Gandhi Talks Review: न शब्द, न शोर... फिर भी गदर मचा गई ये गूंगी फिल्म, एक्टर्स की खामोशी ने जीता दिल
Gandhi Talks Review: बिना शोर किए भी किसी कहानी को पावरफुल तरीके से स्क्रीन पर प्रेजेंट किया जा सकता है, इसका सबसे बड़ा सुबूत देती है विजय सेतुपति और अ ...और पढ़ें

गांधी टॉक्स रिव्यू/ फोटो- जागरण ग्राफिक्स

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दीपेश पांडेय, मुंबई। कहावत है कि पैसा बोलता है, कुछ इसी विषय पर निर्देशक किशोर पांडुरंग बेलेकर ने बनाई है साइलेंट फिल्म गांधी टॉक्स (Gandhi Talks review silent film)। यहां गांधी का आशय भारतीय नोटों पर छपी उनकी तस्वीर से है। इंस्टाग्राम रील्स और शॉर्ट्स के इस दौर में जहां 30 सेकंड में वीडियो बदलना लोगों की आदत बनती जा रही है।
उस दौर में दर्शकों का ध्यान पूरी फिल्म में पकड़ कर रख पाना फिल्मकारों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। उस दौर में बिना किसी संवाद के एक मूक फिल्म बनाकर निर्देशक किशोर ने बड़े साहस का काम किया है।
दो आर्थिक वर्गों के लोगों की कहानी है 'गांधी टॉक्स
फिल्म की कहानी दो अलग-अलग आर्थिक वर्गों से आने वाले महादेव (विजय सेतुपति) और मोहन बोसमैन (अरविंद स्वामी) के इर्द-गिर्द घूमती है। महादेव आर्थिक तौर पर बेहद कमजोर वर्ग से है, वहीं मोहन बिल्डर है। महादेव के घर में बीमार मां है, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में सफाई कर्मी की नौकरी की तलाश में है, लेकिन सरकारी अफसर नौकरी देने के लिए 50 हजार घूस लेता है।
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गायत्री (अदिति राव हैदरी) महादेव की प्रेमिका है, उसके घरवाले उसकी लिए शादी का रिश्ता देख रहे है, लेकिन गायत्री का दिल महादेव पर लगा रहता है, जिसके घर में खाने के भी पैसे नहीं है। वहीं मोहन एक-एक करके अपने परिवार के सभी सदस्यों को खो चुका है। सरकार का कोई भ्रष्ट केंद्रीय मंत्री सिस्टम की सहायता से उसे बर्बाद करने के पीछे पड़ा है, जिससे उसकी सारी संपत्ति पर नीलामी का नोटिस लग जाता है। यानी जिसके पास पैसे हैं और जिसके पास पैसे नहीं हैं, परेशान तो दोनों हैं।
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घूस के लिए पैसे इकट्ठा करने के लिए महादेव, मोहन के घर में चोरी करने की योजना बनाता है। अब क्या महादेव अपनी योजना में सफल होता है और क्या मोहन मंत्री और दुश्मनों की साजिश से निजात पाता है, यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।
आर्थिक तंगी से गुजर रहे व्यक्ति की मनोदशा बताती फिल्म
फिल्म की कहानी में कुछ नया नहीं है, लेकिन कहानी को दिखाने का तरीका अलग है। इससे पहले मराठी फिल्मों का निर्देशन कर चुके किशोर ने फिल्म के हर सीन पर अपनी पकड़ बनाए रखी है। लेखन में एक आदमी का घर के बाहर चप्पल निकालकर जाने वाले सीन हो या फ्रिज में रखे खाने के सामान को ललचाई आंखों से देखना वाला, आर्थिक तंगी से गुजर रहे व्यक्ति की मनोदशा उन्होंने अच्छे से दिखाई हैं।
निर्देशन में इमोशन, ड्रामा और कॉमेडी, बिना संवाद के भी वह अपनी बात दर्शकों तक पहुंचाने में सफल दिखे हैं। विजय सेतुपति (Vijay Sethupathi ) पहले भी कई बार अपने अभिनय की छाप छोड़ चुके हैं, इस फिल्म में उन्होंने दिखाया है कि बिना किसी संवाद के भी वह अपने चेहरे के हाव-भाव और अभिनय से कमाल कर सकते हैं। चोर मंगू की भूमिका में सिद्धार्थ जाधव दर्शकों को चेहरे पर हंसी बिखेरते हैं। अरविंद स्वामी भी अपने पात्र में अच्छे दिखे हैं।
अदिति (Aditi Rao Hydari) के हिस्से में करने के लिए कुछ खास नहीं आया, लेकिन जितना भी आया उन्होंने अपने हाव-भाव और आंखों से वह सब ईमानदारी से प्रस्तुत किया है। राजनेता की छोटी सी भूमिका को भी महेश मांजरेकर ने अच्छे से पकड़ा है। जब फिल्म में डायलॉग न हो तो अभिनय के साथ-साथ बैकग्राउंड संगीत और सिनेमैटोग्राफी की भूमिका काफी अहम हो जाती है।
संगीत है 'गांधी टॉक्स' की ताकत
एआर रहमान के संगीत और करण बी रावत की सिनेमैटोग्राफी ने दर्शकों को हर भाव, हर सीन को समझाने का काम बखूबी किया है। फिल्म में एआर रहमान द्वारा ही संगीतबद्ध किए कुछ गाने तो हैं, सभी परिस्थितियों के हिसाब से सही भी लगते हैं। हालांकि, कोई भी गाना थिएटर से निकलने के बाद याद नहीं रह जाता है।
फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन और विजुअल इफेक्ट्स में कुछ कमियां दिखी, लेकिन वो फिल्म का आकर्षण बिंदु नहीं हैं, तो नजरअंदाज की जा सकती हैं। कुल मिलाकर 2 घंटे 13 मिनट की यह फिल्म शुरुआत कुछ मिनटों को छोड़कर दर्शकों को अपने साथ लगातार बांधे रखती है।