Raja Shivaji Review: रोंगटे खड़े कर देगी छत्रपति शिवाजी की कहानी; पर्दे पर छाए Riteish Deshmukh, सलमान के कैमियो ने बटोरी तालियां
Riteish Deshmukh की मोस्ट अवेटेड फिल्म 'राजा शिवाजी' 1 मई को थिएटर्स में रिलीज हो गई है। यहां पढ़ें रिव्यू- ...और पढ़ें

राजा शिवाजी थिएटर्स में हुई रिलीज

समय कम है?
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प्रियंका सिंह, मुंबई। एक छोटा सा बच्चा मुगलों, निजामशाही और आदिलशाही का झंड़ा देखकर अपने झंडे के बारे में पूछता है, जवाब मिलता है कि उसके लिए स्वराज्य चाहिए। वो सपना फिर महासंग्राम का रूप लेता है, जब मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज अपना जीवन हिंदवी स्वराज्य को पाने के लिए समर्पित करते हैं। उनके बचपन से लेकर अफजल खान को ढेर करने तक की कहानी अभिनेता रितेश देशमुख पूरे सम्मान के साथ फिल्म राजा शिवाजी में लेकर आए हैं।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी शुरू होती है दक्कन को पाने की मुगलों, निजामशाही और आदिलशाह की नापाक चाह से, जिसे पूरा करने के लिए वह लोगों पर हर तरह के जुल्म ढाते हैं। लखुजी राव जाधव (महेश मांजरेकर) और शाहजी राजे भोसले (सचिन खेड़ेकर) निजमाशाही में काम करते हैं। उन्हें आदिलशाह और मुगल अपनी तरफ लेने का प्रयास करते हैं, ताकि वह उनके जरिए दक्कन पर कब्जा कर पाए। इसी बीच शाहजी के दोनों बेटे संभाजी राजे (Abhishek Bachchan) और शिवाजी राजे (Riteish Deshmukh)) गुलामी के सामने सिर झुकाने से इनकार करते हैं।

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आदिलशादी में काम कर रहा अफजल खान (Sanjay Dutt), मोहमम्द आदिल शाह (अमोल गुप्ते) के इशारे पर शिवाजी राजे और संभाजी राजे को खत्म करना चाहता है, क्योंकि दोनों गुलामी की बेड़ियों को तोड़कर अपनी जमीन को फिर से हासिल कर रहे होते हैं। आगे क्या होता है, उसके लिए फिल्म देखनी होगी।
राजा शिवाजी रिव्यू
फिल्म के लेखन, निर्देशन और निर्माण की जिम्मेदारी रितेश देशमुख के मजबूत कंधों पर थी। शिवाजी राजे के बचपन से लेकर अफजल खान को मार गिराने तक की भव्य कहानी में उनकी दस साल की रिसर्च दिखती है। मराठी और हिंदी में रिलीज हुई इस फिल्म का प्रोडक्शन वैल्यू शानदार है। भव्य सेट हैं, युद्ध के दृश्य रोंगटे खड़े करते हैं, क्लाइमेक्स, जिसमें अफजल धोखे से छत्रपति शिवाजी महाराज को मारने की कोशिश करता है, दमदार है। इतने सारे पात्रों के बीच भी रितेश की निर्देशन पर पकड़ मजबूत है, वह किसी भी पात्र को खोने नहीं देते हैं।
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छत्रपति शिवाजी महाराज के बचपन, किशोरावस्था, पत्नी सईबाई और मां जीजाबाई के साथ उनका मजबूत रिश्ता, भाई संभाजी राजे के साथ भावनात्मक जुड़ाव, स्वराज्य में भगवा लहराने का आत्मविश्वास, उनकी तलवार की धार से लेकर बुद्धि की धार तक अद्भुत युद्ध नीतियों को रितेश ने फिल्म में विश्वसनीयता से दर्शाया है। संगीतकार जोड़ी अजय-अतुल का संगीत फिल्म की जान है, जो हर मोड़ पर स्वराज्य के लिए लड़ी गई मराठाओं की इस लड़ाई में जोश भर देता है। संतोष सिवन जैसे अनुभवी सिनेमेटोग्राफर का साथ इसे विजुअली एक स्तर ऊपर ले जाता है। हालांकि फिल्म के विजुअल इफेक्ट बेहतर हो सकते थे। फिल्म की लंबाई को भी कम किया जा सकता था।
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डायलॉग्स ने बटोरी तालियां
पीठ पर वार करने की फितरत मराठे जिस दिन पहचान लेंगे, वह तुम्हारे अंत की शुरुआत होगी..., अगर स्वराज्य समझने जाओगे, तो खुद भगवा लहराओगे... स्वराज्य गुलामी नहीं, वफादारी मांगता है... जैसे संवाद तालियां बटोरते हैं।
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रितेश के बेटे का डेब्यू सराहनीय
अभिनेता रितेश देशमुख ने छत्रपति शिवाजी महाराज के किरदार को जीया है। हे हिंदवी स्वराज्य व्हावे, ही तर श्रींची इच्छा बोलकर जब वह अफजल का पेट अपने वाघनख से फाड़ते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शिवाजी राजे के बचपन के रोल में रितेश के बेटे राहिल देशमुख चौंकाते हैं, बचपन से ही मन में स्वराज्य को पाने की जगी ज्वाला को उन्होंने बखूबी दर्शाया है। संभाजी राजे के रोल में अभिषेक बच्चन का काम बढ़िया है।
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सपोर्टिंग किरदारों ने भी फूंकी जान
सईबाई की छोटी सी भूमिका में जेनेलिया देशमुख (Genelia Deshmukh) और जीजाबाई के रोल में भाग्यश्री (Bhagyashree) याद रह जाती हैं। विद्या बालन (Vidya Balan) का निभाया बड़ी बेगम का पात्र और बेहतर लिखा जा सकता था। सचिन खेड़ेकर और महेश मांजरेकर का अनुभव फिल्म में नजर आता है, वह अपने-अपने पात्रों में सहज लगते हैं। अपनी 63 बेगमों को एक साथ मौत के घाट उतारने वाले अफजल की क्रूर भूमिका में संजय दत्त जंचते हैं। शिवाजी राजे के अंगरक्षक जिवा महाले के रोल में सलमान खान (Salman Khan) जब पर्दे पर आते हैं, तो तालियां और सीटियां बटोरते हैं।