विचार: पुलिस सुधारों का अंतहीन इंतजार
हर समृद्ध देश को एक अच्छी शांति व्यवस्था की नींव चाहिए और यह केवल एक अच्छी पुलिस दे सकती है।
HighLights
भारतीय पुलिस राजनीतिक हस्तक्षेप और संसाधनों की कमी से जूझ रही है।
देश भर में लाखों पुलिस पद रिक्त, कार्यभार अत्यधिक है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद पुलिस सुधारों का इंतजार जारी।
प्रकाश सिंह। भारत भले ही 1947 में आजाद हो गया, मगर भारतीय पुलिस आज भी एक तरह से गुलाम ही है। आप कहेंगे, कैसे? मैं इसे समझाता हूं। आप जानते हैं कि 1857 में अंग्रेज हुकूमत के विरुद्ध बगावत हुई थी। विद्रोह को तो उन्होंने कुचल दिया, परंतु भविष्य में इसकी पुनरावृति को रोकने के लिए उन्होंने तय किया कि एक ऐसी फोर्स होनी चाहिए, जो हर हाल में उनके आदेशानुसार काम करे-आदेश वैधानिक हो या अवैधानिक। इस पृष्ठभूमि में भारतीय पुलिस का 1861 में गठन हुआ। अंग्रेजों ने स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने में पुलिस का बेरहमी से इस्तेमाल किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पुलिस का यह रूप-स्वरूप बदलना चाहिए था।
संभवत: उस समय के नेताओं ने यही सोचा होगा कि समय के साथ पुलिस की कार्यप्रणाली भी बदल जाएगी, मगर ऐसा हो नहीं सका। उलटे समय के साथ राजनीतिक बिरादरी और प्रशासकीय तंत्र के बीच परस्पर लाभ के लिए एक साठगांठ की स्थिति बन गई। इसका वीभत्स उदाहरण हमें 1975 में आपातकाल के दौरान दिखा, जब पुलिस ने सैकड़ों बेगुनाह लोगों को केवल इस आधार पर गिरफ्तार कर लिया कि वे सरकार का विरोध कर रहे थे। शाह कमीशन ने अपनी जांच में स्पष्ट लिखा था कि अगर ऐसी घटनाओं की पुनरावृति रोकनी है तो हमें पुलिस को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना पड़ेगा। दुर्भाग्य से इस संस्तुति पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
वर्ष 1977 में नेशनल पुलिस कमीशन का गठन हुआ, जिसने पुलिस सुधार पर बड़ी अच्छी रिपोर्ट तो तैयार की, परंतु उस पर अमल नहीं हो पाया। आपातकाल के कुछ वर्षों बाद 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कई शहरों विशेष तौर पर दिल्ली में हुए दंगों में बड़ी संख्या में सिख मारे गए। दंगा करने वाले कांग्रेस पार्टी के नेता या पार्टी समर्थक थे। इसलिए पुलिस मूकदर्शक बनी रही। सबकी समझ में आ गया कि पुलिस में मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है, परंतु किया किसी ने कुछ नहीं। गोरे साहब का स्थान सांवले साहब ने ले लिया था। शासक वर्ग को अंग्रेजों की बनाई पुलिस का चस्का लग गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने भी 2006 में पुलिस सुधार संबंधी कुछ आदेश जारी किए, मगर वे केंद्र एवं राज्य सरकारों को रास नहीं आए। कागज पर दिखाने के लिए कुछ फर्जी काम कर दिया गया है, मगर जमीन पर पुलिस की कार्यशैली में कोई परिवर्तन नहीं आया है। पुलिस पहले अंग्रेजों के लिए काम करती थी और अब उसी शैली में वर्तमान शासक वर्ग के लिए काम कर रही है। मेरा कहने का यह मतलब नहीं कि पुलिस को आप एकदम आजाद कर दीजिए। वह भी ठीक नहीं होगा। पुलिस पर नियंत्रण आवश्यक है, परंतु उसके दैनिक कामकाज में हस्तक्षेप सर्वथा अवांछनीय है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश इसी सिद्धांत के अंतर्गत जारी किए गए थे। ऐसे आदेश को 20 वर्ष हो गए, लेकिन उन्हें लागू कराने के लिए अभी भी संघर्ष जारी है। क्या यह खेद का विषय नहीं है?
