मंगलसूत्र पहनकर घूमने वाली वायरल फोटो पर Kangana Ranaut का आया रिएक्शन, शादी पर बोलीं- 'परिवार का दबाव...'
फिल्म ‘गैंगस्टर’ से फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाली कंगना रनौत ने हाल ही में फिल्म इंडस्ट्री में 20 साल पूरे किए हैं। कंगना अब फिल्म ‘भारत भाग्य विधा ...और पढ़ें
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HighLights
कंगना ने 'गैंगस्टर' के 20 साल पूरे होने पर अनुभव साझा किए
बहन रंगोली पर एसिड अटैक के बाद के संघर्ष बताए
शादी के दबाव और वायरल मंगलसूत्र फोटो पर प्रतिक्रिया दी
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। फिल्म गैंगस्टर से अपने करियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री कंगना रनौत (Kangana Ranaut) ने हाल ही में फिल्म इंडस्ट्री में बीस साल पूरे किए हैं। चार बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित कंगना अब फिल्म भारत भाग्य विधाता में नर्स की भूमिका में दिखेंगी। यह फिल्म साल 2008 में मुंबई के कामा अस्पताल में हुए आतंकी हमले पर है। अभिनेत्री और सांसद कंगना ने की खास बातचीत :
- पहली फिल्म गैंगस्टर की रिलीज को हाल ही में बीस साल हुए हैं। पहली बार सेट पर जाने पर कौन से भ्रम टूटे थे ?
जब आपकी उम्र कम होती है, तो आप चीजों को लेकर पूर्वाग्रह नहीं रखते हैं। मैं स्कूल से ही निकली थी। फिल्म सेट्स पर इतनी मेहनत करनी पड़ती है इसका मुझे आइडिया नहीं था। फिल्म निर्देशक अनुराग बासु ट्वाइलाइट (Twilight) शाट (उस शाट को कहा जाता है जो सूर्यास्त के तुरंत बाद या सूर्योदय से ठीक पहले की हल्की रोशनी में लिया जाता है) लेते थे। वो पूरी फिल्म ही ट्वाइलाइट में ही शूट हुई है।
सुबह तीन बजे ही हम लोग तैयार होना शुरू कर देते थे। छह बजे का शाट लेना होता था। ड्राइव करके सियोल (दक्षिण कोरिया) में हम अलग-अलग जगह जाते थे। फिल्म में एक ब्लूइश सी टोन है, जोकि उनके लिए वांछनीय थी। मैंने सोचा था कि अच्छा हुआ फिल्म मिल गई, लेकिन यह बहुत डिमांडिंग प्रोफेशन है।
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- गैंगस्टर की सफलता के बाद जिंदगी कितनी बदली?
जावेद अख्तर जी, शबाना आजमी जी का मुझे फोन आया था। मुझे लगा कि शायद अब रातों-रात मेरी जिंदगी बदल जाएगी। खैर, उसके बाद मुझे कोई काम ही नहीं मिला। महेश भट्ट और मुकेश भट्ट जी के साथ फिल्मों का जो अनुबंध था, वो चल रहा था, लेकिन बाहर से कोई काम नहीं मिल रहा था। उस वक्त पैरलल सिनेमा का दौर भी था, लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि मुझे किस कैटेगरी में रखा जाए। उस समय ज्यादतर आइटम नंबर बहुत प्रचलित थे। वो भी एक दौर था जहां बहुत संघर्ष रहा।
खबरें और भी
-आप महज उन्नीस साल की थीं, जब आपकी बहन रंगोली पर एसिड अटैक हुआ था। अभिनय के साथ अस्पताल की दौड़ भाग का अनुभव भूमिका निभाने में काम आया?
उस वक्त मुझमें जो परिपक्वता आई, उसने मुझे बदला था। दुख किसे कहते है, वो पहली बार महसूस किया था। जब इंसान को वाकई में किस्मत की मार पड़ती है, तो कैसा लगता है वो उस छोटी सी उम्र में देखा था। रात को मैं अस्पताल में उनके पास बैठती थी। फिर दिन में काम करती थी, क्योंकि उसके इलाज के लिए बहुत पैसों की जरूरत थी। मेरे भीतर जिम्मेदारी की भावना पनपी। मेरे युवा दिमाग में प्रश्न उठा कि जिंदगी जीने की कला क्या होती है? फिर लगा कि मेरे जीवन में तो सब उल्टा-पुल्टा हो रहा है। उसे सही करना होगा। इन चीजों ने मेरे व्यक्तित्व को एक आकार दिया।
- आपकी जिंदगी का सबसे इमोशनल सीन क्या रहा है?
