बिहार में 'गुंडा बैंकर्स' का आतंक: ब्याज के लिए निकाला खून, 5 के बदले वसूले ₹29 लाख; रूह कंपाने वाले 4 केस
पूर्वी बिहार में 'गुंडा बैंकर्स' का आतंक जारी है, जो 8-10% मासिक ब्याज पर कर्ज देकर लोगों को परेशान कर रहे हैं और जबरन जमीन-मकान लिखवा रहे हैं। ...और पढ़ें

बिहार में सूदखोरों का आतंक। फोटो एआई जनरेटेड

समय कम है?
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कौशल किशोर मिश्र, भागलपुर। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकार ने सूदखोरों के आतंक से आमलोगों को मुक्ति दिलाने की जो घोषणा की थी वह अबतक धरातल पर नहीं दिख रही है।
सूदखोर महाजनों और तथाकथित गुंडा बैंकर्स के आतंक से पूर्वी बिहार के हजारों किसान, मजदूर और छोटे कारोबारी आज भी परेशान हैं। नवगछिया अनुमंडल के दियारा इलाके, नाथनगर अंचल के मधुसूदनपुर, सबौर, कटिहार, पूर्णिया, मधेपुरा, किशनगंज तथा कोसी-सीमांचल के दियारा क्षेत्रों में सक्रिय ये गिरोह आठ से 10 प्रतिशत मासिक ब्याज पर कर्ज देकर लोगों को कर्ज के जाल में फंसा रहे हैं। वसूली के लिए मारपीट, गाली-गलौज, धमकी और जमीन-मकान तक जबरन लिखवाने जैसी घटनाएं हो रही हैं।
उच्च न्यायालय के निर्देश पर आर्थिक अपराध इकाई और आयकर विभाग ने 2022-24 के दौरान सूदखोरों पर कार्रवाई शुरू की थी, लेकिन बाद में अभियान की रफ्तार धीमी पड़ गई। इस बीच पूर्वी बिहार के विभिन्न थानों में गुंडा बैंकर्स से जुड़ी ज्यादतियों के 500 से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं।
चर्चित घोटाले का पैसा आने के बाद समझ हुई विकसित
बताया जाता है कि लोकल बैंक चलाने की सोच सबसे पहले तिनटंगा दियारा के सिकंदर नामक एक चर्चित शख्स ने लोगों के सामने रखी थी। उसमें यह समझ तब हुए सूबे के एक चर्चित घोटाले का पैसा आने के बाद विकसित हुई थी।
घोटाले में लिप्त बड़े ओहदेदारों ने उसे बैंक चलाने के लिए तब एकमुश्त रकम दी थी। शर्त यह थी कि बैंक के जरिये उनके दो नंबर के पैसे ब्याज पर लगाएगा। पहले तीन रुपये सैकड़े की दर से बैंक संचालक को पैसा मिला था, जिसे उसने चार रुपये की दर से लोगों को कर्ज बांटा था।
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इसमें प्रत्येक माह ब्याज नहीं देने पर ब्याज की रकम मूलधन में जुट जाती है। इसे यहां कट्ठी (चक्रवृद्धि ब्याज) का नाम दिया गया है। देखते ही देखते सरस्वती, शारदा, वीणापानी, सहारा, मां विषहरी विकास बैंक, शिवशंकर बैंक समेत सैकड़ों की संख्या में गुंडा बैंक उग आए। बैंक के संचालकों में अधिकांश की पृष्ठभूमि आपराधिक है। कर्ज और ब्याज में ना नुकुर करने का अंजाम मौत होती है।
व्यवसाई की बरामदगी के बाद पहली बार हुआ था नेटवर्क का खुलासा
