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    1973 का योम किप्पुर युद्ध: जब दुनिया ने देखा पहला Oil Crisis, 4 गुना महंगा हुआ तेल और आया 'कार-फ्री संडे' का दौर

    Updated: Mon, 13 Apr 2026 04:58 PM (IST)

    1973 का हमला केवल युद्ध नहीं, बल्कि इजरायल की 'अजेय' छवि के उस अहंकार को तोड़ने वाली एक सोची-समझी सैन्य चोट थी। ...और पढ़ें

    1973 का वो युद्ध जब दुनिया ने देखा पहला Oil Crisis

    1973 का वो युद्ध जब दुनिया ने देखा पहला Oil Crisis

    HighLights

    1. 'ऑपरेशन निकल ग्रास' से अमेरिका ने इजरायल को बचाया।

    2. ओपेक के तेल प्रतिबंध से पहला वैश्विक तेल संकट आया।

    गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। 6 अक्टूबर, 1973 को जब मिस्र और सीरिया ने इजरायल पर अचानक हमला किया, तो वह केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि इजरायल के उस अजेय होने के भ्रम को तोड़ना था जो 1967 के 'छह दिवसीय युद्ध' के बाद पैदा हुआ था। इजरायल ने महज 6 दिनों में मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की सेनाओं को धूल चटा दी थी।

    इस प्रचंड जीत ने इजरायल के भीतर यह धारणा पैदा कर दी कि कोई भी अरब सेना उसे चुनौती नहीं दे सकती। यही वह 'भ्रम' था जिसके कारण 1973 में जब मिस्र और सीरिया ने हमला किया, तो इजरायल की तैयारी आधी-अधूरी थी। इजरायल 'योम किप्पुर' का त्योहार मना रहा था और पूरा देश बंद था।

    ठीक ऐसा ही कुछ 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के दौरान हुआ, जिसने इजरायल के खुफिया तंत्र और सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी। इजरायल को अपनी अत्याधुनिक 'स्मार्ट फेंस' और एआई-बेस्ड निगरानी तंत्र पर इतना भरोसा था कि उसने हमास जैसे छोटे गुट की क्षमताओं को कम करके आंका। 1973 में इजरायल धार्मिक उत्सव 'योम किप्पुर' के कारण शांत था और 2023 में 'सिमचत तोराह' के कारण। 

     

    दोनों ही बार दुश्मन ने इजरायल की धार्मिक संवेदनाओं और त्योहार की छुट्टी का फायदा उठाकर उसे चौंका दिया और इजरायल को फिर से उसी रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया जैसा वह 50 साल पहले था। CIA की रिपोर्ट में एक दिलचस्प लाइन है, ‘उस समय खुफिया एजेंसियों के लिए ये उतना आसान नहीं था। यही वजह थी कि इजरायल हमले को भांप नहीं पाया।’

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     1973 युद्ध: टैंक बनाम टैंक की लड़ाई

    आज लेबनान बॉर्डर पर हिजबुल्लाह के साथ जो संघर्ष चल रहा है, वह 1973 के उसी अधूरे समीकरण का विस्तार है, जहां इजरायल को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है।

    1973 के युद्ध में सोवियत संघ समर्थित मिस्र की सेना ने स्वेज नहर पार कर इजरायल की अभेद्य मानी जाने वाली 'बार्लेव लाइन' को ध्वस्त कर दिया था। आज लेबनान में हिजबुल्लाह वही भूमिका निभा रहा है, लेकिन उसका तरीका छापामार और तकनीकी रूप से अधिक उन्नत है। 

    1973 war

    1973 में सीरिया का मेन टारगेट 'गोलान हाइट्स' को वापस पाना था। यह इलाका एक ऊंचाई वाला पठार है, जहां से पूरे उत्तरी इजरायल पर नजर रखी जा सकती है। अगर सीरियाई टैंक वहां कब्जा कर लेते, तो वे सीधे इजरायल के निचले रिहायशी इलाकों में घुस सकते थे। 1973 में यह लड़ाई 'टैंक बनाम टैंक' की थी, जहां लोहे और आग का सीधा मुकाबला हुआ।

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    आज भी इजरायल के लिए सबसे बड़ा खतरा वही उत्तरी हिस्सा है, जो लेबनान से सटा हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज वहां सीरियाई टैंकों की लाइन नहीं, बल्कि हिजबुल्लाह की छिपी हुई मिसाइल यूनिट्स हैं। भूगोल आज भी वही है, पहाड़ी रास्ता और ऊंचाई… जिसका फायदा उठाकर हिजबुल्लाह इजरायल के गैलिली जैसे इलाकों को निशाना बनाता है।

    'बचा लीजिए, वरना इजरायल खत्म...'

    अक्टूबर 1973 के युद्ध के शुरुआती हफ्तों में इजरायल की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उसके पास गोला-बारूद खत्म होने लगा था। युद्ध के शुरुआती 3-4 दिनों में मिस्र की सोवियत निर्मित 'सैम' (SAM) मिसाइलों ने इजरायली वायुसेना को भारी नुकसान पहुंचाया था। इजरायल के पास टैंक्स और लड़ाकू विमानों की भारी कमी हो गई थी।

    हालात इतने खराब थे कि इजरायल की तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ने अमेरिका से यहां तक कह दिया था कि ‘हमें बचा लीजिए, वरना इजरायल खत्म हो जाएगा।’ उनके पास गोला-बारूद इतना कम बचा था कि वो मुश्किल से कुछ दिन और लड़ सकते थे।

    क्या था ऑपरेशन निकेल ग्रास?

