'अनपढ़ लोगों से मैं बात नहीं करता...' घूसखोर पंडित के टाइटल विवाद पर बोले Manoj Bajpayee, गवर्नर पर दिया अपडेट
अभिनेता मनोज बाजपेयी ने अपनी आगामी फिल्म 'गवर्नर' और पात्रों की तैयारी पर बात की है। उन्होंने बॉक्स ऑफिस, ओटीटी, भारतीय अभिनय शैली और इंटरनेट ट्रोलिंग ...और पढ़ें
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समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
प्रियंका सिंह, मुंबई। अभिनेता मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpayee) ने हर बार खुद को पात्रों के लिए नए सिरे से गढ़ा है। अब भी वह नए पात्रों की तलाश में रहते हैं। उनकी अगली फिल्म गवर्नर 12 जून को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। फिल्म में उनका पात्र साल 1990 में देश के गवर्नर रहे एस. वेंकिटरमणन से प्रेरित है।
मनोज कहते हैं कि किसी पात्र की गहराई तक पहुंचना उनके लिए जुनून है। उन्होंने बाक्स आफिस नंबर्स, भारतीय अभिनय शैली, इंटरनेट मीडिया ट्रोलिंग जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय रखी।
एक ऐसा समय जहां सब कुछ इंस्टेंट (तुरंत) चाहिए, वहां पात्रों को गहराई से निभाने के लिए समय कैसे निकाल पाते हैं?
मैं एक समय पर एक ही काम करता हूं। बाकियों की फिल्म सौ दिन में बनती है, मेरी 60-65 दिन में, जिसमें 30 दिन मेरी तैयारी के लिए चाहिए होते हैं। मैं इस शहर में अभिनय करने ही आया था, इसलिए एक तरीके के चरित्र मुझे कभी अच्छे नहीं लगे। पात्र को उसके भीतर तक जाकर खोजना मेरा जुनून है। ओटीटी के दौर में वह करने का मौका मिल रहा है।
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कभी थकावट नहीं होती है?
पात्र के भीतर जाने में मानसिक तनाव होता है। पता नहीं ऐसा कब तक कर पाऊंगा। मैं चाहता हूं कि जब कोई मेरा नाम सोचे, तो वह मुझे कभी एक पात्र से जोड़कर न देखे। जब तक होगा करूंगा,नहीं हो पाएगा, तो जाहिर सी बात है,बीमार नहीं पड़ना है। फिर हल्की-फुल्की, उछल-कूद वाली कामेडी फिल्में करूंगा।
क्या राम गोपाल वर्मा की फिल्म पुलिस स्टेशन में भूत ने थोड़ा ब्रेक दिया?
हां, बहुत बड़ा ब्रेक रही। रामू जी इस बार कुछ अलग ही मूड में थे। वो नहीं चाहते थे कि मैं किसी तैयारी के साथ सेट पर आऊं। जबकि सत्या फिल्म के दौरान ऐसा नहीं था। वह गैंगस्टर फिल्म थी,उसमें मुझे भीकू म्हात्रे को ऐसा पात्र बनाना था, जिसे कभी देखा ना हो। उस दौरान कई गैंगस्टर फिल्में बन रही थीं। मुझे अलग करना था। उस वक्त रामू जी भी क्रांति करने के मूड में थे। हालांकि पुलिस स्टेशन में भूत के सेट पर वह हर दिन चौंका रहे थे। उन्होंने मुझे फिल्म में नचाया है और वह सब करवाया, जो मैंने कई सालों से किया नहीं था।
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गवर्नर फिल्म को लेकर तैयारी कैसी रही?
मेरे पास निर्देशक ने कई वीडियो और मटेरियल भेजे थे। हालांकि मैंने एस. वेंकिटरमणन जैसा बनने का प्रयास नहीं किया है। मुझे बिना भटके बस उनके व्यक्तित्व की झलक दिखानी थी, एकदम उनके जैसा बन जाता, तो दिलचस्प नहीं लगता। वह शांत व्यक्ति थे, लेकिन हर चुनौती से लड़ते थे। उनके दिमाग में केवल नंबर्स चलते रहते थे। हमने इस फिल्म पर साढ़े चार साल पहले काम शुरू किया था,हालांकि आज देश के माहौल के अनुसार यह फिल्म प्रासंगिक है। आज भी हम कुछ उसी दौर से गुजर रहे हैं, जहां संभलकर चलने की जरुरत है।
आपके पात्र की तरह आपकी नंबरों से दोस्ती नहीं है? यह फिल्म बाक्स आफिस पर रिलीज होगी?
