बंगाल में यूं ही नहीं पलटी बाजी, इन किरदारों का रहा अहम रोल; ममता के किले में सेंध की Inside Story
बंगाल चुनाव में राजनीतिक नारों की अहम भूमिका रही, जिसमें भाजपा के 'पालटानो दरकार' ने मतदाताओं को प्रभावित किया। तृणमूल ...और पढ़ें
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बंगाल चुनाव में नारों की भूमिका (फाइल फोटो)

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विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता । 'पालटानो दरकार, चाई बीजेपी सरकार' (पलटना जरुरी है, भाजपा की सरकार चाहिए)। बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत में इस नारे ने भी अहम भूमिका निभाई। इसने सीधे लोगों के दिमाग पर स्ट्राइक किया। उन्हें परिवर्तन के बारे में सोचने को बाध्य किया। मतदान से पहले बहुतों की जुबां पर यह नारा चढ़ गया था।
मनोविज्ञानी अभिषेक हंस कहते हैं, आधुनिक दौर के चुनावों में, जहां बहुत कुछ 'नैरेटिव' (आख्यान) पर निर्भर करता है, नारों की भूमिका और बढ़ गई है। नारे लोगों को पार्टी से जोड़ते हैं, उनके प्रति विश्वास जगाते हैं, वहीं विरोधियों के प्रति अविश्वास उत्पन्न करते हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 'अबकी बार, मोदी सरकार' का नारा दिया था, जो आकर्षक व धारा प्रवाह में होने के कारण बच्चे-बच्चे की जुबां पर चढ़ गया था। 'पालटानो दरकार' को इसी का बंगाली वर्जन कहा जा सकता है। इसके व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं होने पर भी इसमें परिवर्तन की बात कही गई।
यह नारा भी लोगों की जुबां पर फिट हो गया। जब कोई बात बार-बार कही जाती है तो वह दिमाग को उत्प्रेरित करती है और उससे भावनात्मक रूप से जोड़ती है। यह सोच बदलने का काम करती है और निर्णय लेने में महत्वपूर्ण साबित होती है, हालांकि यह भी मायने रखता है कि किसने इसे किस तरह से लिया क्योंकि हर व्यक्ति भिन्न होता है।
2021 में तृणमूल का नारा रहा था कारगर
2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने सीधे पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी से जोड़ते हुए 'बांग्ला निजेर मेये के ई चायेÓ (बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है) का नारा दिया था, जो कारगर साबित हुआ था। वहीं उसके 'खेला होबेÓ (खेल होगा) के नारे ने तृणमूल कार्यकर्ताओं की आक्रामकता बढ़ाई थी।
इस बार तृणमूल ने 'जोतोई कोरो हमला, आबार जीतबे बांग्ला' (जितने भी कर लो हमले, फिर से जीतेगा बंगाल) का नारा देकर दम भरा कि केंद्र की तमाम 'साजिशों' के बावजूद बंगाल जीतेगा, हालांकि यह विफल साबित हुआ। अभिषेक ने कहा, सिर्फ नारे गढ़ने से नहीं होता। उनका तर्कसंगत व यथार्थवादी होना भी जरुरी है, तभी लोगों को खुद से भावनात्मक तरीके से जोड़ सकता है। तृणमूल के इस बार के नारे से अधिकांश लोग सहमत नहीं
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