    शुरुआत में अमेरिका हिचकिचा रहा था क्योंकि उसे डर था कि अरब देश तेल की सप्लाई रोक देंगे। लेकिन जब सोवियत संघ ने खुलकर अरब देशों को हथियार भेजना शुरू किया, तो अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 'ऑपरेशन निकेल ग्रास' शुरू किया। यह इतिहास के सबसे बड़े एयरलिफ्ट ऑपरेशन्स में से एक था, उन्होंने अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (Pentagon) से कहा, ‘जो कुछ भेजा जा सकता है, उसे भेजो।’

    Richard Naxon

    अमेरिका के 37वें राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन

    उन्होंने निर्देश दिया कि देरी न की जाए और इजरायल को वो सभी आधुनिक हथियार दिए जाएं जिनकी उसे जरूरत है। इसके बाद अमेरिकी कार्गो विमानों ने सीधे इजरायली मोर्चे पर टैंक, विमान और मिसाइलें पहुंचानी शुरू कर दीं। 

    इसके बाद क्या था, जब अमेरिकी विमान इजरायल में हथियार उतार रहे थे, तब सऊदी अरब और अन्य अरब देशों (OPEC) ने इसे अपने वजूद पर हमला माना। किंग फैसल ने साफ कर दिया कि अरबों का तेल, अरबों के दुश्मनों की मदद के लिए इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा।

    जब अरब देशों ने अमेरिका को तेल देने से किया इनकार

    17 अक्टूबर 1973 को ओपेक देशों ने घोषणा की कि वो हर महीने तेल के उत्पादन में 5% की कटौती करेंगे और अमेरिका-नीदरलैंड जैसे देशों के लिए तेल का एक्सपोर्ट पूरी तरह बंद कर देंगे। इस पाबंदी का असर इतना तेज था कि दुनिया कांप गई। कच्चे तेल की कीमत जो लगभग 3 डॉलर प्रति बैरल थी, वह उछलकर सीधे 12 डॉलर के पार पहुंच गई। यह सिर्फ एक आंकड़े की बढ़ोतरी नहीं थी, बल्कि इसने पूरी दुनिया की रफ्तार रोक दी।

    • अमेरिका में पेट्रोल की ऐसी किल्लत हुई कि सरकार को 'राशनिंग' करनी पड़ी।
    • लोग अपनी गाड़ियों में तेल डलवाने के लिए आधी रात से लाइन में लगते थे।
    • पहली बार अमेरिका में हाईवे पर गाड़ियों की स्पीड लिमिट कम की गई ताकि ईंधन बचाया जा सके।
    • यूरोप के कई देशों में 'कार-फ्री संडे' लागू किया गया, जहां रविवार को सड़कों पर गाड़ी ले जाना मना था। लोग घोड़ों और साइकिलों पर दफ्तर जाने लगे।
    1973 war gfx

    यह इतिहास में पहली बार था जब 'तेल' को सीधे एक 'हथियार' के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसका असर इतना भयानक था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रातों-रात चार गुना तक बढ़ गईं। अमेरिका और यूरोप में पेट्रोल पंपों पर मीलों लंबी कतारें लग गईं, फैक्ट्रियां बंद होने लगीं और पूरी दुनिया एक गहरे आर्थिक संकट Oil Crisis में डूब गई।

    U.S. Department of State की वेबसाइट 1973 युद्ध को लेकर एक महत्वपूर्ण लाइन लिखती है, ‘1973 का युद्ध मध्य-पूर्व में अमेरिकी नीति के लिए एक ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुआ।’

    आज भी कहानी वही है। गाजा और लेबनान के मोर्चे पर इजरायल जितने इंटरसेप्टर और बम दाग रहा है, उनकी भरपाई अमेरिका के बिना मुमकिन नहीं है। अमेरिका आज भी इजरायल के लिए वही 'सुरक्षा कवच' बना हुआ है, जो उसने 50 साल पहले बनाया था। फर्क सिर्फ इतना है कि आज अमेरिका केवल हथियार नहीं दे रहा, बल्कि अपने Aircraft Carriers भी भूमध्य सागर में तैनात कर रहा है ताकि दूसरे देश इस जंग में न कूदें।

    1973 में अरब देशों के पीछे दुनिया की महाशक्ति सोवियत संघ खड़ा था। वह मिस्र और सीरिया को नए जमाने की मिसाइलें और ट्रेनिंग दे रहा था। आज वह जगह ईरान ने ले ली है। 

    ईरान ने पिछले दो दशकों में लेबनान के हिजबुल्लाह को महज एक विद्रोही गुट से बदलकर एक आधुनिक 'प्रॉक्सी आर्मी' बना दिया है। ईरान का समर्थन आज केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि तकनीकी है। वह हिजबुल्लाह को वह सब कुछ दे रहा है जो 1973 में सोवियत संघ अरब देशों को देता था। सटीक मिसाइलें, ड्रोन और युद्ध की रणनीति।

    आज जब इजरायल और लेबनान के बीच युद्ध दहक रहा है, तो दुनिया के मन में फिर वही 1973 वाला डर है। हालांकि, आज के हालात थोड़े अलग लेकिन उतने ही चुनौतीपूर्ण हैं।

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    स्त्रोत: 

    U.S. Department of State की वेबसाइट

    CIA की रिपोर्ट