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Mardaani 3 एक्ट्रेस रानी मुखर्जी ने 30 साल किए पूरे, 800 करोड़ क्लब और हिंसक सीन पर बोली ये बात

By Smita SrivastavaEdited By: Tanya Arora
Published: Sun, 25 Jan 2026 07:30 AM (IST)

रानी मुखर्जी ने फिल्म इंडस्ट्री में 30 साल पूरे होने पर अपने सफर, मर्दानी 3 की तैयारी और राष्ट्रीय फिल्म ...और पढ़ें

रानी मुखर्जी ने इंडस्ट्री में 30 साल किए पूरे/ फोटो- Instagram

रानी मुखर्जी ने इंडस्ट्री में 30 साल किए पूरे/ फोटो- Instagram

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संक्षेप में पढ़ें

स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। 2025 में रानी मुखर्जी को फिल्म ‘मिसेज चटर्जी वर्सेस नार्वे’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था, अब वह तैयार हैं ‘मर्दानी 3’ के साथ सिनेमाघरों में छा जाने को। 1996 में अभिनय की शुरुआत करने वाली रानी मुखर्जी इस साल इंडस्ट्री में अपने करियर के 30 साल पूरे कर रही हैं।

आप फिल्म इंडस्ट्री में 30 साल से काम कर रही हैं। क्या चीजें रहीं जिन्होंने अभिनय के जुनून को कायम रखा?

मेरे प्रशंसक, जिन्होंने काम की सराहना करके मेरी हिम्मत बढ़ाई। इतना प्यार एक कलाकार के लिए काफी होता है। हर बार उनके लिए एक ऐसा पात्र लेकर आना, जो उन्हें प्रेरित करे, खुश करे, इसी जज्बे ने मुझे इतने सालों तक यहां पर टिकने दिया है।

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आपने बताया था कि जब आपको राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था, तो आपकी बेटी अदिरा टीवी पर वह समारोह करण जौहर के बच्चों के साथ देख रही थीं। जब आपने प्रत्यक्ष रूप से अवॉर्ड दिखाया, तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?

वह भावुक हो गईं थीं, क्योंकि वह मेरे साथ वहां जाना चाहती थीं, लेकिन प्रोटोकाल था कि वहां बच्चों को लेकर नहीं जा सकते थे। उनका कहना है कि मुझे जब फिर से किसी फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिलेगा, तो वह मेरे साथ आएंगी।

आपके करियर में कई उतार-चढ़ाव आए होंगे। कौन सा दौर था, जो सिखा गया?

जब मेरे पिताजी का निधन हुआ था, वो बड़ा सदमा था। डैडी के जाने के बाद लगा मुझे संभालने वाला हाथ सिर से उठ गया है। वह मुझे सिखाकर गए थे कि जीवन में आगे बढ़ते रहना है। फिर जब मेरे बच्चे का जन्म हुआ तो मेरी मुलाकात एक अलग रानी से हुई। मां बनकर लगा कि मैं तो कोई और ही हूं। आप खुद से जूझते हुए भी अपने आप से ही बहुत कुछ सीखते हैं।

जीवन के टर्निंग प्वाइंट्स के साथ हम महिलाओं की जिंदगी में भी बदलाव आते हैं। जब मैं सिर्फ बेटी थी, तो एक अलग रुआब रहता था कि पापा हैं ना, वह सब देख लेंगे। फिर शादी के बाद जिम्मेदारी आई, बच्चे के बाद वह और बढ़ी। ‘मर्दानी 3’ फिल्म में भी ऐसा ही है, शिवानी शिवाजी राय जिन अपराधों के साथ फिल्म में निपट रही है, वह बतौर महिला मुझे भी समाज में दिखता है। इसलिए बतौर एक्टर मैं उन कहानियों को पर्दे पर लाती हूं।

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कमर्शियल फिल्मों के साथ आपने ‘ब्लैक’, ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी नान कमर्शियल फिल्में की थीं। आप पर कैसे सिनेमा का प्रभाव रहा है?

मेरे डैडी झांसी से थे। बचपन में छुट्टियों में जब उनके साथ वहां जाती थी, तो वो वहां की गलियां दिखाते थे। बचपन में ही झांसी की रानी का किला देख लिया था। ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी’ लाइनें कई बार सुनी हैं। पापा उनकी कहानियां सुनाते थे, वह जगह दिखाते थे, जहां से रानी लक्ष्मीबाई ने घोड़े पर छलांग लगाई थी। तब से वह कहानियां जेहन में बैठी हैं। हम बंगालियों में मां दुर्गा और मां काली की पूजा होती है, वह शक्ति हैं, जिन्होंने असुरों का संहार किया है। इसलिए शक्ति से जुड़ी कहानियों ने मुझे हमेशा प्रभावित किया है।

आजकल तो 800 करोड़ का क्लब शुरू हो गया है। कंटेंट की सफलता बिजनेस पर ज्यादा निर्भर हो गई है?

मेरा काम अच्छी कहानियों से जुड़ना है, उसे दर्शकों तक पहुंचाना है। अगर वह उन्हें पसंद आएगी, तो वह फिल्म को हिट बनाएंगे। प्रयास अच्छी फिल्म बनाने का होता है।

इस फ्रेंचाइजी में हिंसक सीन उतनी क्रूरता से नहीं दिखाए गए हैं, जितने आजकल की फिल्मों में दिखाए जाते हैं...

यह सब्जेक्टिव (व्यक्तिपरक) है। बतौर फिल्मकार हर किसी को अपने तरीके की फिल्में बनाने का हक है, क्योंकि फिल्ममेकिंग उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति होती है। आप उसे कैसे व्यक्त करना चाहते हैं, वह हर निर्देशक और कहानी के साथ अलग होता है। मर्दानी फिल्म फ्रेंचाइज में हिंसा होती है, जब लड़कियों के साथ गलत होता है, लेकिन उसे दिखाने का तरीका अलग है। हमारा रास्ता अलग है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जो हिंसा दिखा रहे हैं, वो सही या गलत कर रहे हैं।

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जीवन का कौन सा पल रहा, जब मर्दानी बनने की जरूरत महसूस हुई?

हम महिलाओं को तो हर दिन, हर परिस्थिति में मर्दानी बनना पड़ता है, कभी घर में, कभी बाहर, कभी सफर करते हुए।

एक कलाकार, एक मां, एक पत्नी और एक बेटी इन चारों में से सबसे कठिन क्या बनना है?

हम इनमें से जब भी किसी एक को ज्यादा अहमियत देने लगते हैं, तो दूसरे का संतुलन बिगड़ जाता है। इन सारी जिम्मेदारियों में संतुलन बनाकर चलना मेरे ही नहीं, किसी भी महिला के लिए चुनौतीपूर्ण होता है।

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