Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    गयाजी का चितागढ़ गांव: केवल 5-6 लोग ही कर पाते हैं सिग्नेचर, नदी पार कर पढ़ाई करने की मजबूरी

    Updated: Mon, 25 May 2026 05:29 PM (GMT+05:30)

    मोहनपुर प्रखंड के चितागढ़ गांव में आजादी के दशकों बाद भी शिक्षा की बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, जहां बच्चों को स्कूल जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती है। ...और पढ़ें

    चितागढ़ गांव के लोग। (जागरण)

    चितागढ़ गांव के लोग। (जागरण)

    HighLights

    1. चितागढ़ गांव में स्कूल-आंगनबाड़ी नहीं, बच्चे शिक्षा से वंचित।

    2. नदी पार कर स्कूल जाते बच्चे, बरसात में पढ़ाई ठप रहती है।

    3. प्रशासनिक उदासीनता से गांव बुनियादी सुविधाओं से भी दूर।

    संवाद सूत्र, मोहनपुर (गया)। मोहनपुर प्रखंड मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर, घने जंगलों और झारखंड सीमा से सटे चितागढ़ गांव की तस्वीर आज भी बेहद चिंताजनक है।

    करीब एक हजार की आबादी वाला यह गांव आजादी के दशकों बाद भी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। स्थिति इतनी भयावह है कि यहां के बच्चों के लिए न तो कोई प्राथमिक विद्यालय है और न ही आंगनबाड़ी केंद्र। ऐसे में गांव के नौनिहालों का भविष्य अंधकार में डूबता नजर आ रहा है।

    गांव में अधिकतर आबादी अनुसूचित जाति समुदाय की है, लेकिन शिक्षा के अभाव ने इस पूरे समाज को पिछड़ेपन के दलदल में धकेल दिया है।

    ग्रामीण बताते हैं कि चितागढ़ गांव दो पंचायतों- अमकोला और केवला के बीच प्रशासनिक रूप से उलझा हुआ है। किसी का आधार कार्ड अमकोला पंचायत का है तो किसी का केवला पंचायत का। इसी खींचतान और स्पष्ट जिम्मेदारी तय नहीं होने के कारण गांव अब तक सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रह गया है।

    नदी पार कर पढ़ाई: बच्चों की जान जोखिम में

    गांव के बच्चों को पढ़ाई के लिए डेढ़ से दो किलोमीटर दूर स्थित केवला गांव के स्कूल जाना पड़ता है। बीच में एक नदी पड़ती है, जिसे पार कर बच्चे स्कूल पहुंचते हैं।

    गर्मी के दिनों में किसी तरह बच्चे स्कूल पहुंच भी जाते हैं, लेकिन बरसात के मौसम में नदी उफान पर होती है और बच्चों का स्कूल जाना पूरी तरह बंद हो जाता है। नतीजतन कई महीने तक पढ़ाई ठप रहती है और धीरे-धीरे बच्चे शिक्षा से पूरी तरह कट जाते हैं।

    खबरें और भी

    अशिक्षा का गहराता अंधेरा

    शिक्षा के अभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे गांव में महज पांच-छह लोग ही अपना हस्ताक्षर कर पाते हैं। बाकी अधिकांश लोग आज भी निरक्षर हैं।

    बच्चे दिनभर जंगलों और झाड़ियों में खेलते रहते हैं या फिर बकरी और सूअर चराने में लग जाते हैं। पढ़ाई का माहौल न होने से नई पीढ़ी भी उसी अंधेरे की ओर बढ़ रही है, जिससे उनके पूर्वज जूझते रहे हैं।

    ग्रामीण पुनी मांझी बताते हैं, हमलोग कई बार मुखिया से स्कूल और आंगनबाड़ी खोलने की मांग कर चुके हैं, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। आजादी के इतने साल बाद भी हमलोग ऐसे ही जीवन जीने को मजबूर हैं।

    वहीं, नंदू मांझी और सुदेश्वर मांझी का कहना है कि शिक्षा की कमी के कारण गांव के लोग आज भी सरकारी योजनाओं और अधिकारों से अनजान हैं।

    संघर्ष की मिसाल बनी काजल कुमारी

    इसी गांव की काजल कुमारी ने विपरीत परिस्थितियों के बीच मैट्रिक परीक्षा पास कर एक नई उम्मीद जगाई है। काजल बताती हैं कि उन्होंने गांव से दूर अपने रिश्तेदार के घर रहकर पढ़ाई की और परीक्षा पास की।

    वह गांव की पहली लड़की हैं, जिन्होंने मैट्रिक पास किया है। काजल कहती हैं कि अगर हमारे गांव में स्कूल होता तो और भी बच्चे पढ़ पाते। मैं सरकार से मांग करती हूं कि हमारे गांव में जल्द स्कूल खोला जाए।

    जनप्रतिनिधियों की पहल, लेकिन नतीजा शून्य

    ग्राम पंचायत केवला के मुखिया अरविंद सिंह यादव बताते हैं कि इस समस्या को लेकर कई बार शिक्षा विभाग को पत्र लिखा गया और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी से भी मुलाकात की गई, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है।

    उन्होंने कहा कि चितागढ़ एक राजस्व गांव है और हमारे पंचायत के करीब 80 प्रतिशत लोग यहां बसे हैं। बावजूद इसके यहां शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। आगामी जनगणना में इस विसंगति को दूर करने का प्रयास किया जाएगा।

    सड़क और बिजली भी बनी समस्या

    शिक्षा ही नहीं, चितागढ़ गांव बुनियादी सुविधाओं के मामले में भी बेहद पिछड़ा है। गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। बिजली तो पहुंचाई गई है, लेकिन आपूर्ति अनियमित है। ऐसे में यहां के लोग आज भी आदिम जीवन जीने को विवश हैं।

    सरकार के दावों पर सवाल

    एक ओर सरकार शत-प्रतिशत नामांकन और शिक्षा के अधिकार की बात करती है, वहीं दूसरी ओर चितागढ़ जैसे गांव इस दावे की पोल खोल रहे हैं। सवाल यह है कि जब एक पूरा गांव ही शिक्षा से वंचित है, तो ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ का सपना कैसे साकार होगा

    ग्रामीणों की मांग: अब और इंतजार नहीं

    ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार से मांग की है कि चितागढ़ में अविलंब प्राथमिक विद्यालय और आंगनबाड़ी केंद्र की स्थापना की जाए। साथ ही गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने और नियमित बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की भी अपील की है।

    अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस गंभीर समस्या पर कब तक संज्ञान लेता है। चितागढ़ के बच्चे आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद कोई पहल होगी और उनके जीवन में भी शिक्षा की रोशनी पहुंचेगी।

    यह भी पढ़ें- बिहार : शिकायत करते-करते खुद फंस गए शिक्षक, ई-शिक्षाकोष जांच में आईं गड़बड़ियां, सहयोग पोर्टल बना जांच का हथियार

    यह भी पढ़ें- बिहार भूमि सर्वे में खाता आधारित वंशावली को मान्यता; आमसभा में क‍िया जाएगा सत्यापन