गंगा-यमुना सहित अधिकांश नदियां संक्रमित, झीलें-भूजल भी बने एएमआर के वाहक; WHO-UNEP की रिपोर्ट में आया सामने
डब्ल्यूएचओ-यूएनईपी की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा और यमुना सहित भारत की अधिकांश नदियाँ, झीलें और भूजल एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) के प्रमुख वाहक बन ...और पढ़ें
-1770846692484_m.webp)
गंगा और यमुना सहित देश की अधिकांश नदियां अब मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरे हैं।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। गंगा और यमुना सहित देश की अधिकांश नदियां अब मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े अदृश्य खतरे में बदलती जा रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की रिपोर्ट अनुसार भारत में नदियां, झीलें और भूजल एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) के बड़े वाहक, स्थायी भंडार बन चुके हैं।
डब्ल्यूएचओ-यूएनईपी की 'एनवायरनमेंटल डायमेंशन्स आफ एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस' रिपोर्ट अनुसार यूरोप, जापान और उत्तरी अमेरिकी देशों में 80 से 95 प्रतिशत शहरी अपशिष्ट जल का उन्नत उपचार होता है, जबकि भारत में 72 प्रतिशत अपशिष्ट जल बिना किसी प्रभावी उपचार के सीधे नदियों, झीलों और भूजल में प्रवाहित हो रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) व जल शक्ति मंत्रालय के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं।
डब्ल्यूएचओ और यूएनईपी अनुसार अनुपचारित घरेलू अपशिष्ट जल, औद्योगिक कचरा, अस्पतालों का डिस्चार्ज, कृषि बहाव, फार्मास्युटिकल प्रदूषण और पशुपालन से निकलने वाले एंटीबायोटिक अवशेष लगातार जल स्रोतों को दूषित कर रहे हैं। बिना आधुनिक अपशिष्ट जल उपचार, फार्मास्युटिकल उद्योग में जीरो डिस्चार्ज नीति, जल स्रोतों में एएमआर सर्विलांस और ‘वन हेल्थ’ आधारित नीतिगत समन्वय के इस संकट को रोका नहीं जा सकता। और यदि जल स्रोतों को समय रहते इस संकट से नियंत्रित नहीं किया गया तो यही नदियां और झीलें सबसे बड़ी ‘साइलेंट किलर’ साबित होंगी।
पशु और मत्स्य पालन
खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) अनुसार पशुपालन, पोल्ट्री और मत्स्य पालन में एंटीबायोटिक्स का अनियंत्रित उपयोग एएमआर के प्रसार का बड़ा स्रोत है। पशुओं-मछलियों को दी गई एंटीबायोटिक्स का बड़ा हिस्सा अपशिष्ट के रूप में जल स्रोतों में पहुंचता है।
खबरें और भी
भारत की स्थिति
यूएनईपी की रिपोर्ट बताती है कि विकसित देशों में टर्शियरी ट्रीटमेंट (अपशिष्ट जल के शोधन की सबसे उन्नत प्रक्रिया) से एंटीबायोटिक अवशेष और रेसिस्टेंस जीन को हटा दिया जाता है। जबकि भारत में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की क्षमता, तकनीक और कवरेज तीनों ही अपर्याप्त हैं। अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (आइडब्ल्यूएमआइ) की रिपोर्ट बताती है कि इस कारण भारत में नदियों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा और 31.5 करोड़ से अधिक लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष एएमआर के खतरे में हैं।
एएमआर के हॉटस्पॉट
आईसीएमआर, आईआईटी और आईडब्ल्यूएमआई के अध्ययनों अनुसार, गंगा, यमुना, कावेरी, कृष्णा और गोदावरी आदि नदियां अब एएमआर के घातक केंद्र बन चुकी हैं।
उत्तर भारत: यमुना और गंगा
दिल्ली में यमुना नदी एएमआर का बड़ा केंद्र है। आइसीएमआर के अध्ययनों के अनुसार यमुना के पानी और तलछट में 139 से अधिक रेसिस्टेंस जीन पाए गए हैं, जिनमें ब्ला-एनडीएम-1, ब्ला-सीटीएक्स-एम-15 और ब्ला-टीईएम-1 प्रमुख हैं। जिनमें 57.5 प्रतिशत ई.कोलाई स्ट्रेन दो एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी हैं, जबकि 20 प्रतिशत स्ट्रेन बहु दवा प्रतिरोधी हैं। क्लास-1 इंटीग्रान की मौजूदगी 75 प्रतिशत नमूनों में मिली, जो रेसिस्टेंस जीन के प्रसार का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
सीपीसीबी के जल गुणवत्ता आंकलन में यमुना में क्रोमियम, सीसा जैसी भारी धातुओं के साथ-साथ सिप्रोफ्लोक्सासिन, एम्पिसिलिन, गैटिफ्लोक्सासिन, सेफ्यूरोक्सिम और आफ्लोक्सासिन एंटीबायोटिक दवा के अवशेष की पुष्टि हुई।
गंगा नदी की स्थिति भी गंभीर है। आइआइटी बीएचयू व बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार गंगा क्षेत्र के आसपास भूजल में सल्फोनामाइड रेसिस्टेंस जीन मिले। इनका स्रोत अस्पताल और घरेलू अपशिष्ट जल पाया गया। डब्ल्यूएचओ-यूएनईपी की रिपोर्ट बताती है कि ऊपरी गंगा क्षेत्र (ऋषिकेश व हरिद्वार) में तीर्थयात्रा और स्नान पर्व के समय ब्ला-एनडीएम-1 जीन की मात्रा 20 गुना तक बढ़ जाती है। गोमती और सरयू नदियों में भी रेसिस्टेंस जीन की पुष्टि हुई है।
दक्षिण भारत: कावेरी, कृष्णा और गोदावरी
आइडब्ल्यूएमआई व आईसीएमआर के अध्ययन के अनुसार कावेरी नदी में कृषि बहाव, शहरी अपशिष्ट से प्रतिरोधी बैक्टीरिया लगातार बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) की निगरानी रिपोर्ट्स बताती है कि कृष्णा व गोदावरी बेसिन में पर्व के समय एएमआर में बढ़ोतरी के साथ अरकावती, स्वर्णा और नेत्रावती जैसी छोटी नदियों में भी विभिन्न एंटीबायोटिक की पुष्टि हुई है।
झीलें, तालाब और भूजल: छिपा लेकिन स्थायी खतरा
आईसीएमआर और यूएनईपी की रिपोर्ट अनुसार, झीलों, तालाबों की तलछट एएमआर का भंडार बन चुकी है जो बाढ़, सूखे में सक्रिय हो जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बड़ा खतरा भूजल में सेफलोस्पोरिन प्रतिरोधी ई.कोलाई मिला। साफ है कि एएमआर अब केवल पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के उपचार अधिकार का प्रश्न बन चुका है।