तीन साल में 20 करोड़ से ज्यादा की नकली दवाएं खपा चुका था गिरोह, दिल्ली से छोटे पार्सलों में होती थी सप्लाई
दिल्ली क्राइम ब्रांच ने एक बड़े नकली दवा गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जिसने तीन साल में 20 करोड़ रुपये से अधिक की नकली दवाएं देशभर में बेचीं। यह गिरोह स ...और पढ़ें

20 करोड़ से ज्यादा की नकली दवाएं खपाई। (AI Generated Image)
HighLights
तीन साल में 20 करोड़ की नकली दवाएं बेचीं।
सरकारी दवाओं के लेबल बदलकर बाजार में बेचते थे।
कैंसर, डायबिटीज की दवाओं में सस्ते फिलर मिलाए।
मोहम्मद साकिब, नई दिल्ली। राजधानी में नकली दवाओं के कारोबार का भंडाफोड़ कर क्राइम ब्रांच की जांच में सामने आया है कि गिरफ्तार आरोपितों का गिरोह पिछले तीन वर्षों में 20 करोड़ रुपये से अधिक की नकली दवाएं देशभर में खपा चुका है। गिरोह न केवल नकली दवाएं तैयार करता था, बल्कि सरकारी अस्पतालों और डिस्पेंसरियों में सप्लाई होने वाली दवाओं के लेबल बदलकर उन्हें बाजार में बेचता था।
पुलिस पूछताछ में पता चला है कि इस नेटवर्क में कई थोक दवा व्यापारी और अन्य लोग भी शामिल हैं। उनकी तलाश में दिल्ली समेत कई राज्यों में छापेमारी की जा रही है। जांच एजेंसियां प्रयागराज के सरकारी अस्पतालों और डिस्पेंसरियों के कुछ अधिकारियों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं, जिन पर गिरोह से मिलीभगत का संदेह है।
क्राइम ब्रांच अब ड्रग कंट्रोलर विभाग के साथ मिलकर यह पता लगाने में जुटी है कि नकली दवाओं की सप्लाई किन-किन राज्यों और बाजारों तक की गई। शुरुआती जांच में गुवाहाटी को इस नेटवर्क का मुख्य हाटस्पाट माना जा रहा है। दिल्ली से दवाओं को छोटे-छोटे पार्सलों में ट्रेन और बस के जरिए गुवाहाटी भेजा जाता था, ताकि किसी को शक न हो। वहां से इन्हें बंगाल और मिजोरम समेत पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में सप्लाई किया जाता था।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, आरोपित बड़े पार्सल भेजने से बचते थे, ताकि जांच एजेंसियों की नजर में न आएं। अब पुलिस पूरे नेटवर्क, सप्लाई चेन और इससे जुड़े अन्य लोगों की तलाश में छापेमारी कर रही है।
ऐसे तैयार करते थे नकली दवाएं
पुलिस जांच में पता चला है कि कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों की दवा इसलिए महंगी होती हैं क्योंकि इनमें जटिल बायोलाजिकल या केमिकल एक्टिव इंग्रीडिएंट (एपीआइ) के साथ सख्त गुणवत्ता नियंत्रण और नियंत्रित तापमान पर निर्माण की जरूरत होती है। इंसुलिन जैसे उत्पाद बायोटेक्नोलाजी से तैयार होते हैं, जिनकी स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट भी बेहद संवेदनशील होती है। पर, यह गिरोह इन महंगे घटकों को पूरी तरह हटा देता था।
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उनकी जगह सलाइन या डिस्टिल्ड वाटर इंजेक्शन वायल में भर दिया जाता था, टैबलेट्स में स्टार्च, चाक पाउडर या अन्य सस्ते फिलर मिलाए जाते थे। कई मामलों में बहुत कम मात्रा में असली दवा मिलाकर इसे परीक्षण से बचाने की कोशिश भी की जाती थी। दिल्ली के भागीरथ पैलेस जैसे थोक दवा बाजारों में हुई कार्रवाइयों में यह पैटर्न बार-बार सामने आया है, जिनमें असली पैकेजिंग और वायल का दोबारा इस्तेमाल कर नकली दवाओं को तैयार किया गया था।
सैदाबाद से भी दवा खरीदकर बेचता था लैब टेक्नीशियन
गिरफ्तार किया गया लैब टेक्नीशियन विक्रम सिंह उर्फ सनी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) सैदाबाद से भी अनुपयोगी दवाएं खरीदकर करके उसे गिरोह के सरगना मनोज कुमार जैन को बेचता था। उसके इस काम में प्रयागराज का ही एमबीए तक की पढ़ाई करने वाला वतन भी सहयोग करता था। सरकारी अस्पताल और सीएचसी से दवा लेकर मनोज को बेचकर मुनाफा कमाते थे।
हालांकि सीएचसी से दवा कैसे और किसके माध्यम से खरीदता था, यह अभी साफ नहीं हो सका है, लेकिन कुछ स्वास्थ्यकर्मियों की मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है। उसकी गिरफ्तारी का पता चलते ही स्वास्थ्य विभाग में खलबली मच गई है। विक्रम सिंह डफरिन अस्पताल के सामने सीआरएल डायग्नोस्टिक्स सेंटर चलाता है। उसके पास लैब टेक्नीशियन का डिप्लोमा है, जिस कारण उसकी सरकारी अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में पैठ है।