मैंने बॉक्स आफिस से करियर को कभी नहीं आंका। हालांकि मेरी नीयत जरूर है कि मेरा निर्माता पैसा कमाए, लेकिन वह मेरा सिरदर्द नहीं है। सेट का हर व्यक्ति जानता है कि मैं अपने आप को किसी रोल में कितना जलाता हूं। मेरा काम दर्शक देखें, वो मायने रखता है। अगर कोई फिल्म देखने के बाद अच्छी नहीं लगती है, तो वह फिल्म फेल है। किसी फिल्म को दर्शकों ने केवल इसलिए नहीं देखा कि वह मुख्यधारा वाला सिनेमा नहीं है, तो तय कैसे होगा कि कौन सी फिल्म सफल है, कौन सी फेल।
मुझे अपनी फिल्म जुगनुमा – द फेबल पर गर्व है, उसने पैसे नहीं कमाए, लेकिन मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। यह मेरी सोच है, मैं गलत भी हो सकता हूं लेकिन अगर केवल बड़ी कॉमर्शियल फिल्में ही बनाते रहेंगे, तो सिनेमा का विकास नहीं हो सकता है। दर्शकों को कहानी से मतलब होना चाहिए। क्या उन्हें फिल्म देखकर मजा आया, इन सब पर बात होनी चाहिए, जो कोई
करता नहीं है।
आपकी बतौर निर्माता फिल्म भैया जी उम्मीदों के अनुसार नहीं कमा पाई? आगे क्या लेकर आ रहे हैं?
एक दो फिल्मों की स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है, जिसे बनाएंगे। भैया जी फिल्म अपूर्व कार्की के विजन पर बनी थी, जिसमें मैंने कोई दखल नहीं दिया था। मुझे उस पर गर्व है। मेरा घुटना उसी फिल्म के दौरान चोटिल हुआ है, जो आज तक खराब है। उस दौरान हम कोरोनाकाल से निकल रहे थे। मैं यकीन से कहता हूं कि अगर भैया जी अब रिलीज होती तो चलती, क्योंकि दर्शक फिर सिनेमाघरों में जा रहे हैं। बढ़िया कमर्शियल फिल्म थी। सिंगल थिएटर में फिल्म का बिजनेस अच्छा हुआ था, लेकिन मल्टीप्लेक्सेस में हम मार खा गए, क्योंकि वहां तक दर्शक जा नहीं रहे थे।
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गवर्नर के ट्रेलर लांच के दौरान आपने अपने पात्रों को लेकर किताब लिखने की बात की थी। अगर लिखेंगे, तो जीवन के किस हिस्से का जिक्र पहले होगा?
आटोबायोग्राफी लिखने में मेरी दिलचस्पी पता नहीं है या नहीं। लेकिन अगर लिखूंगा, तो अपने अभिनय के व्याकरण पर लिखूंगा, जिस पर मैंने लगातार काम किया है। मैंने अभिनय की पढ़ाई के दौरान काफी कुछ सीखा है, लेकिन उसे अभिनय करते समय हटा दिया। भारतीय सिनेमा में काम करने के लिए कलाकार के पास अलग तरीके का व्याकरण होना चाहिए, जो हालीवुड जैसा नहीं हो सकता है।
हमारे यहां पर जो फिल्म आलोचक हैं, वह सटल (गंभीर, जटिल) एक्टिंग की बहुत बात करते हैं, जो सबसे बड़ा स्कैम है। कोई हवा में तय नहीं कर सकता है कि कौन सा सीन सटल होगा, कौन सा नहीं। पात्र अपना सुर खुद तय करता है। जब तक कलाकार को चरित्र चित्रण करने नहीं आएगा, तब तक वो इस जाल में फंसता रहेगा। हम हालीवुड की फिल्में देखकर उनके सुर को ले लेते हैं। हमारा हिंदुस्तान अलग है। हमारे भाव, उसे व्यक्त करने का तरीका अलग है। चीन में सब चिल्लाकर खुद को व्यक्त करते हैं, लेकिन जापान में नहीं। हम यूरोपियन और अमेरिकन सिनेमा देखकर बहक गए हैं। भारतीय सिनेमा का व्याकरण अलग होना चाहिए, जिस पर कलाकारों को ध्यान देना चाहिए।
फिल्म घूसखोर पंडित का टीजर आते ही शीर्षक को लेकर विवाद हुआ। इंटरनेट मीडिया पर टीजर से राय बना लेना सिनेमा के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है?
पहले ऐसा नहीं होता था...अब उस फिल्म का नाम बदल गया है। हम रचनात्मक लोग है, शीर्षक बदलना बड़ी बात नहीं है। यह सब अब इसलिए ज्यादा हो रहा है, क्योंकि पहले इंटरनेट मीडिया नहीं था, जानकारी सीमित थी। हम कलाकार सबसे पहले आलोचना का ही शिकार होते हैं, फिर उससे निपटना सीख जाते हैं। जो आपको गाली दे रहा है, उसकी पढ़ाई-लिखाई और परवरिश क्या है वह जरूर देखें। मैं पढ़ा-लिखा आदमी हूं। आज भी बहुत पढ़ता हूं। अज्ञानियों से क्यों बात करूं।