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    Explainer: चीन ने Decree 834 से दुनिया में मचाया तलहका, उड़ी सबकी नींद; क्या भारत को होगा नुकसान?

    Updated: Tue, 12 May 2026 02:46 PM (IST)

    चीन ने Decree 834 और 835 नियम जारी किए हैं, जो उसकी जवाबी प्रतिबंधों की रूपरेखा का विस्तार करते हैं और औद्योगिक व आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा पर केंद्रित ...और पढ़ें

    क्या है चीन का Decree 834

    क्या है चीन का Decree 834 

    HighLights

    1. चीन ने Decree 834 से आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा बढ़ाई।

    2. यह नियम वैश्विक कंपनियों पर प्रतिबंध लगा सकता है।

    3. भारत को भी ऐसे सुरक्षा फ्रेमवर्क की जरूरत है।

    नई दिल्ली। चीन समय-समय पर ऐसे कदम उठाता रहता है, जिसका वैश्विक स्तर पर व्यापक असर देखने को मिलता है। हाल ही में चीन की स्टेट काउंसिल ने तत्काल प्रभाव से दो नियम जारी किए थे जो चीन के जवाबी प्रतिबंधों के ढांचे का काफी विस्तार करते हैं। यह नियम Decree 834 और Decree 835 हैं। इनमें से हम पहले वाले नियम की चर्चा करेंगे। और बताएंगे आखिर ये है क्या, और चीनी सरकार ऐसा क्यों कर रही है? इसके साथ जानेंगे कि आखिर इसका भारत पर क्या असर पड़ेगा और यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि क्या चीन के इस नियम को भारत में भी आजमाना चाहिए? आइए जागरण बिजनेस के इस एक्सप्लेनर में सझते हैं।

    इससे पहले 2025 में चीन ने मध्यम और भारी रेयर अर्थ्स के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। चीन ने उस समय यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के टैरिफ के जवाब में लगाए थे। चीन के इस कदम के बाद ट्रंप ने चीन पर टैरिफ कम किया था। हालांकि, अब चीन ने जो नए नियम जारी किए हैं, उसके जरिए उसने ग्लोबल सप्लाई चेन को एक बड़ा जवाब दिया है।

    क्या है चीन का Decree 834?

    चीन का Decree 834 एक नियम है जो औद्योगिक और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा को लेकर है। आसान शब्दों में कहें तो यह चीन का औद्योगिक और सप्लाई चेन सुरक्षा पर पहला व्यापक नियम है। यह कोई नया नियम नहीं है। यह सप्लाई चेन की निगरानी के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा पर आधारित एक एकीकृत नियामक ढांचा तैयार करता है।

    यह नियम मल्टीनेशनल कंपनियों के उन व्यावसायिक गतिविधियों को जो चीन की महत्वपूर्ण सप्लाई चेन को 'काफी नुकसान पहुंचाती हैं या पहुंचा सकती हैं' नियामक जांच के दायरे में ले आता है। यानी इस नियम के जरिए चीन उन कंपनियों के उन व्यावसायिक गतिविधियों की जांच कर सकता है जो उसकी सप्लाई चेन को नुकसान पहुंचा रही हैं या नुकसान पहुंचा सकती हैं।

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    यह नियम अधिकारियों को विदेशी संस्थाओं या व्यक्तियों की कार्रवाइयों की समीक्षा करने और व्यापार व निवेश पर प्रतिबंधों अथवा बाजार तक पहुंच पर सीमाओं जैसे उपायों के साथ जवाबी कार्रवाई करने की अनुमति देता है।

    अगर कंपनियां जांच में दोषी पाई जाती हैं तो उन्हें व्यापार प्रतिबंध, निवेश पर रोक और वीजा निलंबन का सामना कर पड़ सकता है। यह डिक्री चीन के भीतर कुछ ऐसे अनिर्धारित सप्लाई-चेन जांच पर भी रोक लगाती है, जो चीनी कानूनों और नियमों का उल्लंघन करती हैं।

