जागरण संपादकीय: फूहड़ राजनीति
इंदौर में राहुल गांधी द्वारा एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाने के लिए कॉमेडियन का सहारा लेने को 'फूहड़ राजनीति' बताया गया है।
HighLights
भारतीय राजनीति किस तरह फूहड़ होती जा रही है, इसका ताजा प्रमाण है इंदौर में छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी की ओर से मंच पर एक कॉमेडियन को बुलाकर प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाना। इस दौरान प्रधानमंत्री की ओर से एक जनसभा में एक बुजुर्ग महिला को कुर्सी उपलब्ध कराने के प्रसंग का जिस तरह जिक्र किया गया, उसे मूर्खता और संवेदनहीनता के अतिरिक्त और कुछ कहना कठिन है।
आखिर एक सहज मानवीय व्यवहार का मजाक बनाने का क्या औचित्य? ऐसा तो कोई छिछली सोच वाला व्यक्ति ही कर सकता है। यह आश्चर्यजनक है कि छात्रों को संबोधित करते समय राहुल गांधी को अपने मंच पर एक कॉमेडियन के भोंडे कृत्य का सहारा लेना पड़ा। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि इस भोंडेपन में उन्होंने भी हिस्सेदारी की।
आखिर ऐसा करके वे छात्रों और युवाओं को क्या संदेश देना चाहते हैं? ऐसा तो है नहीं कि छात्र यही देखना-सुनना चाहते हैं? यह सही है कि राजनीतिक दल एक-दूसरे की नीतियों की आलोचना करते हुए उन पर कटाक्ष भी करते हैं, लेकिन इसकी भी अपनी एक सीमा और मर्यादा होती है। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक जीवन और राजनीति की एक भाषा भी होती है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राहुल गांधी प्रायः ही राजनीतिक मर्यादा और सामान्य शिष्टाचार की अनदेखी करना पसंद करते हैं। यह पहली बार नहीं है जब उनके मंच से अथवा उनके द्वारा प्रधानमंत्री के प्रति अमर्यादित भाषा का उपयोग किया गया हो। वे रह-रहकर ऐसा करते ही रहते हैं। इस क्रम में वे प्रधानमंत्री के लिए तू-तड़ाक वाली भाषा का इस्तेमाल करने में भी संकोच नहीं करते।
भले ही इंदौर में राहुल गांधी के कार्यक्रम में जो फूहड़ता हुई, उसका कांग्रेस नेता बचाव करने में जुट गए हैं, लेकिन उन्हें यह आभास होना चाहिए कि आम जनता इस तरह की फूहड़ता कभी पसंद नहीं करती। राहुल गांधी को इसका भी आभास होना चाहिए कि जब उनके द्वारा प्रधानमंत्री के प्रति अशालीनता का प्रदर्शन किया जाता है तो पार्टी के अन्य छोटे-बड़े नेता और अधिक खराब भाषा का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।
इन दिनों कांग्रेस की इंटरनेट मीडिया टीम की ओर से प्रधानमंत्री के प्रति लगातार ऐसी सामग्री शेयर की जा रही है, जिसे रुचिपूर्ण नहीं कहा जा सकता। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब किसी दल के शीर्ष और प्रभावी नेता को राजनीतिक शालीनता का परिचय देना चाहिए, तब वह स्वयं अपने समर्थकों को अशालीन भाषा का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
स्पष्ट है कि वे जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं उन्हें भी उसी भाषा में जवाब देने का सिलसिला कायम होगा। इससे राजनीति और अधिक अरुचिपूर्ण और अप्रिय रूप में ही सामने आएगी।
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