इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एम्स विशेषज्ञ समिति लेगी अंतिम निर्णय, लग सकते हैं 15 दिन
सुप्रीम कोर्ट के इच्छामृत्यु आदेश के बाद एम्स विशेषज्ञ समिति हरीश राणा के मामले पर मंथन कर रही है। समिति उनकी वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन कर रही है, ज ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। हरीश राणा की इच्छामृत्यु मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) विशेषज्ञ चिकित्सकीय समिति प्रक्रिया आरंभ करने को लेकर मंथन कर रही है। इस बात पर भी विचार हो रहा है कि एम्स चिकित्सकों की टीम की निगरानी में हरीश राणा की वर्तमान स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुसार उन्हें एम्स में भर्ती कर निर्धारित प्रक्रिया पूरी की जाए या फिर उनके घर पर।
मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत होगी कार्रवाई
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट से मामले के जुड़े होने के कारण एम्स प्रबंधन इस बारे में अधिकृत जानकारी नहीं दे रहा है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि प्रकरण सुप्रीम कोर्ट के ऑब्जर्वेशन में है, इसलिए फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती। एम्स सूत्रों के अनुसार, हरीश राणा को विशेषज्ञों की निगरानी में रखा जाएगा और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों तथा तय चिकित्सा प्रोटोकाॅल के अनुसार आगे की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
तीन चरणों में एम्स लेगा फैसला
- हरीश राणा को एम्स विशेषज्ञ चिकित्सकों के मेडिकल सुपरविजन में रखना
- मेडिकल बोर्ड की निगरानी में उसकी स्थिति का अंतिम चिकित्सकीय मूल्यांकन और दस्तावेजीकरण करना
- कोर्ट के निर्देशों और स्थापित चिकित्सा प्रोटोकाल के अनुसार लाइफ-सपोर्ट से जुड़े निर्णयों की प्रक्रिया को लागू करना
- एम्स सूत्रों के अनुसार पूरी प्रक्रिया में एक सप्ताह से 15 दिन का समय लग सकता है। एम्स प्रशासन ने कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए इस संदर्भ में कोई भी जानकारी देने से इनकार किया है।
एम्स की रिपोर्ट : सुप्रीम कोर्ट ने मरीज की स्थिति का स्वतंत्र और वैज्ञानिक मूल्यांकन कराने के लिए एम्स के निदेशक को विशेषज्ञ चिकित्सकों का मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। बोर्ड में न्यूरोलाजी, न्यूरोसर्जरी, एनेस्थीसिया और क्रिटिकल केयर से जुड़े विशेषज्ञ शामिल थे।
एम्स मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में अदालत को बताया कि मरीज (हरीश राणा) लंबे समय से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में हैं। मरीज (हरीश राणा) बिस्तर पर पूरी तरह निर्भर है और स्वयं से कोई प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं है। सांस लेने के लिए उनके गले में ट्रेकियोस्टामी ट्यूब लगी है, जबकि भोजन गैस्ट्रोस्टामी ट्यूब के माध्यम से दिया जा रहा है।
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चिकित्सकों ने रिपोर्ट यह भी उल्लेख किया कि हाथ-पैरों में गंभीर जकड़न व मांसपेशियों में कठोरता (स्पास्टिसिटी) है, जिससे वह किसी भी प्रकार की स्वैच्छिक गतिविधि करने में सक्षम नहीं हैं। विशेषज्ञों ने अपने निष्कर्ष में कोर्ट को बताया था कि मरीज की स्थिति लंबे समय से अपरिवर्तित है और सामान्य जीवन में लौटने की संभावना लगभग नगण्य मानी जाती है।
चार चिकित्सकों ने तैयार की रिपोर्ट
न्यूरोलाजिस्ट डाॅ. सचिन गर्ग, प्लास्टिक सर्जन डाॅ. अमित श्रीवास्तव, एनेस्थीसियोलाॅजिस्ट डाॅ. अंकित कुमार और न्यूरोसर्जन डाॅ. अखिल प्रकाश की टीम ने गाजियाबाद स्थित हरीश राणा के घर पर जाकर उनकी स्वास्थ्य स्थिति का मूल्यांकन किया और इसके बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की।
क्या होती है स्थायी वेजिटेटिव स्टेट?
एम्स चिकित्सकों के अनुसार स्थायी वेजिटेटिव स्टेट, वह चिकित्सकीय स्थिति होती है, जिसमें व्यक्ति के मस्तिष्क का उच्च भाग (जो सोचने-समझने, बोलने और प्रतिक्रिया देने के लिए जिम्मेदार होता है) सामान्यत: लगभग काम करना बंद कर देता है, लेकिन शरीर की कुछ मूलभूत क्रियाएं जैसे सांस लेना, दिल धड़कना या आंखें खुलना-बंद होना ब्रेन स्टेम की वजह से जारी रहती हैं।
कृत्रिम पोषण की आवश्यकता
ऐसे मरीज आसपास की घटनाओं को समझ नहीं पाते और किसी आदेश या दर्द पर सार्थक प्रतिक्रिया नहीं देते। लंबे समय तक सुधार न होने और रिकवरी की संभावना लगभग समाप्त हो जाने पर चिकित्सक इस स्थिति को ‘स्थायी’ मानते हैं। ऐसे मरीजों को आमतौर पर लगातार चिकित्सा देखभाल और कृत्रिम पोषण की आवश्यकता होती है।
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