जिसे आज छोटानागपुर पठार कहते हैं, वह कभी अथाह जलराशि का हिस्सा था; वैज्ञानिकों ने खोजे 3.2 अरब साल पुराने समुद्री राज
भूगर्भीय अध्ययनों से खुलासा हुआ है कि करोड़ों साल पहले झारखंड और रांची का पठारी क्षेत्र समुद्र के भीतर था। वैज्ञानिकों के अनुसार, सिंहभूम पृथ्वी का वह ...और पढ़ें

पठारों में छिपे समुद्र के रहस्य, गहरे भूवैज्ञानिक रहस्य उजागर।
HighLights
रांची और झारखंड क्षेत्र कभी प्राचीन समुद्र का हिस्सा था।
सिंहभूम में 3.2 अरब साल पुराने समुद्री प्रमाण मिले।
भूवैज्ञानिकों ने छोटानागपुर पठार के समुद्री अतीत की पुष्टि की।
हिमकर श्याम, रांची। धरती और समुद्र का संबंध केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी के निर्माण, उसके विकास और जीवन की उत्पत्ति से गहराई से जुड़ा हुआ है। पृथ्वी के लगभग तीन-चौथाई हिस्से में फैली अथाह जलराशि के रूप में समुद्र आदिकाल से ही मानव की जिज्ञासा, विस्मय और आकर्षण का केंद्र रहा है।
यह केवल जीवन की उत्पत्ति का स्रोत ही नहीं, बल्कि अनगिनत रहस्यों, अपार संपदाओं और अनदेखे संसारों का विशाल भंडार भी है, जिसकी गहराइयों में आज भी अनेक अनसुलझे रहस्य छिपे हुए हैं। भारत प्राचीन काल से ही समृद्ध समुद्री परंपरा वाला देश रहा है।
समुद्री मार्गों के माध्यम से भारतीय व्यापार ने न केवल आर्थिक बल्कि सांस्कृतिक विकास को भी नई दिशा दी। आज भी समुद्री परिवहन भारत के विदेशी व्यापार की रीढ़ है। इसी परंपरा की याद दिलाने के लिए हर वर्ष पांच अप्रैल को राष्ट्रीय समुद्री दिवस मनाया जाता है, जो समुद्री क्षेत्र से जुड़े लोगों के योगदान को सम्मान देने और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग के प्रति जागरूक करता है।
3.2 अरब वर्ष पहले पहला महाद्वीपीय भूभाग
इस अवसर पर यह तथ्य रोचक है कि आज का रांची और झारखंड क्षेत्र, जो वर्तमान में एक पठारी भूभाग है, करोड़ों वर्ष पहले समुद्री परिवेश से जुड़ा हुआ था। भूगर्भीय अध्ययनों में यहाँ पाई जाने वाली चट्टानों, बलुआ पत्थर, चूना पत्थर तथा शंख-कोरल जैसे जीवाश्म समुद्री प्रभाव के संकेत देते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 3.2 अरब वर्ष पहले पृथ्वी का पहला महाद्वीपीय भूभाग बना।
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उस समय विश्व का एक प्राचीन समुद्र तट आज के झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र में स्थित था। आज भले ही रांची समुद्र से दूर है, लेकिन इसकी चट्टानों और खनिज संरचनाओं में उस प्राचीन समुद्री इतिहास की झलक अब भी सुरक्षित है।
यह क्षेत्र कभी समुद्री तल का हिस्सा रहा होगा
रांची छोटानागपुर पठार का हिस्सा है, जो पृथ्वी के सबसे प्राचीन भूभागों में माना जाता है। इसका वर्तमान पठारी स्वरूप करोड़ों वर्षों के समृद्ध भूगर्भीय इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। भूवैज्ञानिक संकेत बताते हैं कि यह क्षेत्र कभी समुद्री तल का हिस्सा रहा होगा।
