Amrish Puri: सरकारी नौकरी छोड़ हॉलीवुड में 'मोला राम' बनकर काटा गदर, 450 फिल्में करने वाले 'पाशा' की दास्तां
अमरीश पुरी ने न केवल खलनायकी को नए आयाम दिए, बल्कि भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार और संवेदनशील पिता बनकर भी दर्शकों के दिलों पर राज किया।

अमरीश पुरी की दास्तां। फोटो क्रेडिट- एक्स

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संजीत नार्वेकर, मुंबई। बॉलीवुड की सफलता और विफलता दोनों ही कहानियों में संघर्ष एक अटूट हिस्सा रहा है लेकिन अमरीश पुरी (जन्मतिथि 22 जून 1932) को खुद को स्थापित करने के लिए जिस लंबे और कठिन दौर से गुजरना पड़ा, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। उनके चचेरे भाई के. एल. सहगल संगीत जगत के महानायक थे और दो बड़े भाई-चमन पुरी और मदन री-सिनेमा में काफी सफल थे। इसके बावजूद अमरीश को अपनी राह खुद बनानी पड़ी।
शुरुआती कठिन दौर
यह संघर्ष बीसवीं शताब्दी के पांचवें दशक में शुरू हुआ था। उस समय के. एल. सहगल केवल एक याद बन चुके थे (18 जनवरी 1947 को उनका निधन हो गया था) और अमरीश के भाई खुद काम पाने के लिए नेटवर्क बनाने में जुटे थे। वे इतने प्रभावशाली नहीं थे कि अमरीश को काम दिला सकें। शिमला के बीएम कॉलेज से स्नातक होने के बाद अमरीश को कर्मचारी राज्य बीमा निगम में सरकारी नौकरी तो मिल गई, लेकिन यह उनके भीतर के कलाकार को संतुष्ट नहीं कर पाई।
रंगमंच से लगाव
अभिनय के प्रति अपने जुनून को पूरा करने के लिए वे एक शौकिया नाटक मंडली से जुड़ गए। यहां वे तत्कालीन नवोदित नाटककार सत्यदेव दुबे के लिखे नाटकों में अभिनय करते और पृथ्वी थिएटर्स में प्रदर्शन करते थे। जल्द ही वे रंगमंच के एक जाने-माने अभिनेता बन गए। इसके बावजूद फिल्मों में जगह पाने का उनका संघर्ष जारी रहा। वे नामी निर्माताओं के दफ्तरों में अपनी तस्वीरें लेकर चक्कर काटते रहे, जहां अक्सर उन्हें नजरअंदाज किया जाता या बिना नाम वाले छोटे रोल दिए जाते थे। कई बार तो बुनियादी पारिश्रमिक भी नहीं मिलता था।
कलात्मक पहचान मिली
पर्दे पर उन्हें पहला क्रेडिट फिल्म 'प्रेम पुजारी' (1970) से मिला। इसके बाद 'रेश्मा और शेरा' (1971), 'हलचल' (1971) और सुखदेव की डाक्युमेंट्री 'खिलौनेवाला' में उन्होंने काम किया। इन छोटे रोल्स के बीच उन पर मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल की नजर पड़ी। बेनेगल ने उन्हें 'निशान्त' (1975), 'मंथन' (1976), 'भूमिका' (1977), 'कोन्दुरा' (1978) और 'कलयुग' (1981) जैसी फिल्मों में कास्ट किया। इसके बाद वे गोविंद निहलानी की फिल्मों जैसे 'आक्रोश' (1980), 'अर्ध सत्य' (1983) और 'तमस' (1986) के नियमित हिस्से बन गए।
वैश्विक स्तर पर पहचान
बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक की शुरुआत में अमरीश पुरी ने मुख्य खलनायक के रूप में बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल की। 'हम पांच' (1980) के वीर प्रताप सिंह, 'विधाता' (1982) के जगुआर चौधरी और 'हीरो' (1983) के पाशा जैसे किरदारों ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई।
