क्या इस्लामिक NATO बन रहा है? ईरान और इजरायल के लिए सऊदी-पाक-तुर्किए डील के क्या हैं मायने?
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' ने पश्चिम एशिया में नई सुरक्षा बहस छेड़ दी है। ...और पढ़ें
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सऊदी, पाक, तुर्किए ने 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर किए हस्ताक्षर

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर ने पश्चिम एशिया की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। तीन प्रभावशाली सुन्नी देशों का एक मंच पर आना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल ईरान के बढ़ते प्रभाव, अमेरिका की बदलती क्षेत्रीय भूमिका और पश्चिम एशिया की मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों की पृष्ठभूमि में हुई है। ईरानी मिसाइलों ने न केवल अमेरिकी सुरक्षा की पोल खोल दी है, बल्कि अरब देशों के बीच एकजुटता की कमजोरी को भी उजागर कर दिया है।
त्रिपक्षीय डिफेंस डील के क्या हैं मायने?
सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका का प्रमुख रणनीतिक साझेदार और उसके हथियारों का बड़ा खरीदार रहा है। वहीं, तुर्किए नाटो का सदस्य है और उसके पास गठबंधन की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है।
पाकिस्तान इस समूह का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश है। इन तीनों की सामरिक क्षमताओं ने इस समझौते को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है।
विश्लेषकों के अनुसार, मक्का में समझौते पर हस्ताक्षर कर सऊदी अरब ने न केवल खाड़ी के सुन्नी देशों, बल्कि पूरे क्षेत्र को एक राजनीतिक और सामरिक संदेश देने की कोशिश की है।
उनका मानना है कि हाल के महीनों में ईरान के साथ बढ़े तनाव और पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों ने इस तरह के सहयोग की जरूरत को और बढ़ाया है।
हालांकि, समझौते का पूरा पाठ अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि सामूहिक सुरक्षा का प्रविधान व्यवहार में किस सीमा तक लागू होगा और किसी संकट की स्थिति में सदस्य देश एक-दूसरे की सैन्य सहायता के लिए किस हद तक बाध्य होंगे।
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इजरायल और ईरान के लिए डील के क्या हैं मायने?
रायटर के अनुसार, तुर्किए के उपराष्ट्रपति सेवडेट यिलमाज ने कहा कि समझौते का उद्देश्य किसी विशेष देश को निशाना बनाना नहीं है।
तुर्किए के एक अधिकारी ने भी स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह रक्षा और आत्मरक्षा पर केंद्रित व्यवस्था है तथा इससे किसी अन्य देश के साथ पहले से मौजूद रक्षा समझौतों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा क्षेत्रीय संघर्षों ने तीनों देशों की सुरक्षा चिंताओं को साझा आधार दिया है।
ऐसे समय में, जब अमेरिका की भूमिका पहले जैसी निर्णायक नहीं मानी जा रही, क्षेत्रीय देशों के बीच नए सुरक्षा ढांचे उभरते दिखाई दे रहे हैं।
इस आकलन को पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले वर्ष हुए द्विपक्षीय रक्षा समझौते के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी याद दिलाते हैं कि सामूहिक सुरक्षा संबंधी प्रावधानों का वास्तविक स्वरूप संकट की परिस्थितियों में सदस्य देशों के राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर करता है।
उदाहरण के तौर पर, सऊदी अरब पर ईरानी हमलों के बाद पाकिस्तान ने प्रत्यक्ष सैन्य जवाबी कार्रवाई नहीं की थी, जबकि उसके सैनिक और सैन्य संसाधन सऊदी अरब में तैनात थे।
क्या इजरायल भी इस रणनीतिक समीकरण का हिस्सा है?
विश्लेषकों के अनुसार, इस समझौते की पृष्ठभूमि में इजरायल का सुरक्षा वातावरण भी एक महत्वपूर्ण कारक है। एपी के अनुसार, गाजा, लेबनान और सीरिया में इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों का पाकिस्तान, तुर्किए और कई अन्य मुस्लिम देशों ने लगातार विरोध किया है।
पाकिस्तान अब भी इजरायल को मान्यता नहीं देता, जबकि तुर्किए के इजरायल के साथ संबंध हाल के वर्षों में काफी तनावपूर्ण रहे हैं। हालांकि, समझौते में कहीं भी इजरायल का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं किया गया है और अब तक इजरायल की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया भी सामने नहीं आई है।