'जन्मपत्री और वैक्सीनेशन कार्ड उम्र का सबूत नहीं', दिल्ली HC से POCSO केस में आरोपी बरी
दिल्ली हाईकोर्ट ने पॉक्सो मामले में एक व्यक्ति को बरी करने का फैसला बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि ...और पढ़ें
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न्यायमूर्ति नवीन चावला व न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ ने कहा कि जन्मपत्री और वैक्सीनेशन कार्ड उम्र का साक्ष्य नहीं माने जा सकते।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। 16 साल की लड़की के अपहरण और दुष्कर्म के मामले में एक व्यक्ति को बरी करने के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पाक्सो) के तहत आने वाले मामलों में पीड़ित की उम्र ही सबसे अहम सवाल होता है, लेकिन लड़की के माता-पिता न तो उसकी जन्मतिथि बता पाए और न ही रिकाॅर्ड के तौर पर उसका असली जन्म प्रमाण पत्र पेश कर पाए। न्यायमूर्ति नवीन चावला व न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ ने कहा कि जन्मपत्री और वैक्सीनेशन कार्ड उम्र का साक्ष्य नहीं माने जा सकते और इस कारण से व्यक्ति पर पाक्सो अधिनियम के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
जन्मतिथि के प्रमाणन पर कही बड़ी बात
अदालत ने कहा कि अपनी गवाही में लड़की के पिता ने बताया कि उनकी पत्नी ने स्कूल में दाखिले के लिए जन्म के समय बनवाई गई अपनी बेटी की जन्मपत्री का इस्तेमाल किया था। हालांकि, पीठ ने माना कि जन्मपत्री को जन्मतिथि का साक्ष्य नहीं माना जा सकता और जन्मपत्री के आधार पर स्कूल के रिकाॅर्ड में दर्ज की गई उम्र को भी उम्र का साक्ष्य नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि जच्चा-बच्चा रक्षा कार्ड या वैक्सीनेशन कार्ड में दर्ज जन्मतिथि भी वैध नहीं थी।
पोक्सो एक्ट नहीं हो सका लागू
मामले पर सुनाए अपने निर्णय में पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि असली दस्तावेज के अभाव में अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि घटना के समय पीड़ित लड़की नाबालिग थी। इसलिए इस मामले में पाेक्सो अधिनियम लागू नहीं होता।
अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि 16 साल की नाबालिग का जनवरी 2013 में प्रतिवादी ने अपहरण कर लिया था और इसके बाद नाबालिग अमृतसर में मिली थी। पुलिस ने मामले में अपहरण और दुष्कर्म के साथ ही पाक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था।
पुलिस के अनुसार लड़की ने एक मोबाइल फोन से अपने घर पर फोन किया था और इसके मिली लाकेशन के आधार पर आरोपित को अमृतसर रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया।
निर्णय के खिलाफ दायर अपील याचिका खारिज
वहीं, आरोपित ने उसे झूठा फंसाये जाने का दावा किया था और जुलाई 2019 में ट्रायल कोर्ट ने उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया था। निर्णय के खिलाफ दायर अपील याचिका काे खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष प्रतिवादी के अपराध को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों में ऐसी कोई विकृति या अवैधता नहीं है जिसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।
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