हर साल लाखों जन्म, फिर भी 'नवजात ब्रेन ट्यूमर' पर देश के खाली हाथ; विशेषज्ञों ने उठाई राष्ट्रीय डेटाबेस की मांग
भारत में हर साल ढाई करोड़ से अधिक बच्चों का जन्म होता है, लेकिन नवजात ब्रेन ट्यूमर के मामलों का कोई राष्ट्रीय डेटाबेस नहीं है। विशेषज्ञों ने इस गंभीर ...और पढ़ें

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HighLights
भारत में नवजात ब्रेन ट्यूमर का राष्ट्रीय डेटा उपलब्ध नहीं।
प्रति वर्ष ढाई करोड़ से अधिक बच्चों का जन्म होता है।
विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय रजिस्ट्री बनाने की सिफारिश की है।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। भारत में हर वर्ष औसतन ढाई करोड़ से अधिक बच्चों का जन्म होता है, राष्ट्रीय राजधानी में यह संख्या 3.06 लाख के करीब है। इनमें से कई बेहद दुर्लभ बीमारी अनुवांशिक ब्रेन ट्यूमर की बीमारी के साथ जन्म लेते हैं, कइयों में यह बीमारी जन्म के आरंभिक दिनों में हो जाती है।
बावजूद इसके जन्म के समय या आरंभिक दिनों में ब्रेन ट्यूमर से प्रभावित होने वाले नवजातों की वास्तविक संख्या का देश में कोई आंकड़ा या डाटा बेस ही नहीं है। नवजात ब्रेन ट्यूमर तेजी से बढ़ रही बेहद दुर्लभ बीमारी है।
प्रभावित नवजातों का कोई रिकॉर्ड नहीं
उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय शोध में जन्मजात ब्रेन ट्यूमर की दर एक से चार मामले प्रति एक लाख जीवित जन्म बताई गई है। पर, भारत में राष्ट्रीय रजिस्ट्री या एकीकृत डाटाबेस नहीं होने से यह पता नहीं चल पाता कि देश में हर वर्ष वास्तव में कितने नवजात इस बीमारी से प्रभावित होते हैं।
यही कारण है कि देश में इससे निपटने को कोई ठोस राष्ट्रीय नीति भी अब तक नहीं बनाई जा सकी। एम्स में इंडियन सोसायटी फार पीडियाट्रिक न्यूरोसर्जरी की हाल ही में हुई मिडटर्म बैठक में विशेषज्ञों ने इसपर चिंता जताई और सरकार से नवजात ब्रेन ट्यूमर की राष्ट्रीय रजिस्ट्री या डाटाबेस तैयार करने की सिफारिश की।
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देश में हर साल करीब ढाई करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। दिल्ली सरकार के आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय के अनुसार, 2024 में दिल्ली में 3,06,459 जन्म पंजीकृत हुए। इतनी बड़ी संख्या में जन्म होने के बावजूद नवजात ब्रेन ट्यूमर के मामलों का राष्ट्रीय स्तर पर कोई व्यवस्थित रिकार्ड का न होना चिंताजनक स्थिति है।
वास्तविक संख्या कहीं अधिक
अभी तक इस मामले में अलग-अलग अस्पतालों में सामने आने वाले मामलों के आधार पर ही बीमारी की व्यापकता को मापा जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों को आशंका है कि अस्पतालों तक पहुंचने और रिकार्ड में दर्ज होने वाले मामलों से वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।
इसलिए देश मेन इसकी रोकथाम के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ठोस नीति की आवश्यकता है परघ, राष्ट्रीय डाटा बेस न होने से यह संभव नहीं हो पा रहा।
राष्ट्रीय आंकड़े नहीं होने से यह आकलन करना भी मुश्किल है कि बीमारी के मामले वास्तव में बढ़ रहे हैं या बेहतर जांच और इमेजिंग सुविधाओं के कारण अब पहले से अधिक मामलों की पहचान हो रही है।
दूरदराज के क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाओं की सीमित उपलब्धता के कारण कई संदिग्ध मरीज बड़े केंद्रों तक नहीं पहुंच पाते।
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