पुलिस से संबंधित बहुत से अन्य मुद्दे भी हैं, जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश भर में पुलिस के 5.92 लाख पद रिक्त हैं। ये रिक्तियां भी पुरानी स्वीकृतियों के अनुसार हैं। स्वीकृतियों का आकलन किसी प्रदेश में 10 साल, किसी में 20 साल पहले किया गया था। तब से स्थिति बदल चुकी है। आबादी बढ़ गई है। वर्तमान जनशक्ति का आकलन करें तो रिक्तियां शायद 10 लाख या उससे भी अधिक मिलेंगी। इतनी बड़ी आबादी की पुलिसिंग करना कोई आसान काम नहीं है। कामन काज नामक संस्था के एक अध्ययन के अनुसार एक पुलिसकर्मी औसतन 14 घंटे रोज काम करता है। होली-दीवाली के दिन भी वह ड्यूटी पर होता है। यह कहां तक मानवीय है? अधिक से अधिक वह 12 घंटे की ड्यूटी दे सकता है।
पुलिस का काम कम से कम दो शिफ्ट में होना चाहिए। हमारे देश में आतंकियों के मानवाधिकार की चर्चा तो होती है, परंतु पुलिस के मानवाधिकार की कोई बात नहीं करता। पुलिस परिवारों के लिए आवासीय सुविधा भी सर्वथा अपर्याप्त है। नेशनल पुलिस कमीशन ने कहा था कि सभी अराजपत्रित अधिकारियों को पारिवारिक आवास मिलना चाहिए, लेकिन इसकी उपलब्धता बहुत सीमित है। ऐसी स्थिति में तमाम पुलिसकर्मियों को साधारण बस्तियों में किराये के मकान में न्यूनतम सुविधाओं के साथ रहना पड़ता है। ऐसे में उनके मनोबल की कल्पना की जा सकती है। ज्यादातर थानों की हालत भी जर्जर है। संसाधन भी अपर्याप्त हैं। वैज्ञानिक उपकरण नाम मात्र के हैं। ट्रेनिंग केवल कागज पर हो जाती है। फर्जी आंकड़ों की भरमार है। पुलिस बजट में पैसा बहुत कम मिलता है, क्योंकि राज्य सरकारें रेवड़ियां बांटने में ज्यादा विश्वास करती हैं। जैसे-तैसे पुलिस की गाड़ी चल रही है।
कर्तव्य पालन की राह में तमाम पुलिसकर्मी सर्वोच्च बलिदान भी देते हैं। पिछले स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने यह स्वीकार किया था कि कर्तव्य पालन में पुलिस के बलिदानियों की संख्या सेना से अधिक है। स्वतंत्रता से अब तक करीब 38,000 पुलिसकर्मी बलिदान हो चुके हैं। सफलता का श्रेय लेने के लिए तो तमाम लोग आगे आ जाते हैं, जबकि पुलिसकर्मी से हमेशा अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी ड्यूटी चुपचाप देता रहे। पुलिस के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई तुरंत और अक्सर केवल विरोध को शांत करने के लिए की जाती है। अगर वकीलों पर बल प्रयोग हुआ है, तो वह कितना भी सही रहा हो, खामियाजा पुलिस को ही भुगतना पड़ता है। हाल में दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी के समर्थकों पर बल प्रयोग हुआ तो पुलिस की कथित ज्यादती पर जांच हो रही है। बल प्रयोग नहीं किया होता और प्रदर्शनकारी संसद में घुस गए होते तो पुलिस अधिकारियों की नौकरी चली जाती। काम करो तो मुसीबत, न करो तो मुसीबत।
प्रधानमंत्री मोदी ‘विकसित भारत’ की बार-बार बात करते हैं। यह बड़ी अच्छी कल्पना है, परंतु हर समृद्ध देश को एक अच्छी शांति व्यवस्था की नींव चाहिए। यह आधार केवल एक अच्छी पुलिस दे सकती है। ऐसी पुलिस, जो कानून को सर्वोपरि मानते हुए संविधान के आदर्शों पर चलते हुए अपने कर्तव्य का पालन करें। देश में ऐसी पुलिस कब होगी? वह सुबह कब आएगी। हम उसका इंतजार कर रहे हैं।
(लेखक उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक हैं)





-1789965842794_v.webp)


-1789746398608_v.webp)
-1789746144483_v.webp)
-1789745648988_v.webp)
-1789669479171_v.webp)