    चीन से दूर भाग रही ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग

    चीन धीरे-धीरे ग्लोबल मैन्यफैक्चरिंग का ताज खो रहा है। बड़ी-बड़ी कंपनियां जो एक समय चीन में अपना प्रोडक्शन करती थीं, अब वह चीन से निकलकर आरत और वियतनाम जैसे देशों में नए मैन्युफैक्चिंरग प्लांट स्थापित कर रही हैं। धीरे-धीरे करके मैन्युफैक्चिंग की वर्ल्ड फैक्टरी का दर्ज चीन खोता जा रहा है।

    चीन का डिग्री 834 नियम एक तरह से उन कंपनियों को रोकने और यही बनें रहने का प्रयास है जो चीन से निकलर दूसरे देशों में जा रही हैं। अन्य विकसित देशों के विपरीत, चीन पूरी विनिर्माण श्रृंखला पर अपना नियंत्रण रखना चाहता है कम-स्तरीय उत्पादन से लेकर उच्च-स्तरीय उत्पादन तक। यही कारण है कि वह इस तरह का नियम लाकर खुद को मैन्युफैक्चिंरग का किंग बनाए रहना चाहता है।

    चीन में काम कर रही कंपनियों के लिए यह नियम कहीं न कहीं सुरक्षा प्रदान करने का भी काम करेगा। इससे उन कंपनियों में ऐसा भाव पैदा होगा कि उन्हें चीन में सुरक्षा मिल रही है। इसलिए वो चीन छोड़ने के बारे में शायद ही सोचें।

    चीन के डिग्री 834 से भारत पर क्या पड़ेगा असर?

    चीन के नए नियम का असर भारत के उन मैन्युफैक्चरर्स पर पड़ सकता है जो चीन से सामान या कच्चा माल मंगवाते हैं। क्योंकि इस आदेश के तहत सप्लाई चेन की मैपिंग या ऑडिट करने की मनाही है।

    भारतीय ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) जो अमेरिकी कंपनियों के लिए उत्पादन करते हैं, उन्हें पहले से ही अमेरिकी नियमों का पालन करना जरूरी है। उइघुर जबरदस्ती श्रम रोकथाम अधिनियम (UFLPA) के तहत उन्हें चीन से जुड़ी सप्लाई चेन में इस्तेमाल होने वाले कंपोनेंट्स का पता लगाना, दस्तावेजों का रिकॉर्ड रखना, सप्लायर्स का ऑडिट करना और यह साबित करना जरूरी है कि किसी भी प्रतिबंधित सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

    BIS एंटिटी लिस्ट उन आयात पर रोक लगाती है जिनमें लिस्ट में शामिल संस्थाओं से प्राप्त तांबा, लिथियम, मोलिब्डेनम या टंगस्टन शामिल हों। ये नियम इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव, एयरोस्पेस, सोलर और टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में सप्लाई चेन को प्रभावित करते हैं, और इनके कारण पहले ही भारतीय शिपमेंट को जबरदस्ती श्रम से जुड़े संदिग्ध संबंधों के चलते रोक दिया गया है। अब जब आदेश 834 और 835 लागू हो गए हैं, तो भारतीय OEMs को अमेरिकी नियमों का पालन करने के लिए चीनी पेनल्टी का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि इस टकराव से निपटने के लिए उनके पास सरकार द्वारा समर्थित कोई ढांचा मौजूद नहीं है।

    क्या भारत को भी चीन की तरह ऐसे ही फ्रेमवर्क की जरूरत?

    विशेषज्ञों के अनुसार भारत को भी इसी तरह के फ्रेमवर्क की जरूरत है। भारत में जो कंपनियां काम कर रही हैं, उन्हें सुरक्षा का माहौल मिलना जरूरी है। उन्हें यह एहसास हो कि सरकार का फ्रेमवर्क उन्हें फायदा पहुंचा रहे हैं। खासकर तब जब भारत की धरती पर बाहर के देशों से जुड़ी ऐसी मांगें आती हैं जो आपस में टकराती हों। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को भी ऐसे ही किसी कानून की जरूरत है। कुछ अधिकारियों ने अमेरिका और चीन की तर्ज पर एक 'सप्लाई चेन सुरक्षा सिस्टम' बनाने की मांग की है।

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