विचार: कमजोर पड़ती क्षेत्रीयता की राजनीति
कुल मिलाकर ये नतीजे दर्शाते हैं कि देश की राजनीति में क्षेत्रीयता की राजनीति कमजोर पड़ रही है और राष्ट्रवादी विचार का विस्तार हो रहा है।
HighLights
क्षेत्रीयता की राजनीति देश में कमजोर पड़ रही है।
मतदाताओं ने राष्ट्रवादी विचारों को अधिक महत्व दिया।
भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति को नकारा गया।
विकास सारस्वत। चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों के बाद असम और बंगाल में प्रचंड बहुमत वाली सरकारों ने कमान संभाल ली है तो पुडुचेरी में चुनाव पूर्व गठबंधन वाली राजग सरकार ने कामकाज शुरू कर दिया है। त्रिशंकु विधानसभा वाले तमिलनाडु में भी विजय सरकार का आगाज हो चुका है। गत दिवस केरलम के मुख्यमंत्री का चयन भी हो गया। चुनाव परिणाम की बात करें तो असम, केरलम और पुडुचेरी में नतीजे आशा के अनुरूप ही रहे। असम में भाजपा के सामने कांग्रेस इस कदर साफ हुई, जैसे ब्रह्मपुत्र के सैलाब में नदी के बीच बालू से बने द्वीप बह जाते हैं।
राज्य में कांग्रेस केवल निचले असम की मुस्लिम बहुल सीटों तक ही सिमट कर रह गई है। जबकि उत्तर असम के असमिया बहुल जिलों में उसका सूपड़ा पूरी तरह साफ हो गया, जहां कभी पार्टी का अच्छा प्रभाव होता था। यह परिणाम पूरी तरह अपेक्षित भी था। राज्य में न केवल भाजपा सरकार द्वारा किया गया विकास साफ-साफ दिखाई देता है, बल्कि पार्टी असमिया अस्मिता और जनसांख्यिकीय परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषयों के प्रति संवेदनशील भी दिखाई देती है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की निजी लोकप्रियता भी पार्टी के लिए कारगर साबित रही। विपक्ष में बैठी कांग्रेस की स्थिति पर चुनाव से पहले ही एक असमिया बुद्धिजीवी ने टिप्पणी की थी कि "भंग नौकात निदिबा भोरी" यानी टूटी नौका में आखिर कौन बैठता है?
केरलम के नतीजों में भी आश्चर्य सिर्फ इतना है कि यह परिवर्तन दस वर्ष बाद हुआ है, अन्यथा यहां हर पांच साल बाद मार्क्सवादी नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे यानी यूडीएफ के बीच ही बारी-बारी से सत्ता बदलती रही है। यहां के नतीजों में महत्वपूर्ण बात यह रही कि यूडीएफ ने कोझीकोड़, तिरुअनंतपुरम और कोल्लम जैसे वामपंथ के गढ़ भी ढहा दिए। मुस्लिम लीग के साथ हुए गठजोड़ ने कांग्रेस को विशेषकर उत्तरी केरलम में मदद पहुंचाई। इस गठबंधन से कांग्रेस को करीब छह प्रतिशत मतों का लाभ मिला। हालांकि यह परिणाम भी अनपेक्षित नहीं थे, क्योंकि 2024 लोकसभा चुनाव में यूडीएफ को राज्य में 20 में से 18 सीटें मिली थीं। इसी तरह पुडुचेरी ने भी उसी परिपाटी का पालन किया है, जिसमें केंद्र पर निर्भरता होने के कारण केंद्रशासित प्रदेश के चुनाव का झुकाव स्वाभाविक रूप से उस दल या गठबंधन की तरफ होता है, जिसकी केंद्र में सत्ता होती है।