कटिहार के कुर्सेला निवासी लकड़ी व्यवसायी संजय चिरानियां का तीन जनवरी 2006 को 16 लाख रुपये के कर्ज विवाद में अपहरण कर लिया गया था। पांच दिन बाद कटिहार, पूर्णिया और भागलपुर पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में उनकी बरामदगी नवगछिया के तिनटंगा दियारा से हुई थी।
इसी मामले के बाद गुंडा बैंक नेटवर्क का बड़ा खुलासा हुआ था। अवधेश के घर से कंप्यूटर, सीडी समेत अन्य दस्तावेज बरामद हुए थे। त्वरित अदालत ने एक अभियुक्त कारेलाल मंडल को तीन वर्ष की सजा सुनाई थी।
जुर्म की इंतेहा
कर्ज वसूली के लिए नारायणपुर प्रखंड के जयपुर चोरहर गांव निवासी महेश चंद्र मंडल के शरीर से सीरिंज से तब तक खून निकाला गया, जब तक वह बेहोश नहीं हो गया।
केस स्टडी 01
बरारी थाना क्षेत्र के पश्चिम टोला निवासी बिट्टू कुमार ने 6 अप्रैल 2026 को कथित सूदखोरी और प्रताड़ना से तंग आकर फांसी लगा ली। ई-रिक्शा खरीदने के लिए लिया गया कर्ज और बढ़ते ब्याज का दबाव वह नहीं झेल सके।
केस स्टडी 02
रानी तालाब निवासी भावेश नागपाल के अनुसार उनके पिता ने 2013 में साहेबगंज निवासी अशोक कुमार से पांच लाख रुपये का कर्ज लिया था। 2023 तक परिवार 15 लाख रुपये ब्याज चुका चुका था, लेकिन मूल धन खत्म नहीं हो रहा था।
लिहाजा, महाजन चक्रवृद्धि ब्याज जोड़ता रहा। पिता के निधन बाद अब बेटे से जबरन हर माह 30 हजार रुपये महाजन ले लेता है। 29 मई 2026 को साहेबगंज क्षेत्र में गए भावेश नागपाल को रोक कर जबरन कलाई घड़ी और सोने की चेन उतार ली थी।
भावेश नागपाल की मानें तो पिता के निधन बाद अबतक अशोक कुमार को करीब 14 लाख रुपये दे चुका है। यानी अशोक कुमार को पांच लाख रुपये के मूल धन के बदले अबतक बाप-बेटे 29 लाख रुपये दे चुके हैं।
केस स्टडी 03
नाथनगर थाने में 21 अगस्त 2022 को स्टेशन रोड बाजार लेन, नाथनगर निवासी गोपाल कृष्ण साह ने सूदखोर दबंगों के विरुद्ध केस दर्ज कराते हुए दो लाख 50 हजार रुपये का कर्ज तीन साल पूर्व करेला निवासी प्रिंस यादव से लेने की बात कही।
कर्ज के एवज में वह चार लाख 50 हजार रुपये अबतक लौटा चुका है। उसे सूदखोर महाजन ने धमकी दी कि वह अभी और रकम दे। उसे प्रापर्टी डीलर बिजय यादव के गैराज में बुलाकर मारपीट की गई। हथियार का भय दिखा उसकी जमीन जबरन लिखवाने का प्रयास किया गया।
केस स्टडी 04
गौराडीह निवासी मजदूर वकील बिंद ने 2023 में खेती के लिए 30 हजार रुपये का कर्ज लिया था। उनका दावा है कि ढाई वर्षों में दो लाख रुपये से अधिक ब्याज देने के बाद भी मूलधन समाप्त नहीं हुआ।
आरोप है कि महाजन उनकी मजदूरी का हिस्सा ले लेता है और कभी गाय तो कभी बकरी खोलकर ले जाता है। क्षेत्र में बढ़ती शिकायतों के बीच पीड़ितों का कहना है कि सूदखोरों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से उनका मनोबल बढ़ता जा रहा है और गरीब परिवार कर्ज के दलदल में फंसते जा रहे हैं।