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    डार्क नेटवर्क का कड़वा सच, जर्मनी बना 'यूरोप का वेश्यालय'; तस्कर कैसे बना रहे महिलाओं को शिकार?

    Updated: Sun, 19 Jul 2026 05:45 PM (IST)

    यूरोप में मानव तस्करी और देह व्यापार का काला कारोबार गहरा रहा है, खासकर जर्मनी में जहां लैटिन अमेरिकी महिलाओं को नौकरी के बहाने फंसाया जा रहा है। ...और पढ़ें

    यूरोप में मानव तस्करी और देह व्यापार का काला कारोबार गहराया (जागरण ग्राफिक्स)

    यूरोप में मानव तस्करी और देह व्यापार का काला कारोबार गहराया (जागरण ग्राफिक्स)

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    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। यूरोप में मानव तस्करी और देह व्यापार का काला कारोबार गहराई तक अपनी जड़े जमा चुका है। यहां बीते कुछ सालों से बाहरी देशों खासकर लैटिन अमेरिकी देशों से महिलाओं को नौकरी, मॉडलिंग और लग्जरी जीवन देने के बहाने यूरोप बुलाकार जबरन इस व्यापार में धकेला जा रहा है।

    महिलाओं की दशा किस हद तक इन देशों में बिगड़ती जा रही है इसका कोई हिसाब नहीं है। इस काले कारोबार के खिलाफ जर्मनी और स्पेन की पुलिस अब संगठित अभियान चला रही है, लेकिन अपराधियों का नेटवर्क इतना जटिल है कि पीड़ितों तक पहुंचकर उन्हें न्याय दिलाना बहुत कठिन है।

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    यूरोप कैसे बना मानव तस्करी का अड्डा?

    बढ़ते आर्थिक संकट, बेरोजगारी और अत्यधिक गरीबी की वजह से कोलंबिया, वेनेजुएला, पेरू और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों की महिलाएं नौकरी की तलाश में यूरोप की ओर रुख करती हैं। इन्ही मजबूरियों का फायदा उठाकर ब्रोकर (दलाल) उन्हें नौकरी का झांसा देते हैं।

    वे उन्हें केयरटेकर, वेट्रेस, क्लीनर या मॉडलिंग कराने के नाम पर यूरोप बुलाते हैं और यहां पहुंचते ही उनसे उनका पासपोर्ट और अन्य पहचान छीन कर तस्करी और देह व्यापार में धकेल देते हैं। जहां उनसे दिन-रात देह व्यापार करवाया जाता है।

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    ‘यूरोप का वेश्यालय’ कैसे बना जर्मनी?

    जर्मनी में वेश्यावृत्ति अपराध नहीं है बल्कि यहां लाइसेंस प्राप्त वेश्यालयों को चलाने की अनुमति है। यहीं वजह है कि धड़ल्ले से यहां 'सेक्स इंडस्ट्री' का बड़ा बाजार पनप रहा है। इतना ही नहीं इसी खुले बाजार की वजह से आलोचक जर्मनी को 'यूरोप का वेश्यालय' तक कहते हैं।

    यह बात अलग है कि जर्मनी में वेश्यावृत्ति को कानूनी सहायता प्राप्त है लेकिन जब इसकी आड़ में मानव तस्करी और जबरन देह व्यापार का कारोबार पनपने लगता है तो यह किसी भी देश के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। धीरे-धीरे व्यवस्था पूरे सिस्टम को खोखला कर देती है।

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    कोविड के बाद बदला स्वरुप?

    कोविड-19 महामारी से पहले तक देह व्यापार का काला कारोबार वेश्यालयों तक सिमित था। लेकिन महामारी के बाद सब कुछ बदलने लगा। देह व्यापार का बड़ा हिस्सा पारंपरिक वेश्यालयों से निकलकर निजी अपार्टमेंट्स और होटलों में शिफ्ट हो गया।

    इसकी एक बड़ी वजह से भी रही कि ऐसी जगहों पर पुलिस की निगरानी कठिन हो जाती है। ऐसे में तस्कर अब ऐसे ठिकानों को चुनते हैं जहां पुलिस का पहुंचना कठिन हो। रिपोर्ट्स यह भी कहती है कि यहां महिलाओं से 20-20 घंटे देह व्यापार कराया जाता है।

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    पुलिस एक्शन का कितना असर?

