'पहले कुछ संपादकों का समूह, अब दर्शक तय कर रहे राष्ट्रीय एजेंडा', पत्रकार रुबिका लियाकत की दो टूक
हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने पर आयोजित चर्चा में मीडिया की बदलती प्रकृति और चुनौतियों पर बात हुई। रुबिका लियाकत ने कहा कि अब दर्शक राष्ट्रीय ...और पढ़ें

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में जागरण कृति सम्मान- 2025 समारोह में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष विषय पर परिचर्चा के दौरान बोलतीं वरिष्ठ टीवी पत्रकार रूबिका लियाकत साथ मौजूद (बाएं से दाएं) वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी,आइआइएमसी की वाइस चांसलर डाॅ. प्रज्ञा पालीवाल गौड़ व दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी। जागरण
HighLights
पत्रकारिता में वैचारिक स्पष्टता, आत्म-नियंत्रण आवश्यक है।
रुबिका लियाकत: दर्शक अब राष्ट्रीय एजेंडा तय करते हैं।
मीडिया शिक्षा में एआई, डिजिटल मीडिया का समावेश।
नेमिष हेमंत, नई दिल्ली। हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित विशेष चर्चा में जब प्रिंट, टीवी और मीडिया शिक्षा से जुड़े दिग्गज जुटे तो चर्चा मीडिया की बदलती प्रकृति, उसके विरुद्ध बनाए जाते गोदी मीडिया के नैरेटिव से साख पर सवाल व नई तकनीकों की चुनौतियों से हाेते हुए अन्य आयामों को समग्रता से समेटे थी।
मंच पर जब मौजूद हो टीवी की धाकड़ पत्रकार रुबिका लियाकत और इलेक्ट्रानिक के साथ प्रिंट मीडिया को गहराई देने वाले दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी और संचालन प्रखर पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी के हाथ हो तो बेबाकी से हर बिंदुओं को छुआ ही जाना था। भारतीय जनसंचार संस्थान (आइआइएमसी) की महानिदेशक डाॅ. प्रज्ञा पालीवाल ने शैक्षणिक संस्थान की राह में आते बदलाव से रूबरू कराया।

'आवश्यकता है वैचारिक स्पष्टता और आत्म-नियंत्रण की'
चर्चा की शुरुआत करते हुए विष्णु त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकार शब्द को अब संवादी के रूप में पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है।
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उन्होंने कहा कि उदंत मार्तंड और दैनिक जागरण दोनों एक ही गोत्र के हैं, क्योंकि एक उगते सूर्य का प्रतीक है और दूसरा प्रतिदिन जागरण का। हिंदी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन आज सबसे बड़ी आवश्यकता वैचारिक स्पष्टता और आत्म-नियंत्रण की है।
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पत्रकारिता में निष्पक्षता का दावा कई बार भ्रम पैदा करता है। कोई भी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हो सकता। पत्रकार का अपना वैचारिक आधार होता है। महत्वपूर्ण यह है कि उसकी विश्वसनीयता बनी रहे। उन्होंने आगे कहा कि दबाव बाहर से नहीं आता, बल्कि उसे महसूस किया जाता है। जिसकी वैचारिक रीढ़ मजबूत है, वह दबाव महसूस नहीं करता।
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'राष्ट्रहित में खड़े होते ही कहलाते हैं पक्षपाती'
रुबिका लियाकत ने टीवी पत्रकारिता पर लगने वाले शोर और गोदी मीडिया जैसे आरोपों पर जवाब देते हुए कहा कि आज की मीडिया पूरी तरह दर्शकों की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया के दबाव में काम करती है।
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उन्होंने कहा कि पहले कुछ संपादक मिलकर राष्ट्रीय एजेंडा तय करते थे, लेकिन अब इंटरनेट मीडिया और दर्शक सीधे मीडिया के विषय तय कर रहे हैं। टीवी की दुनिया में केवल टीआरपी ही नहीं बल्कि दर्शकों का भरोसा सबसे बड़ा पैमाना है।
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आज दर्शक पहले से अधिक जागरूक हैं और किसी भी तथ्यात्मक गलती पर तुरंत सवाल उठाते हैं। टीवी पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती अब सेंसरशिप नहीं बल्कि विश्वसनीयता का क्षरण है, जिसके लिए वे लोग ही जिम्मेदार हैं, जो मुख्य मुद्दों से इतर कभी टीवी चैनलों पर सांप, स्वर्ग की सीढ़ी और औघड़ और श्मशान के शो चलाते थे।

रुबिका ने आगे कहा कि यदि कोई पत्रकार अपने देश, संस्कृति और राष्ट्रीय हितों के पक्ष में खड़ा होता है तो उसे तुरंत पक्षपाती कहा जाता है। लेकिन राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्ध होना कोई अपराध नहीं है।
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छात्रों को मल्टीमीडिया और नई तकनीकों का दें ज्ञान
डा. प्रज्ञा पालीवाल गोयल ने पत्रकारिता शिक्षा में तेजी से आ रहे बदलावों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज मीडिया शिक्षा केवल पारंपरिक पत्रकारिता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), डिजिटल मीडिया और कन्वर्जेंस पत्रकारिता को भी शामिल किया जा रहा है। आज प्रिंट, टीवी और डिजिटल के बीच की सीमाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। इसलिए छात्रों को मल्टीमीडिया और नई तकनीकों के लिए तैयार करना जरूरी है।

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