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    पॉकेट मनी निकालने के लिए शुरू की थी मॉडलिंग, इंडस्ट्री में क्या नियम बदलना चाहती हैं Taapsee Pannu

    By Smita SrivastavaEdited By: Surabhi Shukla
    Updated: Sat, 07 Mar 2026 10:30 PM (GMT+05:30)

    तापसी पन्नू (Taapsee Pannu) ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अपनी आर्थिक स्वतंत्रता, महिला-केंद्रित फिल्मों और इंडस्ट्री में मौजूद असंतुलन पर बात की। उन ...और पढ़ें

    फिल्म के एक सीन में तापसी पन्नू (फोटो-इंस्टाग्राम)

    फिल्म के एक सीन में तापसी पन्नू (फोटो-इंस्टाग्राम)

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    स्मिता श्रीवास्‍तव, मुंबई। अभिनय के साथ ही स्पष्ट और निर्भीक विचारों के लिए भी जानी जाती हैं तापसी पन्नू। लीग से हटकर अपनी फिल्‍मों से मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने वाली तापसी (Taapsee Pannu) ने अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आर्थिक स्वतंत्रता, महिला-केंद्रित फिल्मों और इंडस्ट्री में मौजूद असंतुलन पर हमने उनसे बात की, जानिए इस बातचीत के कुछ अंश।

    आर्थिक निर्भरता के मायने कब समझ आए?

    कालेज के दिनों में। स्कूल तक सब कुछ व्यवस्थित रहता है, लेकिन कालेज में आते ही लोकल ट्रांसपोर्ट से आना-जाना और छोटी-छोटी जरूरतों को लेकर लगता है कि काश पैसों को लेकर कंट्रोल होता। हर बार घर से पैसे मांगना और यह समझाना कि कोई चीज क्यों जरूरी है, आसान नहीं होता। घर का एक बजट होता है, उसकी सीमाएं होती हैं इसलिए कालेज के दूसरे साल में मैंने माडलिंग शुरू की ताकि जेब खर्च के लिए घर पर निर्भर न रहूं।

    Photo shared by Taapsee Pannu on July 28, 2024 tagging @nachiketbarve, @amandeepkaur87, @hairbyseema, @karishma.joolry, @evaniapannu, and @vijitgupta. May be an image of 1 person and makeup. (1)

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    कमाना शुरू किया तो लोगों ने कहा कि अब पैसों की कद्र समझ आएगी, लेकिन मेरे साथ उल्टा हुआ। मुझे अपने पैसे खर्च करने में खुशी मिली, क्योंकि अब फैसले मेरे थे। वह सशक्त करने वाला एहसास था। तभी तय कर लिया था कि आगे कभी घर से पैसे नहीं मांगूंगी।

    क्या आप मानती हैं कि महिला केंद्रित सिनेमा अब एक जरूरत है, सिर्फ ट्रेंड नहीं?

    हां, बिल्कुल, लेकिन जैसा मैंने कहा, हर जरूरत हर समय पूरी नहीं होती। उसी तरह समाज में संतुलन की आवश्यकता होती है, पर संतुलन हमेशा मौजूद नहीं रहता। फिल्मों में भी संतुलन की जरूरत है कि पुरुष-प्रधान और महिला-प्रधान सिनेमा को बराबर देखा जाए, बराबर पसंद या नापसंद किया जाए। उनमें समान स्तर का निवेश हो। दर्शक दोनों तरह की फिल्मों को समान मूल्य दें, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

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    साल भर में मुश्किल से एक या दो ऐसी फिल्में जिन्हें हम महिला-प्रधान सिनेमा कहते हैं, बाक्स आफिस पर कुछ हद तक आंकड़े दर्ज कर पाती हैं। बाकी फिल्‍में तो बस किसी तरह टिके रहने की कोशिश करती हैं।

    आपकी ‘थप्‍पड़’, ‘पिंक’ जैसी फिल्में महिला सशक्तीकरण की दिशा में कितनी सहायक हुईं?

    मुझे लगता है कि फिल्मों पर यह जिम्मेदारी डाल देना कि वही अकेले समाज बदल देंगी, अन्याय है। सिनेमा कला का माध्यम है। उसका काम आपके मन में किसी तरह का विचार बोना या चर्चा की शुरुआत करना है। अब उस विचार को आप कहां तक और किस दिशा में ले जाते हैं, यह दर्शक के रूप में आपके हाथ में है।

    हां, सिनेमा आपको चर्चा का विषय दे सकता है कि इस फिल्म में यह मुद्दा उठाया गया, इसे इस तरह दिखाया गया, क्यों दिखाया गया, क्या यह सही था या गलत? फिल्म आपको सोचने पर मजबूर कर सकती है, दिशा दिखा सकती है, पर चलना आपको ही पड़ता है।

    Photo shared by Taapsee Pannu on July 27, 2024 tagging @amandeepkaur87, @hairbyseema, @karishma.joolry, @evaniapannu, @vijitgupta, and @aikeyah. May be an image of 1 person, makeup, parasol and umbrella.

    क्या कभी ऐसा हुआ कि आपको यह कहकर महिला-प्रधान फिल्म करने से रोका गया हो कि नायिका प्रधान फिल्में नहीं चलतीं?

    मेरे लिए तो यह लगभग रोज की बात है। पहले से ही यह मान लिया जाता है कि मैं सिर्फ महिला प्रधान फिल्में ही करती हूं। जबकि मैंने ऐसी फिल्में भी की हैं जहां मेरा किरदार केंद्रीय नहीं था। अक्सर कहा जाता है कि ऐसी फिल्‍मों में निवेश नहीं किया जा सकता या फिर मुफ्त में काम कर लो। तब मैं उनसे पूछती हूं क्या मैं बस मुफ्त में ही काम करती रहूं!

    अगर आपको ऐसी कहानी चुननी हो जो हर भारतीय महिला को प्रेरित करे, तो वह किस विषय पर होगी?

    हमारे यहां ज्यादातर महिला-केंद्रित कहानियों में शुरुआत ऐसी महिला से होती है, जो शुरुआत में परिस्थितियों से घिरी होती है और अंत तक जीवन की बागडोर खुद संभाल लेती है। बहुत कम कहानियां हैं, जहां पहले ही फ्रेम से महिला को नायकीय प्रवेश मिलता हो। हम अभी उस मुकाम तक नहीं पहुंचे हैं, लेकिन प्रेरणादायक कहानियां मौजूद हैं।


    अगर आपको इंडस्ट्री का एक नियम बदलने का मौका मिले, तो वह क्या होगा?

    बहुत से अनकहे नियम हैं। जैसे सेट पर अलग-अलग लोगों के साथ अलग तरह का व्यवहार होता है। चाहे मुख्य और सहायक कलाकारों के बीच हो, या पुरुष और महिला कलाकारों के बीच। यह अंतर हमेशा मौजूद रहता है। मैं चाहती हूं कि वह बदले। जेंडर के अंतर की भी बात है जिसका जिक्र हम सभी महिलाएं कभी-न-कभी करती हैं। पर मुझे लगता है कि इंडस्ट्री हर दिन कोशिश करती है। निश्चित रूप से यह व्यावसायिक माडल है, इसलिए कभी गति कम होती है, कभी ज्‍यादा, लेकिन कोशिश जारी रहती है!

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