जब रंगोली को एसिड अटैक के बाद देखा था। उसका पूरा चेहरा काला पड़ गया था। चेहरे में पस भर गया था। नयन-नक्श नहीं रहे थे। उससे पीड़ादायक मैंने जिंदगी में कुछ नहीं देखा था। उसके हाथ, चेहरे पर दाग थे। पापा-मम्मी खुद को संभाल नहीं पा रहे थे। पापा का ब्लड प्रेशर बढ़ रहा था। परिवार को संभालने वाला कोई नहीं था। मैं टीनएजर ही थी। मैंने कहा कि आप सब पहले घर चले जाइए, मैं इतने सारे लोगों को नहीं संभाल सकती हूं। मैंने कभी अपने परिवार को इस तरह से बिखरते हुए नहीं देखा था।
- उन एसिड फेंकने वालों पर बहुत गुस्सा रहा होगा?
बिल्कुल। ऐसे लोगों को आज भी छह-सात साल की सजा होती है, जबकि ऐसा अपराध करने वालों को फांसी की सजा होनी चाहिए। खैर, उस समय मेरी चिंता अपने परिवार का मनोबल बनाकर रखने की थी।
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- आपने कहा था हैसियत जब बढ़ती है, दुश्मन बढ़ते हैं। आपको कब लगा कि अब हैसियत बढ़ गई है...
देखिए, आपके दुश्मन जितने बड़े होते हैं, उतना ही बड़ा आपका ओहदा होता है। आखिर कोई व्यक्ति आपसे दुश्मनी क्यों मोल लेगा? अगर आज आपके दुश्मन बड़े हैं, तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं वे आपको इतना सक्षम मानते हैं कि आप उनके लिए एक खतरा हैं। किसी न किसी रूप में आप उन्हें इमोशनली छू रहे हैं तो आप वहां पर पहुंच चुके हो। (लंबी सी मुस्कान देते हुए) ऐसा मेरा मानना है।
- आपकी मंगलसूत्र पहने फोटो वायरल हुई थी। घर से शादी का दबाव रहा है?
अब दबाव वाली उम्र चली गई। हां, एक समय दबाव था कि शादी कर लो। खैर, हर एक की पर्सनल जर्नी होती है। जब जो होना है, वो तभी होगा।
- इन दिनों इंटरनेट मीडिया पर हाइपर सेक्सिजम (यानी अभिनेत्री को उसके यौन आकर्षण के नजरिए से प्रस्तुत करना) की चर्चा है। आपने अपने दायरों को कैसे बनाए रखा ?
मैंने हमेशा आइटम नंबरों और महिलाओं के वस्तुकरण को लेकर अपना रुख स्पष्ट रखा है। लेकिन मेरा यह भी मानना है कि आकर्षण, कामुकता और यौनिकता महिलाओं के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन अश्लीलता की एक लाइन जो जाने-अनजाने में क्रास हो जाती है, फिल्ममेकर्स को उसका थोड़ा ध्यान रखना चाहिए। मैं कभी भी आइटम नंबर करने को लेकर सहज नहीं रही हूं। यह भी सच है कि जब हम किसी पार्टी या समारोह में होते हैं, तो हमें भी गानों पर नाचना अच्छा लगता है।
चाहे होली की पार्टी हो या कोई और जश्न। मेरा मानना है कि गानों में जब यह प्रस्तुति अश्लीलता की हद तक पहुंच जाती है और परिवार के साथ देखने या सुनने लायक नहीं रह जाती, तब वह एक अलग दिशा में चली जाती है। वहीं चीजें थोड़ी गलत हो जाती हैं।
- अपनी जिंदगी में भाग्य और विधाता की भूमिका को कैसे देखती हैं?