इसी दौरान रिचर्ड एटनबरो की फिल्म 'गांधी' (1982) में एक छोटी भूमिका ने हॉलीवुड निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग का ध्यान खींचा। स्पीलबर्ग ने उन्हें अपनी फिल्म 'इंडियाना जोन्स एंड द टेंपल ऑफ डूम' (1984) में मुख्य खलनायक 'मोला राम' का रोल दिया। इस रोल के लिए उन्होंने अपना सिर मुंडवाया, जो बाद में उनका सिग्नेचर लुक बन गया।
महाखलनायक का दौर
उन्हें पहला बड़ा बॉलीवुड पुरस्कार 'मेरी जंग' (1985) में जी. डी. ठकराल की नफरत से भरी भूमिका के लिए फिल्मफेयर -सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के रूप में मिला। इसके बाद उनके अभिनय का रथ तेजी से बढ़ा। 'मिस्टर इंडिया' का मोगैंबो, 'त्रिदेव' का भुजंग, 'घायल' का बलवंत राय, 'दामिनी' का बैरिस्टर चड्ढा और 'करण अर्जुन' में ठाकुर दुर्जन सिंह जैसे किरदारों को भला कौन भूल सकता है? वे बालीवुड के सबसे खूंखार विलेन बन चुके थे।
छवि का बदलाव
अगर फिल्मकारों को लगा कि अमरीश पुरी की प्रतिभा का भंडार खत्म हो गया है, तो वे गलत थे। सिनेमा के इतिहास में एक नया अध्याय तब लिखा गया जब फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' (1995) में उन्होंने चौधरी बलदेव सिंह का किरदार निभाया। "जा सिमरन जा, जी ले अपनी जिंदगी!" संवाद के साथ उन्होंने अपनी विलेन की छवि को पूरी तरह बदल दिया। इस फिल्म में वे एक सख्त अनुशासक थे, लेकिन उनका दिल बेहद दयालु और सुनहरा था। अमरीश ने एक इंटरव्यू में बताया था कि यह किरदार उनके पिता लाला निहाल चंद पुरी पर आधारित था।
आखिरी विदाई तक
इसके बाद उन्होंने 'परदेस' (1997) के किशोरीलाल और 'विरासत' (1997) के राजा ठाकुर जैसे कई दयालु लेकिन सख्त पिताओं के किरदार निभाए। उन्होंने 'चाची 420' (1997) जैसी फिल्मों में कॉमेडी भी की। वे अपने जीवन के अंतिम समय तक सक्रिय रहे। अपने करियर के आखिरी पांच वर्षों में उन्होंने हर साल औसतन 8 से 10 फिल्में कीं। 12 जनवरी 2005 को 73 वर्ष की आयु में ब्लड कैंसर के कारण उनका निधन हो गया।
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CGI से पर्दे पर वापसी
उनके निधन के बाद भी उनकी कुछ फिल्में रिलीज हुईं और 'गदर 2' (Gadar 2) में कंप्यूटर जनित इमेजरी के जरिए उनकी उपस्थिति को दोबारा पर्दे पर लाया गया। उनसे पहले प्राण और प्रेम चोपड़ा जैसे बड़े विलेन हुए, लेकिन अमरीश पुरी जैसी विविधता और निरंतरता किसी में नहीं दिखी। हॉलीवुड के महान निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने उनके बारे में कहा था, "अमरीश मेरे पसंदीदा विलेन हैं। दुनिया ने उनके जैसा विलेन न कभी देखा है और न कभी देखेगी!"
1979 में अमरीश पुरी को प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला था। अमरीश पुरी ने अपने करियर में 450 से अधिक फिल्मों में काम किया, जिनमें मुख्य रूप से हिंदी के अलावा तेलुगु, कन्नड़, तमिल, मलयालम और मराठी भाषा की फिल्में शामिल थीं।

