सिनेमा को ठुकरा चुनी भक्ति, महात्मा गांधी भी जिनकी आवाज़ के थे मुरीद, क्यों गुमनाम हुई वो 'आधुनिक मीरा'?
जूथिका रॉय, जिन्हें 'सिनेमा की मीरा' कहा गया, आजाद भारत की पहली सुबह रेडियो पर जिनकी आवाज गूंजी थी। महात्मा गांधी और पंडित नेहरू भी उनके भजनों के मुरी ...और पढ़ें

आजाद भारत की पहली आवाज, जो हुई गुमनाम
HighLights
आजाद भारत की पहली सुबह रेडियो पर गूंजी आवाज
महात्मा गांधी और नेहरू जूथिका रॉय के भजनों के मुरीद थे
भक्ति संगीत को चुना, फिल्मी दुनिया से दूर रहीं
एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। आजाद भारत... एक ऐसा भारत जहां हर तस्वीर कुछ ना कुछ कहानी बयां करके गई। 1947 में जब देश ने आजादी का चोला पहना तो मानो हर वो जंजीर टूट गई, जिसमें सालों से हम बंधे हुए थे। अब जब देश ने आजादी का जश्न मनाया तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सिनेमा का रुख कैसा रहा होगा। सिनेमा उस दौर में बड़ा हो रहा था... फल-फूल रहा था... अपने पंखों से उड़ान भर रहा था... नए सपने और नई कहानियों का परचम को लहराने के लिए हिंदी सिनेमा पूरी तरह से तैयार था।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी कि उस सुबह देशभर में रेडियो पर किसकी आवाज सुनाई दे रही थी। असल में एक ऐसी सिंगर की आवाज उस सुबह हर किसी ने सुनी, जिन्हें सिनेमा की मीरा का कहा गया। हालांकि आजादी की वो गुमनाम आवाज, कैसे अंधेरे में खो गई? आज बात उसी आवाज की और उन्हीं सुरों की मल्लिका की, जिन्हें हिंदी सिनेमा में भुला दिया गया।
कौन थीं जूथिका रॉय?
आजाद भारत की पहली सुबह अगर किसी की आवाज सबसे ज्यादा सुनाई दी थी तो वो कोई और नहीं बल्कि जूथिका रॉय ही थीं। वही जूथिका रॉय जिन्होंने अपने भजनों से पूरे देश का दिल जीता। 20 अप्रैल 1920 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में जन्मी जूथिका ने महज 7 साल की उम्र में ही गाना शुरू कर दिया था और 12 साल की उम्र आते-आते उन्होंने अपना पहला गाना रिकॉर्ड कर दिया था।
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भक्ति संगीत की दुनिया में जूथिका रॉय का कोई मुकाबला नहीं था। उस दौर में एक तरफ जहां नई-नई आवाजें सिनेमा को मिल रही थीं तो उन आवाजों के बीच में जूथिका रॉय की आवाज अलग पहचान बना चुकी थी। उनके द्वारा गाए भजनों को हर कोई गुनगुनाता था।
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जूथिका रॉय की आवाज पर जागता था पूरा देश
जूथिका रॉय ने आजादी से पहले का भारत देखा और आजादी के बाद का भी, लेकिन आजादी के पहले ही वो अपना नाम बना चुकी थीं। 1930 और 40 के दशक में उन्होंने खूब अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा। उनके गुरु और संगीतकार कमल दासगुप्ता ने उनकी आवाज़ को पहचाना और उनसे मीरा के भजन गवाए।
उनके भजन जैसे "मैं तो प्रेम दीवानी" और "घुंघरू बांध मीरा नाची रे" इतने मशहूर हुए कि हर घर में सुबह उनकी आवाज़ गूंजने लगी। रेडियो के दौर में हर कोई उनके गाने सुनने को बेताब रहता था।
आजाद भारत की पहली आवाज बनीं थीं जूथिका
जूथिका रॉय ने 40 के दशक में कई भजन गाए और उन भजनों के चलते वो पहचानी गईं। आखिरका वक्त आया आजादी के उस युग का यानि साल 1947 का, जब देश में आजादी की आवाज के रूप में सुनी गई जूथिका रॉय की आवाज। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आज़ाद हुआ, तो पंडित नेहरू और अन्य नेताओं के भाषणों के बाद, रेडियो पर देश का स्वागत जूथिका रॉय के देशप्रेम के गीतों से किया गया था।
यहां तक कि आज़ादी के पहले जश्न पर लाल किले से उनकी ही आवाज़ गूंजी थी। दरअसल उस वक्त जूथिका रॉय के गाने ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित हो रहे थे। कहा जाता है कि, जैसे ही जुथिका अपना संगीत का सेशन खत्म कर स्टेशन से निकलने वाली थीं कि इसी बीच आकाशवाणी के अधिकारी उनके पास आए और कहा कि, प्रधानमंत्री चाहते हैं कि वो तब तक गाती रहें, जब तक वह झंडा फहराएंगे। इसके बाद जूथिका ने अपनी आवाज दी और वो गाती रहीं और रेडियो पर उन्हीं के गाने बजते रहे।
बापू और नेहरू भी थे जूथिका रॉय की आवाज के मुरीद
जूथिका रॉय की आवाज की आवाज ने हर किसी को मंत्रमुग्ध किया था और इन्हीं में से एक नाम था राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का। कहा जाता है कि, जब गांधीजी जब पुणे की जेल में थे तब वो जूथिका रॉय के गाने हर दिन सुनते थे। वो हर सुबह प्रार्थना सभा की शुरूआत उनके ही गाने बजाकर करते थे।
अपनी प्रार्थनाओं और कई सभाओं में उन्होंने जूथिका रॉय के भजन और गाने सुने। गांधी जी के अलावा पंडित जवाहर लाल नेहरू भी जूथिका की आवाज के मुरीद थे और वह भी उनके भजनों को सुना करते थे। यहां तक कि सरोजिनी नायडू भी उन्हें 'भारत की मीरा' कहती थीं।
फिल्मों से दूर रहीं जूथिका रॉय
जूथिका रॉय का करियर फिल्मी दहलीज तक नहीं पहुंचा या यूं कह सकते हैं कि उन्होंने खुद उस दुनिया को नहीं चुना। हालांकि उन्होंने दो बंगाली फिल्म 'धुली' और 'रतनदीप' में अपनी मधुर आवाज दी थी। उनका मानना था कि उनकी आवाज़ ईश्वरीय भक्ति के लिए है, न कि फिल्मी परदे के नाच-गाने के लिए।
अपने चार दशक लम्बे करियर में जूथिका रॉय ने 200 से अधिक हिन्दी और 100 से अधिक बंगाली गानों को अपनी आवाज़ दी। साल 1972 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
वक्त के साथ जूथिका रॉय गुमनाम होती चली गईं। अंतिम समय उन्होंने कोलकाता के अपने घर में गुजार दी। 93 साल की उम्र में कोलकाता में 5 फ़रवरी, 2014 को जुथिका रॉय का निधन हो गया।
जब वो गईं तो ना कोई शोर-शराबा और ना कोई बड़ा सितारा, बस खामोशी के साथ उन्हें विदा कर दिया गया। ये बताता है कि एक वक्त पर जिस आवाज ने पूरे देश को मंत्रमुग्ध किया, उनके अंतिम समय में सिर्फ यादों के सिवा कुछ नहीं था।