यहां पाई जाने वाली कांग्लोमरेट जैसी अवसादी चट्टानें, उनकी परतदार संरचना और गोल कण जल या समुद्री निक्षेपण की प्रक्रिया के प्रमाण देते हैं। रांची पठार की चट्टानों को अत्यंत प्राचीन भू-रचनाओं से जोड़ा जाता है, जिनकी तुलना अरावली जैसी प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं से की जाती है।
प्लेटों की टकराहट, भू-उत्थान और लंबे समय तक हुए क्षरण जैसी टेक्टोनिक प्रक्रियाओं ने इस क्षेत्र को निरंतर रूपांतरित किया। इसी कारण जो भूभाग कभी जलमग्न रहा होगा, वही आज एक ऊँचे और स्थिर पठार के रूप में दिखाई देता है।
सिंहभूम क्षेत्र से ऐसे भूगर्भीय प्रमाण मिले
झारखंड की धरती करोड़ों वर्षों के लंबे भूगर्भीय इतिहास की साक्षी रही है। भारत, आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिकों के संयुक्त शोध में सिंहभूम क्षेत्र से ऐसे भूगर्भीय प्रमाण मिले हैं, जो संकेत देते हैं कि यहाँ कभी समुद्र तट रहा होगा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि सिंहभूम लगभग 320 करोड़ वर्ष पहले समुद्र से उभरने वाला पृथ्वी का सबसे प्राचीन जमीनी हिस्सा है। आस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक प्रियदर्शी चौधरी के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में लगभग 3.2 अरब वर्ष पुरानी चट्टानों में पाए गए जिरकोन कणों का विश्लेषण किया गया, जिससे उस समय नदियों और समुद्रों के अस्तित्व के संकेत मिले।
इसी प्रकार राजमहल क्षेत्र में मिले लगभग 28 करोड़ वर्ष पुराने पौधों के जीवाश्म बताते हैं कि यह भूभाग समय-समय पर घने वन, ज्वालामुखीय क्षेत्र और समुद्री परिवेश का हिस्सा रहा है। बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के अध्ययनों के अनुसार राजमहल क्षेत्र कभी समुद्रीय प्रक्षेत्र का भाग था।
वहीं दामोदर घाटी और गोंडवाना बेसिन की चट्टानों में मिले अवसाद और जीवाश्म इस बात के प्रमाण देते हैं कि करोड़ों वर्ष पहले यह क्षेत्र उथले समुद्र या तटीय वातावरण से प्रभावित रहा होगा।
क्या कहते हैं जानकार
भूगर्भीय और भौगोलिक अध्ययन से संकेत मिलता है कि करोड़ों वर्ष पहले रांची क्षेत्र कभी समुद्री प्रभाव में रहा होगा। रांची विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं प्रख्यात भूवैज्ञानिक डा नीतीश प्रियदर्शी के अनुसार रांची और उसके आसपास का क्षेत्र कभी प्राचीन समुद्र के प्रभाव में रहा होगा।
उपलब्ध भूगर्भीय साक्ष्य बताते हैं कि यह पूरा इलाका किसी समय समुद्र के नीचे रहा और बाद में पृथ्वी की आंतरिक हलचलों तथा भूगर्भीय उठापटक के परिणामस्वरूप सतह पर उभर आया। दरअसल रांची पठार का निर्माण अत्यंत प्राचीन, अर्थात प्री–कैम्ब्रियन या आर्कियन कालीन चट्टानों से हुआ है। यहां मिले कुछ फासिल्स साक्ष्य भी इस क्षेत्र में समुद्र की उपस्थिति की ओर संकेत करते हैं।

यहां का समुद्र उथला और अपेक्षाकृत शांत रहा होगा
अनुमान है कि उस समय यहां का समुद्र उथला और अपेक्षाकृत शांत रहा होगा। इसी क्रम में पतरातू, खेलारी और भुरकुंडा जैसे इलाकों में समुद्र के बार-बार हुए उतार–चढ़ाव के संकेत मिलते हैं। इन क्षेत्रों की चट्टानी संरचनाएं इस बात का आभास कराती हैं कि यहां कभी पानी का व्यापक प्रभाव रहा होगा।
