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बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप, मगर गानों के दम पर कालजयी बनी Amitabh Bachchan की 45 साल पुरानी फिल्म

By Vinod AnupamEdited By: Ashish Rajendra
Updated: Sun, 09 Aug 2026 08:02 AM (IST)

वो फिल्म बॉक्स आफिस पर बुरी तरह नकारी गई, मगर बाद में कहलाई कल्ट क्लासिक। दरअसल, कुछ फिल्में केवल अपनी कहानी की वजह से नहीं बल्कि कलात्मक साहसिकता और अनूठी स्टारकास्ट के कारण कालजयी बन जाती हैं।

अमिताभ बच्चन की कल्ट मूवी (फोटो क्रेडिट- फेसबुक)

अमिताभ बच्चन की कल्ट मूवी (फोटो क्रेडिट- फेसबुक)

HighLights

  1. 45 साल पहले आई थी फिल्म

  2. बॉक्स ऑफिस पर रही असफल

  3. गानों की वजह से बनी कल्ट

विनोद अनुपम, पटना: मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं, तुम होती तो कैसा होता, तुम यह कहती, तुम वो कहती, तुम इस बात पे हैरां होती, तुम उस बात पे कितनी हंसती, तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता। 45 साल हो गए इन पंक्तियों को कहे।

पीढ़ियां बदल गईं, इसके बावजूद न जाने कितनों को ये पंक्तियां कंठस्थ हैं, जो गाहे- बगाहे अमिताभ की आवाज में कहने की भी कोशिश करते रहे हैं। आज भी किसी मंच पर अमिताभ बच्चन का होना इन्हीं पंक्तियों के साथ पूरा माना जाता है। यह है अपने समय की एक ‘असफल’ फिल्म की ताकत, जिसके ‘रंग बरसे...’ के बगैर आज भी होली पूरी नहीं होती।

बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली थी सिलसिला

एमस्टर्डम के ट्यूलिप के बाग ऐसे मन में धंसें हैं कि चाहें तो हूबहू पेंटिंग उतार दें। 14 अगस्त, 1981 को रिलीज ‘सिलसिला’ इस बात को स्थापित करती है कि किसी फिल्म के बाक्स आफिस कलेक्शन से उसकी कालजयिता तय नहीं की जा सकती, वह उसकी मेकिंग से होती है जो दर्शकों के मन में धीरे-धीरे रचती-बसती है। हर फिल्म की तरह ‘सिलसिला’ हिट होने के लिए ही बनाई गई थी।

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SILSILA MOVIE

इसकी कहानी सागर सरहदी ने लिखी थी और यश चोपड़ा से मुख्य भूमिका के लिए अमिताभ बच्चन के साथ स्मिता पाटिल और पद्मिनी कोल्हापुरी का नाम प्रस्तावित किया था, लेकिन यश चोपड़ा के व्यावसायिक मन में तो कुछ और चल रहा था। उस समय अमिताभ बच्चन और रेखा के किस्से सुर्खियों में थे। यश चोपड़ा को एहसास था कि अगर वास्तविक जीवन के इस प्रेम त्रिकोण को कोमलता से फिल्माया जाए तो लोग देखने के लिए टूट पड़ेंगे।

1976 में ‘कभी-कभी’ के साथ यश चोपड़ा इस विधा में सिद्धहस्त हो चुके थे। प्रेम संबंधों पर आधारित ‘कभी-कभी’ कोमलता, संवाद, संगीत, सिनेमेटोग्राफी, लाइटिंग, संपादन समेत सभी स्तरों पर स्पष्ट संकेत दे रही थी कि हिंदी फिल्म जगत को रोमांस के बादशाह की ताजपोशी के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इसका विस्तार ‘सिलसिला’ के भी हर पक्ष में दिखता है। शुरुआत संगीत से हुई।

इन संगीतकार ने दिया था संगीत

अपनी शास्त्रीयता के लिए विख्यात बांसुरीवादक हरिप्रसाद चौरसिया और संतूरवादक शिव कुमार शर्मा को उन्होंने फिल्म के संगीत के लिए राजी किया। ’शिव हरि’ के नाम से जोड़ी बनी और जो रचा गया वह हिंदी सिनेमा संगीत की परंपरा से अलग होते हुए भी आम जन के दिल में उतर गया।

SILSIAMOVIE (1)