    जर्मनी पुलिस इन दिनों ऐसे वेश्यालयों, होटलों और अपार्टमेंट्स में छापा मार रही है जहां उन्हें संदिग्ध गतिविधियों को लेकर सूचना मिल रही है।

    अधिकारियों का कहना है कि वे उन महिलाओं तक पहुंचना चाहते हैं जिन्हें जबरन इस धंधे में धकेला गया है। हालांकि पीड़ित अक्सर डर के कारण अपनी स्थिति खुलकर नहीं बता पातीं।

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    पीड़िता को किस बात का डर?

    देह व्यापार और मानव तस्करी का नेटवर्क इतना गहरा है कि कई बार इस दलदल में सिर्फ महिलाएं ही नहीं बल्कि उनका पूरा परिवार फंसा हुआ होता है।

    अधिकतर महिलाओं को डरा धमका कर रखा जाता है कि अगर उन्होंने पुलिस से मदद मांगी तो उनके परिवार को नुक्सान पहुंचाया जाएगा।

    यहीं वजह है कि पुलिस की कार्रवाई के दौरान भी वे अक्सर यही कहती हैं कि वे अपनी मर्जी से काम कर रही हैं।

    सोशल मीडिया बना तस्करों का हथियार

    वर्त्मा समय में मानव तस्करी का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन चलाया जा रहा है। विज्ञापन वेबसाइटों, व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के जरिए ग्राहकों को महिलाओं तक पहुंचाया जाता है।

    कई बार फोन और ऑनलाइन प्रोफाइल भी किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कंट्रोल की जाति है, जिससे उनपर नजर रखी जा सके।

    कैसे लगेगी रोक?

    जर्मनी में वेश्यावृत्ति कोई अपराध नहीं है, लेकिन स्वीडन और फ्रांस जैसे देशों ने सेक्स खरीदन को अपराध अपराध माना जाता है। फिर भी मानव तस्करी का नेटवर्क इन देशों में एक्टिव है।

    एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल कानून बदलने से समस्या का संधान नहीं होगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग, पीड़ितों की सुरक्षा और अपराधियों के आर्थिक नेटवर्क को तोड़ना सबसे जरूरी है।

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    संयुक्त राष्ट्र की चिंता

    संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, मानव तस्करी दुनिया के सबसे बड़े संगठित अपराधों में से एक है। 2020 से 2023 के बीच दुनिया भर में लगभग दो लाख मामले दर्ज हुए, लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। UN का अनुमान है कि हर साल लाखों लोग किसी न किसी रूप में मानव तस्करी का शिकार होते हैं।

    क्या है सबसे बड़ी चुनौती?

    पुलिस और सामाजिक संगठनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पीड़ित महिलाओं का भरोसा जीतना है। कई महिलाएं बचाए जाने के बाद भी अपराधियों के खिलाफ गवाही देने से डरती हैं।

    दूसरी ओर, तस्कर लगातार नए रास्ते और नए तरीके खोज लेते हैं। ऐसे में मानव तस्करी के इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को तोड़ने के लिए पुलिस, सरकारों, सामाजिक संगठनों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय बेहद जरूरी माना जा रहा है।

    कैसे मिलेगा छुटकारा?

    यूरोप में मानव तस्करी केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह गरीबी, पलायन, लैंगिक असमानता और संगठित अपराध से जुड़ी बहुआयामी समस्या है।

    जब तक महिलाओं की आर्थिक मजबूरियों और अपराधियों के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर प्रभावी तरीके से अंकुश नहीं लगाया जाता, तब तक यह कारोबार नए रूपों में जारी रहने की आशंका बनी रहेगी।

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