विशेष रूप से पतरातू से बड़कागांव जाने वाले मार्ग की चट्टानों में ऐसे निशान दिखाई देते हैं, जो करोड़ों वर्ष पुराने समुद्री अपरदन को इंगित करते हैं। इन चट्टानों की बनावट मानो यह कहानी कहती है कि कभी लहरों ने उन्हें लगातार काटकर यह स्वरूप दिया होगा।
इसी प्रकार पतरातू के समीप स्थित बेंती बगदा लाइमस्टोन क्षेत्र भी इस संभावना को बल देता है कि यहां कभी उथला समुद्र रहा होगा। चूना पत्थर (लाइमस्टोन) सामान्यतः समुद्री परिस्थितियों में ही बनता है, इसलिए इसकी उपस्थिति को महत्वपूर्ण भूगर्भीय संकेत माना जाता है।
झारखंड अधिकांश प्राचीन चट्टानें आर्कियन काल की
झारखंड में धरती का पहला भूकंप और सूनामी यह दर्शाता है कि यहां कभी समुद्र था। यहां के कुछ शैलचित्रों में भी जल से जुड़े दृश्य दिखाई देते हैं। वहीं, रांची विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष (सेवानिवृत्त) डाॅ राम कुमार तिवारी के अनुसार झारखंड (तथा भारत) की अधिकांश प्राचीन चट्टानें आर्कियन काल की हैं।
इनमें धारवाड़ संरचनाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिनकी चट्टानें राँची क्षेत्र में व्यापक रूप से पाई जाती हैं। इस काल में नीस, शिस्ट, ग्रेनाइट, चार्नोकाइट तथा विशेष रूप से खोंडालाइट जैसी चट्टानें मिलती हैं, जो रांची पहाड़ी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
धारवाड़ प्रणाली (लगभग 2500 से 1800 मिलियन वर्ष पूर्व) की ये चट्टानें मूलतः ज्वालामुखीय अवसादों से बनी थीं, जो बाद में भूसंचलन के कारण विकृत हो गईं। इनके साथ बालू पत्थर, लौह अयस्क और कांग्लोमरेट जैसी संरचनाओं की उपस्थिति यह संकेत देती है कि कभी यह क्षेत्र समुद्री वातावरण से प्रभावित रहा होगा।
उस समय भारत गोंडवाना लैंड का हिस्सा था
दरअसल प्राचीन काल में पृथ्वी का अधिकांश भूभाग पैंजिया नामक एक विशाल महाद्वीप के रूप में एकीकृत था। बाद में यह टूटकर वर्तमान महाद्वीपों और महासागरों में विभाजित हो गया। उस समय भारत गोंडवाना लैंड का हिस्सा था, और रांची क्षेत्र की चट्टानें इस दीर्घ भूगर्भीय यात्रा की साक्षी हैं।
यही कारण है कि यह भूभाग कभी समुद्र के भीतर रहा और बाद में उभरकर छोटानागपुर पठार का हिस्सा बन गया। गोंडवाना लैंड के दीर्घ भूगर्भीय विकास के दौरान लगभग 500 से 400 मिलियन वर्ष पूर्व राँची पहाड़ी का निर्माण हुआ।
तब तक छोटानागपुर का पठारी स्वरूप विकसित हो चुका था। इस प्रकार यह क्षेत्र कभी समुद्र के गर्भ में भी रहा—जिसका संकेत धारवाड़ क्रम की चट्टानें देती हैं। दामोदर घाटी क्षेत्र का बड़ा भाग भी किसी समय समुद्री अथवा समुद्री-दलदली परिस्थितियों में रहा, जिसके परिणामस्वरूप यहां कोयले जैसे महत्वपूर्ण खनिजों का निर्माण हुआ।
इस दृष्टि से देखें तो रांची की पहाड़ियां और चट्टानें केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, बल्कि करोड़ों वर्षों पुराने उस भूगर्भीय इतिहास की मौन गवाह हैं, जब संभवतः यह भूमि समुद्र की लहरों के नीचे छिपी हुई थी।
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