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    ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा का 'ट्रैजिक' मोड़, 15 साल पहले कैसे बनी थीं बंगाल की दीदी?

    Updated: Tue, 05 May 2026 09:58 PM (IST)

    ममता बनर्जी को 2026 के विधानसभा चुनाव में भवानीपुर से सुवेंदु अधिकारी के हाथों 15,105 वोटों से हार का सामना करना पड़ा, जिसे उनके राजनीतिक करियर का सबस ...और पढ़ें

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    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    इंद्रजीत सिंह, कोलकाता। बंगाल की राजनीति में ‘दीदी’ के नाम से मशहूर ममता बनर्जी के लिए 2026 का विधानसभा चुनाव एक ऐतिहासिक और भावनात्मक झटका लेकर आया। ‘मैं यह लड़ाई अकेले लड़ूंगी’—चुनाव से पहले उनका यह आत्मविश्वास भरा बयान अब उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी हार के रूप में दर्ज हो गया है।

    भवानीपुर, जिसे तृणमूल कांग्रेस का अभेद्य किला माना जाता था, वहीं से भाजपा के सुवेंदु अधिकारी ने ममता को 15,105 वोटों से करारी शिकस्त दी।

    भवानीपुर से हारीं ममता बनर्जी

    2021 में नंदीग्राम से हार के बाद ममता बनर्जी ने उपचुनाव में भवानीपुर से जीत दर्ज की थी। उस समय नारा था- बंगाल अपनी बेटी को चाहता है। 2026 में यही नारा ‘भवानीपुर की अपनी बेटी’ बन गया, लेकिन इस बार जनता ने इसे स्वीकार नहीं किया।

    ममता ने घर-घर जाकर प्रचार किया, छोटी बैठकों, चाय-चर्चा और व्यक्तिगत संपर्क पर जोर दिया, फिर भी नतीजा उनके खिलाफ गया। 2026 का यह चुनाव उनके करियर का सबसे बड़ा झटका बन गया। वर्ष 1984 सांसद बनने के बाद पहली बार वह किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं।

    चार मई की रात ने बंगाल की राजनीति को यह दिखा दिया कि कभी अजेय मानी जाने वाली नेता भी समय के साथ चुनौती का सामना करती है। यह हार सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि एक लंबे राजनीतिक अध्याय के ‘ट्रैजिक’ मोड़ की कहानी बन गई है।

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    संघर्षों से भरा रहा है सफर

    1984 से शुरू हुआ ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर लगातार संघर्षों से भरा रहा है। ममता बनर्जी भारतीय राजनीति की उन कोलकाता की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की और जल्द ही राष्ट्रीय मंच पर पहचान बना ली। ममता बनर्जी कई बार केंद्र सरकार में अहम जिम्मेदारियां निभा चुकी हैं।

    1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना कर उन्होंने बंगाल की राजनीति में नया अध्याय लिखा। 34 वर्षों के लंबे वाम शासन को उखाड़ फेंक 2011 में वह बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। यह उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत मानी जाती है। उनकी छवि एक जुझारू, सादगीपूर्ण और जमीनी नेता की रही है।

    चप्पल-कुर्ता और साधारण जीवनशैली के साथ-साथ पेंटिंग और कविता में रुचि उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है। विरोध और विवादों के बीच भी ममता बनर्जी ने खुद को एक मजबूत जननेता के रूप में स्थापित किया है।

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