जो दो नतीजे सर्वाधिक चौंकाने वाले रहे, वे तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल से आए। तमिलनाडु के नतीजे इस मायने में ऐतिहासिक हैं कि 50 वर्ष बाद द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच घूम रही सत्ता पर विराम लगा। सत्ताधारी द्रमुक को इन चुनावों में गहरा झटका लगा। बड़ा सवाल यही है कि इसे कितना व्यापक परिवर्तन माना जाए, क्योंकि इन चुनावों के माध्यम से तमिलनाडु की राजनीति में फिर से विजय के रूप में एक सिने स्टार का उदय हुआ। वहीं सर्वाधिक चर्चा में रहे राज्य बंगाल में सत्ता परिवर्तन के मायने शायद सबसे अधिक महत्व रखते हैं। बंगाल में लंबे समय बाद पूरी तरह हिंसा मुक्त चुनाव हुए। चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कड़े कदमों ने भय मुक्त वातावरण का निर्माण किया। इसके चलते हुए रिकार्ड मतदान ने भय और भ्रष्टाचार के सहारे बनाई गई सत्ता को उखाड़ फेंका। स्पष्ट है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाया। बंगाल के नतीजों में एक बड़ी बात यह भी रही कि आम बंगाली मतदाताओं ने कुछ बांग्ला बुद्धिजीवियों द्वारा संस्कृति और क्षेत्रीयता के नाम पर निर्मित श्रेष्ठता और विशिष्टता के भाव से ऊपर उठकर भारतीयता को महत्व दिया।
निजी अनुभव से कहूं तो कभी सीबीआइ तो कभी ईडी और केंद्रीय बलों के ममता विरोध से खिन्न, परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध बंगाली मतदाताओं में एक प्रबल भाव था कि आखिर वे भी मूलत: हैं तो भारतीय ही। स्कूलों के उन्नयन के लिए लाई गई पीएमश्री और आयुष्मान जैसी योजनाओं का विरोध समझ से परे था। खस्ताहाल उद्योग और व्यापार, रोजगार की कमी और महिला सुरक्षा के अभाव ने बंगाली अस्मिता कार्ड नहीं चलने दिया। राजकीय सीमाओं से परे राज्यों के नतीजों के कुछ व्यापक निहितार्थ भी हैं। जैसे कि एक पहलू पार्टी पोषित भ्रष्टाचार से जुड़ा मुद्दा रहा। तमिलनाडु और बंगाल दोनों ही राज्यों में एक ऐसी राजकीय व्यवस्था देखने को मिली, जहां पार्टी काडर को भ्रष्टाचार के साथ जोड़ने के संस्थागत प्रयास हुए। बंगाल में नौकरियों के एवज में भ्रष्टाचार के अलावा निजी निर्माण से लेकर बिजली लाइन खिंचवाने के लिए टीएमसी कार्यकर्ताओं को कट मनी देनी पड़ती थी। सरकारी योजनाओं में भी यह व्यवस्था इतनी संस्थागत हो चली थी कि गरीब लोगों के अंतिम संस्कार के लिए शुरू की गई समब्याथि योजना के अंतर्गत मिलने वाले 2,000 में से 200 स्थानीय कार्यकर्ताओं को देने की खबरें बहुत आम थीं। तमिलनाडु की बात करें तो मंत्रियों में एन. नेहरू, आइ. पेरियसामी और वीएस बालाजी पर भ्रष्टाचार के मुकदमे दर्ज हुए।
दूसरा महत्वपूर्ण निहितार्थ यह कि हिंदू विरोध की राजनीति सिमटती जा रही है। जहां द्रमुक नेता उदयनिधि स्टालिन और के. पोन्मुड़ी ने सनातन को मिटाने की बात कही, वहीं ममता बनर्जी ने काफिर जैसे इस्लामपरस्त शब्दों द्वारा मुस्लिम वोटरों को लुभाने का प्रयास किया। ममता की जय श्रीराम के आह्वान से खीझ कैमरों के सामने भी स्पष्ट दिखी। जनता ने मुस्लिम तुष्टीकरण और हिंदू विरोध की राजनीति को सिरे से नकारा है। तीसरा निहितार्थ सीमावर्ती राज्यों असम और बंगाल में घुसपैठ से जुड़ा है। चौथा, देश में सर्वाधिक क्षेत्रीयता का भाव लिए हुए तमिलनाडु और बंगाल में मतदाताओं ने भाषाई और क्षेत्रीय अस्मिता को नकारा है। कुल मिलाकर ये नतीजे दर्शाते हैं कि देश की राजनीति में क्षेत्रीयता की राजनीति कमजोर पड़ रही है और राष्ट्रवादी विचार का विस्तार हो रहा है।
(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)





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