हो गए। कारगिल युद्ध में देश के 527 रणबांकुरों ने बलिदान दिया, जिसमें से 75 बलिदानी उत्तराखंड के थे।

    कुमाऊं में नैनीताल के पांच, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ के चार-चार, ऊधमसिंह नगर व बागेश्वर के दो-दो जवान शामिल थे। इनमें नैनीताल के महावीर चक्र विजेता मेजर राजेश अधिकारी, सिपाही मोहन जोशी, लांस नायक राम प्रसाद ध्यानी, सेना मेडल विजेता चंदन सिंह व मोहन सिंह शामिल हैं। कारगिल जंग में उत्तराखंड के बलिदानियों में दो को महावीर चक्र, नौ वीर चक्र, 15 सेना मेडल, 11 मेंशन इन डिस्पैच सम्मान मिला था।

    कारगिल युद्ध के दौरान डिप्टी डायरेक्टर सैन्य अभियान रहे रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल मोहन चंद्र भंडारी कारगिल ने बताया कि युद्ध में दुश्मन ने पीछे से वार किया था। इसके बाद भी भारतीय सेना के शौर्य व पराक्रम ने कोबाल गली से सियाचिन पश्चिम तक 168 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से दुश्मन को पराजित कर अभेद्य बना दिया है।

    नैनीताल के मेजर राजेश को मिला महावीर चक्र

    नैनीताल: शहर के कमलासन कम्पाउंड निवासी केएस अधिकारी व मालती अधिकारी के पुत्र मेजर राजेश अधिकारी ने कारगिल जंग में सर्वोच्च बलिदान दिया। 22 मई 1999 को 18 ग्रेनेडियर्स ने कारगिल के टोटोलिंग क्षेत्र में कब्जा करने के लिए पहला हमला किया। मेजर राजेश को प्रारंभिक तौर पर पैर जमाने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

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    बर्फ से ढके खतरनाक इलाके में दुश्मन करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर था, मेजर राजेश अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़ रहे थे। मेजर राजेश ने इस दौरान पाक के दो सैनिक ढेर कर दिए। दुश्मन की ओर से भारी गोलीबारी के बीच मेजर अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़ रहे थे कि उन पर गोलियां बरस पड़ी। घायल होने के बाद भी मेजर अधिकारी टुकड़ी के साथ आगे बढ़ते रहे और एक और पाक सैनिक को मार गिराया। दूसरी पोजिशन को भी देश के कब्जे में कर लिया।

    इस दौरान मेजर अधिकारी बलिदान हो गए, लेकिन उनके व उनकी टुकड़ी की बहादुरी से ही भारत टोटोलिंग तक सफलतापूर्वक पहुंच सका। मेजर अधिकारी को मरणोपरांत महावीर चक्र प्रदान किया गया। जीआइसी नैनीताल व डीएसबी परिसर से पढ़े मेजर अधिकारी के नाम पर नैनीताल जीआइसी का नामकरण किया गया है और दर्शनघर पार्क में उनकी मूर्ति लगाई गई है। मूर्ति स्थापित करने को जगह के लिए उनकी मां स्व. मालती अधिकारी को सालों तक सरकारी सिस्टम के चक्कर काटने पड़े थे।

    मेजर साह ने चार घुसपैठियों को कर दिया था ढेर

    नैनीताल: कारगिल जंग के दौरान शहर निवासी मेजर व वर्तमान में कर्नल राजेश साह चार्ली कंपनी को कमांड कर रहे थे। 23 जून 1999 को उन्हें प्वाइंट 4700 के आसपास के क्षेत्र पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई। मेजर साह 10 सैनिकों की टुकड़ी के साथ भारी गोलीबारी के बीच पथरीली चढ़ाई पर रेंगते हुए आगे बढ़ते रहे।

    हथगोला फेंककर दुश्मन पर हमला बोल दिया। भीषण शारीरिक युद्ध में उन्होंने चार घुसपैठियों को मार डाला और उनके बंकरों पर कब्जा कर लिया। इस बहादुरी के लिए मेजर साह को वीर चक्र सम्मान दिया गया। वर्तमान में कर्नल साह कारगिल में ही तैनात हैं।

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