अधिवक्ताओं के कार्य से विरत रहने के कारण दिल्ली HC में नहीं हुआ काम, आज भी जारी रहेगी हड़ताल
दिल्ली हाई कोर्ट के अधिवक्ताओं ने जिला अदालतों के सिविल मामलों के आर्थिक क्षेत्राधिकार को बढ़ाने के प्रस्ताव के खिलाफ मंगलवार को कार्य से विरत रहकर वि ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट। सांकेतिक तस्वीर
HighLights
अधिवक्ताओं ने जिला अदालतों के आर्थिक क्षेत्राधिकार बढ़ाने का विरोध किया।
डीएचसीबीए अध्यक्ष ने हड़ताल को सफल बताया, बुधवार को भी जारी।
प्रस्ताव से न्याय व्यवस्था और वकीलों की आजीविका पर असर।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। जिला अदालतों के सिविल मामलों के आर्थिक अधिकार क्षेत्र को दो करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये करने के प्रस्ताव के खिलाफ मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट के अधिवक्ता बड़ी संख्या में कार्य से विरत रहे।
कुछ अधिवक्ताओं के न्यायमूर्ति नवीन चावला की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पेश होने पर दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (डीएचसीबीए) के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने मंगलवार को वकीलों से अपील की कि वे हाई कोर्ट में पेश न हों और कार्य से विरत रहें।
आज भी कार्य से विरत रहेंगे अधिवक्ता
हरिहरन ने अधिवक्ताओं से कहा कि क्या आपको लगता है कि यह आपराधिक मामलों में नहीं आएगा? यह क्रिमिनल मामलों में भी आएगा। उन्होंने कहा कि जब संगठन एक मकसद के लिए खड़ा है तो भगवान के लिए हमारे साथ खड़े रहें।
उन्होंने कहा कि मैं अदालत की कार्यवाही नहीं रोक सकता, लेकिन मैं आप लोगों से अनुरोध कर सकता हूं। इस पर न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने कहा कि अदालत किसी पर भी बहस करने के लिए जोर नहीं दे रही है।
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न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ के समक्ष भी अधिवक्ताओं के पेश होने पर हरिहरन ने अधिवक्ताओं ने यही अपील की। साथ ही पीठ को संबोधित करते हुए हरिहरन ने कहा कि बीच में बोलने के लिए मैं अदालत से माफी चाहता हूं।
इस पर पीठ ने कहा कि आप अपना काम कर रहे हैं और हम अपना। बड़ी संख्या में अधिवक्ताओ के कार्य से विरत रहने पर डीएचसीबीए अध्यक्ष एन हरिहरन ने कहा कि हड़ताल सफल रही और 15 जुलाई को भी अधिवक्ता कार्य से विरत रहेंगे।
हाई कोर्ट से ज्यादा मामले जिला अदालतों पर लंबित
उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट से ज्यादा मामले जिला अदालतों पर लंबित है और सिविल मामलों को निपटाने की दर हाई कोर्ट की बेहतर है। ऐसे में आर्थिक क्षेत्राधिकार को बढ़ाकर जिला अदालतों पर अतिरिक्त बोझ क्यों बढ़ाया जा रहा है। आखिरिकार, इससे वादी को ही परेशानी होगी और अदालतों पर बोझ बढ़ेगा।
डीएचसीबीए ने चिंता जताई कि इस प्रस्ताव का न्याय व्यवस्था पर दूरगामी असर पड़ेगा और दिल्ली हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले बड़ी संख्या में वकीलों की प्रैक्टिस, आजीविका और पेशेवर हितों पर भी बुरा असर पड़ेगा।
डीएचसीबीए ने दावा किया कि आर्थिक सीमा में प्रस्तावित बढ़ोतरी के कारण ओरिजिनल साइड के लगभग 70 प्रतिशत मामले स्थानांतरित हो जाएंगे।
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