सारण में सरकारी तालाबों की बदहाली: अमृत सरोवर योजना में लाखों खर्च के बाद भी हालत जस के तस, जल संकट गहराया
दरियापुर प्रखंड के दर्जनों तालाब लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद बदहाल हैं, जिससे जल संकट गहरा रहा है। साफ-सफाई की कमी, अतिक्रमण और रखरखाव के अभाव के ...और पढ़ें
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दिनेशचंद्र द्विवेदी, दरियापुर (सारण)। सरकारी योजनाओं पर लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद दरियापुर प्रखंड के दर्जनों तालाब बदहाल स्थिति में हैं। साफ-सफाई, अतिक्रमण और रखरखाव की कमी के कारण इनका दायरा लगातार सिमटता जा रहा है, जिससे जल संकट गहराता जा रहा है। इसका सीधा असर पशु-पक्षियों, जंगली जानवरों और किसानों पर पड़ रहा है।
प्रखंड के 22 पंचायतों में कुल 103 सरकारी तालाब हैं, जो कभी सिंचाई, मत्स्य पालन और पेयजल का प्रमुख स्रोत हुआ करते थे। लेकिन वर्तमान में अधिकांश तालाबों की स्थिति दयनीय हो चुकी है।
अप्रैल की शुरुआत में कई तालाब सूखे
अप्रैल माह की शुरुआत में ही कई तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं, जबकि कुछ में बचा पानी भी कचरे और खरपतवार से दूषित होकर उपयोग लायक नहीं रह गया है। चारों ओर गंदगी का अंबार होने से तालाबों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
मनरेगा और पंचायत योजनाओं के तहत हर वर्ष सफाई और उड़ाही के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर नहीं दिखता। कई तालाबों के बांध (माउंट) टूटे होने के कारण बरसात का पानी भी टिक नहीं पाता और एक-दो माह में ही बाहर निकल जाता है।
सरकार का उद्देश्य था कि इन तालाबों में जल संचयन के साथ मत्स्य पालन को बढ़ावा मिले, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो, लेकिन यह लक्ष्य अधूरा ही रह गया है।
तालाबों की देखरेख न होने से बढ़ा अतिक्रमण
तालाबों की नियमित देखरेख नहीं होने के कारण अतिक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। आसपास के लोग धीरे-धीरे तालाब की जमीन पर कब्जा कर रहे हैं, जिससे इनका क्षेत्रफल लगातार घटता जा रहा है। स्थिति यह है कि प्रखंड के करीब 90 प्रतिशत तालाबों की सतह पर कचरा और झाड़-झंखाड़ फैला हुआ है।
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सरकार की महत्वाकांक्षी अमृत सरोवर योजना के तहत भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए हैं। प्रखंड के मुजौना, विशंभरपुर और हरिहरपुर पंचायतों में इस योजना के तहत 9-10 लाख रुपये की लागत से तालाबों के विकास का कार्य शुरू हुआ, लेकिन तीनों ही जगह काम अधूरा पड़ा है। योजना के मानकों के अनुसार यदि जीर्णोद्धार और साफ-सफाई होती, तो जल संरक्षण के साथ पर्यावरण संतुलन में भी मदद मिलती।
तालाबों का अस्तित्व खतरे में
स्थानीय लोगों में इस स्थिति को लेकर गहरा असंतोष है। समाजसेवी रामचंद्र पंडित बताते हैं कि पहले ग्रामीण स्वयं तालाबों की सफाई और देखभाल करते थे, जिससे पानी साफ रहता था और सिंचाई में आसानी होती थी। वहीं मछली पालक अर्जुन महतो का कहना है कि सरकारी उदासीनता के कारण तालाबों का अस्तित्व खतरे में है और योजनाओं का पैसा बेकार जा रहा है।
किसान शिवजी शर्मा के अनुसार, पहले इन तालाबों के पानी से सिंचाई होती थी और आपदा के समय भी यह सहारा बनते थे, लेकिन अब पानी का घोर अभाव है। किसान देवदत्त राय कहते हैं कि एक समय था जब साल भर तालाबों में पानी रहता था और पारंपरिक तरीकों से सिंचाई की जाती थी, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।
इस संबंध में मनरेगा पीओ राजेश कुमार ने बताया कि तालाबों के विकास से जुड़े सभी पहलुओं की जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि कई जगह मछली पकड़ने के कारण तालाबों के बांध टूट जाते हैं, जिससे पानी नहीं टिक पाता। शिकायत मिलने पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।