बांकीपुर में कम मतदान नहीं, वोटों के बंटवारे से तय होती जीत-हार; क्या PK कर पाएंगे 'खेला'?
बांकीपुर उपचुनाव में 34.31% मतदान हुआ, जिसे कम माना जा रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, उपचुनाव में कम मतदान सामान्य है और जीत-हार संगठित वोट बैंक व बूथ ...और पढ़ें

जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर।
HighLights
बांकीपुर उपचुनाव में 34.31% मतदाताओं ने किया मतदान।
कम मतदान के बावजूद जीत कोर वोट बैंक पर निर्भर।
प्रशांत किशोर की एंट्री से राजनीतिक समीकरण दिलचस्प।
जागरण संवाददाता, पटना। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव (Bankipur Byelection 2026) में गुरुवार को 34.31 प्रतिशत मतदाताओं ने ही अपने अधिकार का प्रयोग किया। इसे कम बताते हुए तमाम लोग लंबे समय बाद भाजपा का गढ़ मानी जाने वाली इस प्रतिष्ठित सीट से उसका जनाधार खिसकने का दावा कर रहे हैं।
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक नवीन सिन्हा की मृत्यु के बाद 2006 में हुए बांकीपुर उपचुनाव में 19 प्रतिशत मतदान का उदाहरण दे इन तर्कों को कोरी अटकलें बता रहे हैं।
उनका कहना है कि उपचुनाव में आम विधानसभा चुनाव की तुलना में हमेशा कम मतदान होता है। 2006 में भाजपा ने पहली बार नवीन सिन्हा की जगह उनके पुत्र नितिन नवीन को उम्मीदवार बनाया था और उन्होंने रिकार्ड 82.31 प्रतिशत वोट प्राप्त किए थे।
उस समय राजद के अजय कुमार सिंह को 11.76 प्रतिशत व सपा के चंदन राय को 1.61 प्रतिशत वोट मिले थे। कम मतदान में जीत-हार संगठित-अनुशासित कोर वोट बैंक व मजबूत बूथ प्रबंधन पर निर्भर करती है यानी किसके मतदाता बूथ तक पहुंचे।
बांकीपुर का विजेता बदलेगा या विपक्ष का चेहरा, यह तो 3 अगस्त को पता चलेगा पर चौक-चौराहों पर यह चर्चा गर्म है कि मतदाताओं ने भाजपा के मजबूत माने जाने वाले संगठन, प्रशांत किशोर की नई राजनीति के विकल्प या तेजस्वी यादव की मजबूत विपक्ष, किसकों कितना समर्थन दिया है।
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कम मतदान, उदासीनता या त्रिकोणीय भ्रम:
बांकीपुर पूर्णतय: शहरी सीट है जहां मिश्रित आयवर्ग व विभिन्न जातियों के मतदाताओं की बड़ी संख्या है। आखिर वे कौन से कारण रहे कि पढ़ा-लिखा और मध्यम वर्ग मतदान दिवस को सामान्य छुट्टी मानकर अपने निजी कार्यों में व्यस्त रहा।
आश्चर्यजनक रूप से युवा मतदाता, जिन्होंने मतदान से सिर्फ चार दिन पहले बड़ा आंदोलन किया था वे भी एकजुट होकर उम्मीदों के अनुरूप बूथों तक नहीं पहुंचे। महिलाओं का प्रतिशत भी काफी कम रहा। ये वे मतदाता हैं, जिनके भरोसे चुनाव परिणाम उलटने के दावे किए जा रहे थे।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार विधानसभा चुनाव की तुलना में मतदाता एक-दो सीट पर होने वाले उपचुनावों में सामान्यत: उदासीन ही रहते हैं, क्योंकि इससे सत्ता में बदलाव की कोई आशंका नहीं होती।
उपचुनाव में यदि किसी दूसरे को जिता भी देंगे तो उससे किसी बदलाव की उम्मीद नहीं होती। ऐसे में इस बार यह देखना ज्यादा रोचक होगा कि जनता विपक्ष के रूप में किसको देखना चाहती है।
जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर के उतरने से इस बार यह देखना ज्यादा रोचक होगा कि राजद मजबूत विपक्ष के रूप में उभरता है या नहीं।
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