Bhooth Bangla Review: कॉमेडी-हॉरर के साथ बड़े सरप्राइज लेकर आई अक्षय की 'भूत बंगला', फिल्म में कहां हुई चूक?
Bhooth Bangla Movie Review: अक्षय कुमार की हॉरर कॉमेडी फिल्म भूत बंगला को लेकर काफी इंतजार था। हालांकि, फिल्म वाकई देखने लायक है या नहीं... पढ़ें रिव् ...और पढ़ें

भूत बंगला फिल्म का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- जागरण ग्राफिक्स

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रिंकी तिवारी, नई दिल्ली। 'भूल भुलैया', 'भागम भाग', 'हेरा फेरी' और 'गरम मसाला' जैसी कल्ट फिल्में कर चुके प्रियदर्शन और अक्षय कुमार (Akshay Kumar) 14 साल बाद 'भूत बंगला' (Bhooth Bangla Review) के साथ कॉमेडी का डोज देने के लिए वापस लौटे।
मंगलपुर में सेट 'भूत बंगला' आपको 47 साल पुरानी कल्ट फिल्म 'जानी दुश्मन' (Jaani Dushman) की थोड़ी बहुत याद दिलाएगी। हालांकि, अक्षय की फिल्म का प्लॉट माइथोलॉजी और काला जादू से जोड़कर पेश किया गया है। फिल्म की कहानी कैसी है, निर्देशन और कलाकारों का प्रदर्शन कैसा है, पढ़िए फिल्म का रिव्यू...
क्या है फिल्म की कहानी?
'भूत बंगला' की कहानी (Bhooth Bangla Story) की शुरुआत मंगलपुर से होती है, जहां 'वधूसुर' नाम का राक्षस शादी के बाद नई नवेली दुल्हन को उठाकर ले जाता है। इसलिए मंगलपुर में शादी करना मना है। प्लॉट भी एक दुल्हन के गायब होने से ही होता है। फिर कहानी लंदन में रहने वाले अर्जुन आचार्या (अक्षय कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो कर्ज में डूबा हुआ है और पिता से मदद की भीख मांग रहा है।
फिर उसे पता चलता है कि मंगलपुर में दादा ने उसके नाम करोड़ों की हवेली छोड़ दी है जो एक श्रापित महल है। वह मंगलपुर आता है और इतनी बड़ी हवेली देखकर फैसला करता है कि उसकी बहन मीरा (मिथिला पालकर) की शादी उसी हवेली में होगी। शंभू (असरानी) अर्जुन आचार्या को बताता है कि इस बंगले पर भूत का कब्जा है। मगर मना करने के बावजूद अर्जुन उसी हवेली में रुकता है और उसे कुछ नहीं होता है।
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सुबह उसे हर कोई देखकर हैरान हो जाता है कि आखिर वह बच कैसे गया? फिर होती है वेडिंग प्लानर जगदीश (परेश रावल) और उनके भांजे (राजपाल यादव) के एंट्री। जब शंभू को पता चलता है अर्जुन यहां अपनी बहन की शादी कराने के फिराक में है तब वह अर्जुन को बताते हैं कि मंगलपुर में कोई शादी नहीं करता है, वधूसुर आएगा। सबको मार देगा और दुल्हन को उठाकर ले जाएगा।
वधूसुर की कहानी सुनकर भी अक्षय कुमार को शंभू की बात पर यकीन नहीं होता है और वह शादी की तैयारियां जारी रखता है। कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और सस्पेंस बढ़ता जाता है। इसके बाद अर्जुन मंगलवन में वधूसुर के मंदिर जाता है और वहां उसे राक्षस दिखता है। उस राक्षस से अर्जुन का खास कनेक्शन है और वह क्या है आपको फिल्म देखकर पता चलेगा।
जानदार है फिल्म की कॉमेडी
'भूत बंगला' देखकर आपको प्रियदर्शन की पुरानी कल्ट कॉमेडी फिल्मों की याद आनी तो तय है, खासकर 2007 में आई 'भूल भुलैया' (Bhool Bhulaiye) की और इसकी सबसे बड़ी वजह फिल्म का लोकेशन है। 'भूल भुलैया' वाले बंगले में ही 'भूत बंगला' की शूटिंग हुई है। फिल्म का पहला पार्ट हंसी-ठिठोली से भरा हुआ है। हर सीन आपको हंसने पर मजबूर कर देगी। असरानी, परेश रावल, राजपाल यादव और अक्षय कुमार मिलकर पहले पार्ट में आपको हंसा-हंसाकर लोट-पोट कर देंगे। कुछ सीन्स तो मिस करने लायक नहीं हैं। वहीं, कुछ डायलॉग्स को रीक्रिएट किया गया है। इंटरवल से पहले सस्पेंस अच्छा है।

दूसरा हाफ पहले वाले से थोड़ा स्लो है। दूसरे हाफ में आपको खूब हॉरर दिखेगा, साथ ही कहानी बैकड्रॉप में भी ले जाती है और फिर सारा सार समझाती है। सेकंड हाफ में हॉरर की कमी नहीं है, लेकिन कॉमेडी नाम मात्र की है। परेश रावल सुस्त पड़ जाते हैं, राजपाल यादव सिर्फ एक सीन में वापस आते हैं और असरानी की कमी तो खूब खलती है। क्लाइमैक्स आपको लुभा नहीं पाती है। साथ ही थोड़े सवाल और कन्फ्यूजन छोड़ जाती है।
कैसा है फिल्म का स्क्रीनप्ले-VFX?
'भूत बंगला' का स्क्रीनप्ले कमजोर लगा। कहानी की शुरुआत तो अच्छे से होती है, लेकिन एंड होते-होते खूब सारा कन्फ्यूजन छोड़ जाती है। जैसे अक्षय को भूत क्यों दिखता है, इसका लॉजिक कुछ रास नहीं आया। कहानी में काफी लूप होल्स थे। प्रियदर्शन का निर्देशन और विजुअल एफेक्ट्स शानदार थे।
सिनेमैटोग्राफी दिवाकर मणि फिल्म की सिनेमैटोग्राफी की है, जबकि प्रीतम ने फिल्म का म्यूजिक संभाला है। सिनेमैटोग्राफी तो अच्छी है, बैकग्राउंड म्यूजिक और गाने खास असर नहीं छोड़ते हैं।
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कलाकारों का कैसा रहा प्रदर्शन?
असरानी ने दिल जीत लिया। पहले हाफ में उनका स्क्रीनटाइम काफी था और वह जब भी स्क्रीन पर आते हैं, दिल खुश कर देते हैं। सेकंड हाफ में उनकी कमी खली। परेश रावल और राजपाल यादव ने भी फिल्म में अलग जान भरी। अक्षय कुमार की परफॉर्मेंस भी काबिल-ए-तारीफ थी। फिल्म में उनका डबल रोल है। उन्हें देख 2000 दशक वाले अक्षय की याद आ गई। जिशु सेनगुप्ता और मिथिला पालकर की भूमिका ने भी ध्यान खींचा।
हालांकि, वामिका गब्बी खास स्क्रीन प्रेजेंस नहीं छोड़ती हैं। फिल्म में उनका डबल रोल है लेकिन उनके सीन्स समझ नहीं आते हैं। वह कई जगह स्क्रीन से गायब दिखीं और जब लौटीं तो सवाल छोड़कर चली गईं। वहीं, तब्बू जब भी पर्दे पर आईं, उनसे नजरें हटा पाना मुश्किल था। यह कहना गलत नहीं होगा कि आइकॉनिक कलाकारों के चलते 'भूत बंगला' देखने लायक है।