काला 'ताजमहल' बनवाना चाहते थे K. Asif, 1 लाख की 'ईदी' से बना था 'मुगल-ए-आजम' का ऐतिहासिक सेट
सिनेप्रेमी 'मुगल-ए-आजम' फिल्म के लिए के. आसिफ को याद करते हैं। ताजमहल पर भी वह बनाना चाहते थे रुपहले पर्दे के लिए बेहतरीन शाहकार। जानिए उनके अधूरे ख्व ...और पढ़ें

के आसिफ बनवाना चाहते थे काला ताजमहल। फोटो क्रेडिट- एक्स
HighLights
के. आसिफ बनाना चाहते थे पर्दे पर 'काला ताजमहल'
'मुगल-ए-आजम' के ऐतिहासिक सेट के लिए मिली 1 लाख की ईदी
के आसिफ की ये फिल्में रह गईं हमेशा के लिए अधूरी!
राहुल रवेल, मुंबई। 'मुगल-ए-आजम' (Mughal-E-Azam) के लिए दुनिया के. आसिफ (K. Asif) साहब को जानती है। ऐतिहासिक कहानियों को रुपहले पर्दे पर दर्शाने को लेकर उनका जुनून अलग ही था। आसिफ साहब एक और फिल्म बनाना चाहते थे ताजमहल (Taj Mahal)।
उन्होंने राजेंद्र कुमार (Rajendra Kumar) से अपने दिल की ये बात साझा की थी। आसिफ साहब का कहना था कि पूरी दुनिया सफेद संगमरमर से बने ताजमहल की भव्यता और उसकी शानदार कारीगरी की सराहना करती है। मैं भी ताजमहल बनाना चाहता हूं, पर मेरा ताजमहल काला होगा।
क्यों काला ताजमहल बनवाना चाहते थे के. आसिफ?
राजेंद्र साहब चौंके कि काला ताजमहल कैसे? इस पर आसिफ साहब ने जवाब दिया कि फिल्म में एक सीक्वेंस होगा कि ताजमहल का निर्माण पूरा हो गया है। कारीगर उसी खुशी में रात को जश्न कर रहे हैं। नवनिर्मित ताजमहल को तारपोलीन से ढंका गया है, ताकि सुबह बादशाह वह आवरण हटाकर उसका दीदार कर सकें। तभी वहां आग लग जाती है। आगजनी में काफी बर्बादी होती है।
कारीगरों को देना चाहते थे ट्रिब्यूट
सुबह जब आग शांत होती है तो कारीगर देखते हैं कि सामने काला ताजमहल है। तारपोलीन जल चुका है। उसकी कालिख को समेटे ताजमहल भी काला दिख रहा है। सारी मेहनत राख में बदलती दिखती है। तब मुख्य कारीगर दुआ मांगता है। उसके जेहन में है कि मैंने जो ताजमहल बनाया था वो ये नहीं है। उसी समय बारिश होती है और सारी धूल व कालिख बह जाती है।
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सामने सफेद संगमरमर से बना बेमिसाल ताजमहल दिखता है। ताजमहल का निर्माण शाहजहां ने करवाया, पर वास्तव में दुनिया को कारीगरी का नायाब तोहफा जिन्होंने दिया, वो उसे बनाने वाले कारीगर थे। ताजमहल फिल्म से आसिफ साहब उन्हें ये श्रेय देना चाहते थे। हालांकि, यह फिल्म नहीं बन सकी, पर बतौर निर्देशक उनका दृष्टिकोण कमाल का था।
पृथ्वीराज को रोल के लिए ऐसे किया था राजी
'मुगल-ए-आजम' को ही लें, आरंभिक दृश्यों में जब मूर्तिकार समय पर मूर्ति पूरी न कर पाने की वजह से नायिका को ही संगमरमर से तराशी जीवंत मूर्ति का रूप देता है, तो दर्शक भी मोहित व स्तब्ध रह जाते हैं। 'मुगल-ए-आजम' को पर्दे पर उतारने से पहले ही उनके मन-मस्तिष्क में उसका एक-एक दृश्य आकार ले चुका था। वे बहुत स्पष्ट थे कि फिल्म तभी शुरू होगी, जब अकबर के रोल के लिए पृथ्वीराज कपूर (Prithviraj Kapoor) हामी भरेंगे।
आसिफ साहब रोल का प्रस्ताव लेकर पृथ्वीराज कपूर के पास पहुंचे। पृथ्वीराज कपूर ने कहा कि ये तो सलीम और अनारकली की प्रेमकहानी है, इसमें मेरे करने के लिए क्या होगा। आसिफ साहब ने जवाब दिया कि आपने शायद एक बात पर ध्यान नहीं दिया। मैं सलीम-अनारकली की कहानी बना रहा हूं, पर उसका शीर्षक है 'मुगल-ए-आजम'।
