जिला जजों की सुरक्षा पर दिल्ली HC का सख्त रुख: गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और पुलिस को रणनीति बनाने के निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने जिला जजों की सुरक्षा पर गंभीर रुख अपनाया है। एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और पुलिस को एक सप्ता ...और पढ़ें
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दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को एक सप्ताह के अंदर बैठक करने का निर्देश दिया है।

समय कम है?
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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। जिला अदालतों के जजाें की सुरक्षा को लेकर दायर की गई एक याचिका को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को एक सप्ताह के अंदर बैठक करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के जजों की सुरक्षा का मुद्दा बहुत जरूरी है और इस पर कुछ न कुछ जरूर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि याचिका में उठाई गई शिकायत की गंभीरता को किसी भी नजरिए से कम करके नहीं देखा जा सकता।
उक्त टिप्पणी के साथ अदालत ने बैठक के दो सप्ताह के अंदर एक रिपाेर्ट पेश करने का भी आदेश दिया।पीठ ने यह भी कहा कि बैठक में अधिकारियों को इस बारे में जानकारी लेनी चाहिए कि क्या दूसरे राज्यों ने भी न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए इंतजाम किए गए हैं। अदालत ने उक्त टिप्पणी और निर्देश ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन फ दिल्ली नामक एसोसिएशन की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया।
याचिका में जिला जजों को पर्सनल सिक्योरिटी आफिसर (पीएसओ) मुहैया कराने के साथ ही घरों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की है। एसोसिएशन की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने दावा किया कि ज्यातर न्यायिक अधिकारी अपनी गाड़ियां खुद चलाते हैं और बीते दिनों में जजों के साथ पीछा करने, धमकी देने और रोड रेज की कई घटनाएं हो चुकी हैं। यह भी कहा कि कई बार न्यायिक अधिकारियों को गैंगवार से जुड़े कई आपराधिक मामलों को देखना पड़ता है।
कीर्ति उप्पल ने अदालत को बताया कि एक घटना ऐसी हुई थी, जिसमें एक महिला जज से कहा गया था कि अगर जिंदा रहना है तो कम बोलो। इस दौरान दिल्ली सरकार की तरफ से पेश हुए स्थायी अधिवक्ता (अपराध) संजय लाओ ने कहा कि इस जरूरी मुद्दे पर जल्द ही कोई निर्णय लिया जाएगा। सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकार्ड पर लिया कि इस संबंध में जजों के एसोसिएशन ने दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को एक प्रतिवेदन भेजा था, लेकिन उसकी मौजूदा स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
उक्त तथ्यों को देखते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को याचिका में एक पक्षकार के तौर पर शामिल करें। साथ ही रजिस्ट्रार जनरल से उक्त प्रतिवेदन की मौजूदा स्थिति पर एक रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया।
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