माताओं से बड़ा भाग्य विधाता कौन होगा। पिता पालन-पोषण करते हैं, गुरू पढा़ते हैं। आज मैं जो बोल रही हूं, वो शब्द भी मैंने किसी से सीखे हैं, ये शरीर भी किसी ने दिया है। करियर में आगे चलकर अनुराग बासु ने ब्रेक दिया, विकास बहल और आनंद एल राय ने मुझे सफलता दी तो वो भी भाग्य विधाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने मुझे पर विश्वास करके मुझे टिकट दिया तो वह भी भाग्य विधाता हैं। ये फिल्म भी यही दिखाती है। अब जब आप सर्जरी बेड पर होते हैं उस समय नर्स ही सबसे बड़ी भाग्य विधाता होती हैं।
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- आपने कई सशक्त महिला किरदारों को निभाया है। इन्हें निभाते हुए आपमें कोई बदलाव आया ?
महिला सशक्तिकरण के आप जो भी रोल करते हैं सबसे अच्छी बात ये होती है कि आपको एक और महिला के बारे में उनकी जिंदगी के बारे में अनुभव करने का मौका मिलता है। वो आपकी जिंदगी का एक हिस्सा हमेशा के लिए बन जाती हैं। जैसे अब किसी नर्स को देखती हूं, तो ऐसा लगता कि मेरा उनके साथ एक रिश्ता बना हुआ है। मैं शायद उन्हें देखकर एक भाव से मुस्कराऊंगी, जो कि पहले नहीं होता था। अब एक आत्मियता का एक अलग रिश्ता जुड़ गया है। ऐसा हर कहानी के साथ होता है।
- आपको सशक्त महिला के तौर पर देखा जाता है, लेकिन कौन सी बातें आपको रुला देती हैं?
(मुस्कुराते हुए) मेरे लिए रोना बहुत आसान नहीं है। मैं मुश्किल से रोती हूं। मैं बहुत कम रोई हूं। लेकिन जब जब भी रोई हूं, तो कहीं न कहीं खुद को असहाय महसूस किया है। वास्तव में आप किसी भी परिस्थिति में हों, चाहे युद्ध जैसी स्थिति हो, आफिस में हो या जीवन का कोई और क्षेत्र आप किसी से भी लड़ सकते हैं। लेकिन, जिनसे आप प्रेम करते हैं, चाहे वे आपके परिवार के सदस्य हों या आपके बेहद करीबी वो आपको दुख पहुंचाते हैं, तब आप खुद को बहुत असहाय महसूस करते हैं। क्योंकि आप उनको कुछ बोल नहीं सकते।
उस समय जो गुस्सा और पीड़ा होती है, वह अक्सर आंसुओं के रूप में बाहर निकलती है। मैंने हमेशा नोटिस किया है कि हम यहां पर फंसते हैं। भाई बहन के बीच में हम लोग लड़ते भी बहुत हैं। उन्हें अपनी जिंदगी से निकाल भी नहीं सकते। (हंसते हुए) जिन्हें आप अपनी जिंदगी से अलग नहीं कर सकते, तो वो पीड़ा आपको सहन करनी पड़ती है।
-आपने धुरंधर की बहुत तारीफ की थी, लेकिन जब आपकी फिल्में आती हैं, तो इंडस्ट्री से आपको वैसे सपोर्ट नहीं मिलता। कभी निराशा नहीं होती ?
मैं सबको सपोर्ट करती हूं, जिसने अच्छी फिल्म बनाई हैं। वो मेरा कर्तव्य भी है, क्योंकि कला किसी एक की नहीं होती। कला हमें आशीर्वाद से मिलती है तो जब वो आशीर्वाद किसी पर है तो उस व्यक्ति विशेष को नजरअंदाज करके मैं उसकी हमेशा प्रशंसा करती हूं और अगर किसी दूसरे में ऐसा भाव नहीं है तो उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मुझे ये जरूर लगता है कि जब तक आप उस चीज को एक्सेप्ट करेंगे, तो ईश्वर की कृपा आप पर रहेगी। अगर आप उस चीज के डिनायल में रहेंगे तो वो कृपा आप पर नहीं रहेगी। मुझे लगता है कि मुझे हमेशा से ही जहां पर मैं ऐसी कोई चीज देखती हूं, जिसे फाइन वर्क कहते हैं, तो मैं उसके लिए नतमस्तक हूं।
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