पूरी कहानी अकबर के दृष्टिकोण से होगी। इसके बाद उन्होंने रोल के लिए हामी भर दी। ये आसिफ साहब की खूबी थी कि वो अपनी बात मनवाना जानते थे। आज भी जब हम अकबर की कल्पना करते हैं तो जेहन में पृथ्वीराज कपूर की वही रौबीली छवि बनती है।
ऐतिहासिक सेट बनवाने में दिलीप ने दिया था साथ
फिल्म निर्माण में किसी तरह का समझौता करना के. आसिफ का मिजाज नहीं था। शीशमहल का सेट तैयार होना था, पर फाइनेंसर ने पैसा देने से इनकार कर दिया तो कुछ समय के लिए काम रोक दिया गया। दिलीप कुमार चाहते थे कि फिल्म पूरी हो। उसी दौरान ईद पड़ी तो उन्होंने निर्माता शापूर जी पल्लोन जी से कहा कि आसिफ साहब मेरी मदद नहीं लेंगे, पर आप उन्हें एक लाख रुपये की ईदी दे दीजिए। ये पैसा आसिफ साहब ने शीशमहल का सेट बनाने में खर्च कर दिया।
मूड के हिसाब से काम करते थे दिलीप कुमार
उस दौर में वॉकी-टॉकी तो थे नहीं, पर उन्होंने क्या कमाल का युद्ध सीक्वेंस शूट किया था। उनका काम करने का अंदाज अलग ही था। जब काम करने का मूड होता था, तभी करते थे। एक बार साउंड मिक्सिंग का काम चल रहा था। साउंड रिकार्डिस्ट को उन्होंने ये कहकर बुलाया कि मैंने आज की डेट ली है। आप आएं, पर आज हम काम नहीं करेंगे, बस व्हिस्की पिएंगे। हालांकि, जब काम करना होता था तो उन्हें समय का होश नहीं रहता था।
अधूरी रह गई के आसिफ की फिल्म
उनकी एक अधूरी फिल्म थी 'लव एंड गाड'। यह लैला-मजनू की कहानी थी। दिलीप साहब चाहते थे कि फिल्म को पूरी करके रिलीज किया जाए। उसके लिए उन्होंने मेरे पिता एच.एस. रवेल को कॉल किया। दरअसल पापा ने ऋषि कपूर व रंजीता को लेकर 'लैला मजनू' बनाई थी, इसलिए दिलीप साहब को लगा कि के. आसिफ की अधूरी फिल्म को वह बेहतर तरीके से पूरा करेंगे। दिलीप साहब के अनुरोध पर रफ प्रिंट देखने के लिए जब पापा उनके घर गए तो मैं भी साथ था।
के आसिफ ने खूबसूरती से लिखी थी फिल्म
हर दृश्य में ऐसे गुंथा था, जिसे उसी सोच के साथ आगे बढ़ाना मुश्किल था। इसलिए पापा ने मना कर दिया। ऐसा ही एक दृश्य था जब कैस यानी मजनू को पकड़कर मौलवी मस्जिद में कैद कर लेते है। उसका सिर पानी की ओर झुकाकर पूछते हैं कि तुम्हें क्या दिखता है, मजनू जवाब देता है लैला, उसी समय कैमरा आईने में उभरती छवि को दर्शाता है, जहां अल्लाह लिखा प्रतीत होता है। ऐसी थी आसिफ साहब की सोच।
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ओटीटी पर फिल्म देखना चाहते हैं फिल्ममेकर
पापा के इनकार के बाद यह फिल्म के.सी. बोकाड़िया ने जैसे-तैसे पूरी की, पर उसे वह रिस्पॉन्स नहीं मिला। आजकल ओटीटी का दौर है। बेहतर होता कि 'लव एंड गॉड' को अधूरी ही, मूल रूप में ओटीटी पर रिलीज किया जाता। दर्शकों के लिए ऐसे अद्वितीय फिल्मकार की मूल फिल्म को देखना सुखद होता।
एक और फिल्म उन्होंने राजेंद्र कुमार और सायरा बानू को लेकर शुरू की थी-'सस्ता खून और महंगा पानी'। वो फिल्म पूरी होती, उससे पहले ही मात्र 48 वर्ष की अवस्था में आसिफ साहब दुनिया को अलविदा कह गए। बतौर निर्देशक उन्होंने 'मुगल-ए-आजम' सहित मात्र दो फिल्मों की सौगात दी, पर भारतीय सिनेमा का उल्लेख उनके बिना अधूरा है।