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    पश्चिम बंगाल चुनाव: अल्पसंख्यक वोट बैंक में फिर से पैठ मजबूत करती दिख रही तृणमूल कांग्रेस

    Updated: Sat, 18 Apr 2026 11:00 PM (IST)

    पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस अल्पसंख्यक वोट बैंक पर अपनी पकड़ फिर से मजबूत कर रही है। ...और पढ़ें

    अल्पसंख्यक वोट बैंक पर TMC की पकड़ मजबूत (फोटो-पीटीआई)

    अल्पसंख्यक वोट बैंक पर TMC की पकड़ मजबूत (फोटो-पीटीआई)

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    राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले अल्पसंख्यक वोट बैंक को लेकर बदलते समीकरणों ने नया राजनीतिक संकेत दिया है।

    करीब एक महीने पहले तक जहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की अल्पसंख्यक मतदाताओं पर पकड़ 15 साल के शासनकाल में पहली बार कमजोर पड़ती दिख रही थी, वहीं अब हालिया घटनाक्रमों के बाद यह आधार फिर से मजबूत होता नजर आ रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने, भाजपा द्वारा सत्ता में आने पर छह महीने के भीतर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के वादे और छोटे मुस्लिम दलों के कमजोर पड़ने से माहौल तेजी से बदला है।

    मार्च तक ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम), इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आइएसएफ) और आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) जैसे दल तृणमूल के पारंपरिक वोटबैंक में सेंध लगाते दिख रहे थे, लेकिन अब उनका प्रभाव घटता प्रतीत हो रहा है।

    विश्लेषकों का कहना है कि एसआइआर प्रक्रिया में करीब 91 लाख नाम हटाए गए, जिनमें एक बड़ा हिस्सा अल्पसंख्यकों का बताया जा रहा है। इससे समुदाय में असुरक्षा की भावना बढ़ी है और वोटों के बंटवारे को लेकर सतर्कता आई है। परिणामस्वरूप, अल्पसंख्यक मतदाता अब एकजुट होकर सुरक्षित विकल्प की ओर झुकते दिख रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषक मैदुल इस्लाम के मुताबिक, तीन हफ्तों के भीतर घटनाओं ने पूरी तस्वीर बदल दी है। असंतोष के बावजूद अल्पसंख्यक मतदाता अब वोट बंटने से बचना चाहते हैं, जिससे भाजपा को फायदा न मिले। यही कारण है कि 2026 का चुनाव एक बार फिर 2021 जैसा द्विध्रुवीय मुकाबला बनता दिख रहा है।

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    2021 के आंकड़े भी इस रुझान को बल देते हैं। तृणमूल ने उन अधिकांश सीटों पर जीत दर्ज की थी जहां अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में थे। अब उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में एसआइआर और यूसीसी जैसे मुद्दों ने समुदाय को फिर से संगठित करने का काम किया है।

    'वोट बांटना सही रणनीति नहीं'

    मुर्शिदाबाद के शिक्षक इरशाद मुल्ला कहते हैं कि पहले कुछ मतदाता विकल्प तलाश रहे थे, लेकिन अब उन्हें लगता है कि वोट बांटना सही रणनीति नहीं होगी। वहीं, समुदाय के नेताओं का भी मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में चुनाव सीधा मुकाबला बन गया है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे दलों के बीच गठबंधन टूटना और विवादों का उभरना भी एक अहम कारक रहा है। इससे अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए वैकल्पिक राजनीतिक मंच कमजोर पड़ा है।

    कुल मिलाकर, बदलते राजनीतिक माहौल में अल्पसंख्यक वोट बैंक फिर से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की ओर सिमटता दिख रहा है, जहां समर्थन उत्साह से अधिक रणनीतिक और परिस्थितिजन्य नजर आ रहा है।

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