’नीला आसमां सो गया...’ जैसी अगेय पंक्तियां भी आम दर्शकों की जुबान पर चढ़ गई। संगीत के लिए शिव-हरि थे, तो हरिवंश राय बच्चन, निदा फाजली और जावेद अख्तर के गीत लिए गए। अमिताभ बच्चन को गायन के लिए राजी किया गया। हालांकि इसके पहले वे ‘मि.नटवरलाल’ में गायन की शुरुआत कर चुके थे, लेकिन सभी गीतों के गायन की जवाबदेही बड़ी चुनौती थी।

मुश्किल से राजी हुई थीं जया

कहते हैं फिल्म के सारे गाने तैयार हो गए, उसके बाद बाकी कलाकारों के चयन की कोशिशें शुरू हुईं। जाहिर है रेखा और जया बच्चन को राजी करने के लिए उनके पास एक मजबूत हथियार फिल्म का संगीत था। शायद ही इंडस्ट्री में किसी को उम्मीद थी, लेकिन यश चोपड़ा की तैयारी ऐसी थी कि तीनों कलाकारों को साथ लाने में सफल रहे, जबकि जया बच्चन उस समय फिल्मों में काम करना छोड़ चुकी थीं।

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वास्तव में ‘कभी-कभी’ के बाद यश चोपड़ा ने स्वयं को ही दोहराना शुरू कर दिया। यश के जीवनीकार रशेल डायर ‘कभी-कभी’ और ‘सिलसिला’ दोनों ही फिल्मों को अपने बोल्ड और विवादास्पद कथानक के कारण समय से आगे की फिल्म कहती हैं।

दोनों ही फिल्मों में विवाह पूर्व संबंधों को ही नहीं दिखाया गया, बल्कि वहीदा रहमान कभी-कभी और जया भादुड़ी सिलसिला को गर्भवती भी दिखाने की हिम्मत यश चोपड़ा ने की थी। परंतु तमाम क्रांतिकारी पृष्ठभूमि के बावजूद यश चोपड़ा भारतीय परंपरा की गरिमा स्वीकार करते हैं। दोनों ही फिल्मों का उनका संदेश स्पष्ट है, आप अपनी पत्नी से प्यार करो, भूतकाल को भूल जाओ और भूतकाल की गलतियों को माफ कर दो।

काम न आया यश चोपड़ा का दांव

हालांकि यह भी सच है कि यशराज फिल्म्स की पहली फिल्म ‘दाग’ से रोमांस के चित्रण के लिए विवाहेतर संबंध को आधार बनाया गया। ‘कभी कभी’ में यश चोपड़ा की अद्भुत कल्पनाशीलता का परिचय मिलता है। जब सुहागरात में पत्नी अपने पति को वही गीत सुनाती है जो उसका प्रेमी उसके लिए गाया करता था।

SILSIAMOVIE

प्रेम के बारे में एक यूरोपीय विचार यह भी है कि ज्यादातर, जैसा कि संपत्ति खरीदने के मामले में होता है, प्रेम के मामले में भी छिपी हुई संभावनाओं और संभावित फायदों की काफी अहमियत रहती है। यश चोपड़ा की अधिकांश रोमांटिक फिल्में इसी फायदे-नुकसान की गाथा हैं। यहां प्रेम की संभावना में आस्था रखने का अर्थ मनुष्यता में आस्था रखने जैसा नहीं है।

यहीं यश चोपड़ा प्रेम के दूसरे बड़े चितेरे राज कपूर से अलग हो जाते हैं। राज कपूर का प्रेम मांसल होने के बावजूद मनुष्यता में प्रेम का संदेश देता लगता है। राज कपूर की फिल्मों में प्रेम वैयक्तिक नहीं रहता, पूरे सामाजिक परिवेश को प्रतिबिंबित करता है, जबकि यश चोपड़ा की फिल्मों में दिखता समाज भी उसे वैयक्तिक की सीमा से ऊपर नहीं उठा पाता।

इन सितारों सजी रही सिलसिला

अमिताभ बच्चन, रेखा, जया, शशि कपूर, संजीव कुमार जैसी स्टारकास्ट, खूबसूरत मेकिंग, सुखद संगीत के बावजूद तब ‘सिलसिला’ की बाक्स आफिस पर असफलता की एक वजह इसका वैयक्तिक होना भी हो सकता है। फिल्म को जिस तरह अमिताभ-रेखा की कहानी के रूप में प्रचारित किया गया, दर्शक उससे रिलेट ही नहीं कर सके। जाहिर है समय के साथ फिल्म को संगीत, विजुअल, संवाद जैसे टुकड़े-टुकड़े में स्वीकार किया गया, आज भी किया जा रहा है और अब यह भारतीय सिनेमा का एक मास्टरपीस है।

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