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    राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस : अमेरिका-जापान तक है भागलपुरी सिल्क का दबदबा; प्रेरणादायी है बुनकरों की संघर्षगाथा

    Updated: Fri, 07 Aug 2026 09:34 AM (GMT+05:30)

    भागलपुर की हथकरघा परंपरा, खासकर रेशमी वस्त्र, अमेरिका से जापान तक वैश्विक पहचान बना चुके हैं। बुनकर परिवार चुनौतियों के बावजूद डिजिटल मार्केटिंग और पा ...और पढ़ें

    राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस पर जानें बुनकरों की संघर्षगाथा

    राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस पर जानें बुनकरों की संघर्षगाथा

    HighLights

    1. भागलपुरी हथकरघा वैश्विक बाजारों में अपनी पहचान बना चुका है।

    2. युवा बुनकर डिजिटल माध्यम से उत्पादों का निर्यात कर रहे हैं।

    3. पारंपरिक तसर सिल्क और महीन बुनाई की भारी मांग है।

    जागरण संवाददाता, भागलपुर। 'सिल्क सिटी' भागलपुर की पहचान केवल इसके रेशमी वस्त्रों से नहीं है, बल्कि उन हजारों बुनकर परिवारों से है जिन्होंने पीढ़ियों से हथकरघा (Handloom) की इस पौराणिक परंपरा को अपने खून-पसीने से सींचा है। करघे की खट-खट में बसने वाली यह पुश्तैनी कला आज सात समंदर पार अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूएई जैसे देशों में अपनी खास पहचान बना चुकी है।

    राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस (National Handloom Day) के अवसर पर भागलपुर के नाथनगर, चंपानगर, पुरैनी, नवगछिया, मीरजाफरी, दरियापुर, मिरनचक, हुसैनाबाद और मोजाहिदपुर जैसे इलाकों में गूंजती करघे की आवाजें भारत की सांस्कृतिक समृद्धि और बुनकरों के अटूट हौसले की गवाही देती हैं।

    डिजिटल बाजार से मिला नया मुकाम

    लोदीपुर के युवा बुनकर भोला तांती ने अपने बुजुर्गों से बुनाई का हुनर सीखा और अब वे पारंपरिक डिजाइनों में आधुनिक फैशन का नया रंग भर रहे हैं। भोला डिजिटल मार्केटिंग और ऑनलाइन मार्केटप्लेस के जरिए सीधे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से जुड़ रहे हैं।

    कोरोना महामारी के संकटकाल में जब बाजार बंद हुए और निर्यात रुका, तब भी उन्होंने करघा चलाना नहीं छोड़ा। वे अब मास्टर ट्रेनर बनकर नई पीढ़ी के युवाओं को हथकरघा बुनाई का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं, ताकि यह पुश्तैनी हुनर हमेशा जीवित रहे।

    मशीनी दौर में भी हाथों का जादू कायम

    हुसैनाबाद के बुनकर मो. सलीम अंसारी बताते हैं कि उनका परिवार चौथी पीढ़ी से हथकरघा से जुड़ा है। आज के डिजिटल दौर में जहां कंप्यूटर से ग्राफ तैयार होते हैं, वहीं वे आज भी केवल कागज पर बने स्केच को देखकर अपने हाथों से कपड़े पर हूबहू डिजाइन उकेर देते हैं।

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    सलीम बताते हैं कि पावरलूम की बढ़ती प्रतिस्पर्धा से हथकरघा उद्योग पर दबाव बढ़ा है। एक साड़ी तैयार करने में कई दिनों की हाड़-तोड़ मेहनत लगती है, लेकिन उस अनुपात में पारिश्रमिक नहीं मिल पाता। फिर भी अपनी विरासत को बचाने के लिए बुनकर परिवार दिन-रात मेहनत में जुटे हैं।

    • अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और यूएई तक निर्यात होता है भागलपुर का प्रसिद्ध तसर सिल्क, स्कार्फ और ड्रेस मटेरियल

    • पावरलूम की चुनौती और आर्थिक तंगी के बावजूद 4 पीढ़ियों से पुश्तैनी विरासत को सहेजे हुए हैं चंपानगर और नाथनगर के बुनकर

    भागलपुरी हथकरघा (Handloom) की खास बातें

    • ग्लोबल मार्केट: अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूएई तक निर्यात।

    • लोकप्रिय प्रॉडक्ट्स: सिल्क स्कार्फ, स्टोल, साड़ियां, ड्रेस मटेरियल और होम फर्निशिंग फैब्रिक की भारी मांग।

    • विशिष्ट पहचान: तसर सिल्क की स्वाभाविक चमक और हाथ से की जाने वाली महीन बुनाई।

    • पारंपरिक तकनीक: धूप में धागे सुखाने और थाई-रीलिंग (Thigh Reeling) की प्राचीन कला आज भी जीवित।

    • डिजिटल राह: नई पीढ़ी के युवा अब ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया के जरिए दुनिया भर में बेच रहे हैं उत्पाद।

    यूरोपीय देशों में ठंडे मौसम के कारण मोटे हैंडलूम फैब्रिक की भारी मांग

    हुसैनाबाद के ही वरिष्ठ बुनकर मो. अंसार बताते हैं कि उनका परिवार वर्ष 1980 से (तीसरी पीढ़ी) हथकरघा पर कपड़ा तैयार कर रहा है। भागलपुर का तसर सिल्क हल्का, टिकाऊ और प्राकृतिक चमक वाला होता है।

    यूरोप और अमेरिका जैसे ठंडे देशों में भागलपुर के बने मोटे हैंडलूम फैब्रिक, स्कार्फ और स्टोल की भारी मांग रहती है। भले ही नई पीढ़ी के कुछ युवा अन्य पेशों की ओर रुख कर रहे हों, लेकिन विदेशों में भागलपुर के बुनकरों की कारीगरी की धाक आज भी पूरी मजबूती के साथ कायम है।

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