पलवल में टीबी मरीजों की सांसें अटकीं, 3 महीने से नहीं मिला निक्षय पोषण भत्ता; आभा आईडी का नया नियम बना रोड़ा
पलवल में टीबी के हजारों मरीजों को पिछले तीन महीनों से निक्षय पोषण योजना के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता नहीं मिल पा रही है। नए सरकारी नियम के तहत आभा ...और पढ़ें

मरीजों को इलाज के साथ-साथ गंभीर आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ रहा है। प्रतीकात्मक तस्वीर
HighLights
टीबी मरीजों को तीन माह से नहीं मिला पोषण भत्ता।
आभा आईडी के नए नियम से भुगतान प्रक्रिया रुकी।
पलवल में टीबी के मामलों में लगातार वृद्धि।
कुलवीर चौहान, पलवल। टीबी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे पलवल जिले के हजारों मरीजों को निक्षय पोषण योजना के तहत सरकार की तरफ से मिलने वाली आर्थिक सहायता का लाभ नहीं मिल पा रहा है। बीते तीन महीनों से मरीजों को पौष्टिक आहार के लिए मिलने वाली आर्थिक सहायता रुकी हुई है। इससे मरीजों को इलाज के साथ-साथ गंभीर आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ रहा है।
करीब ढाई हजार मरीजों को है इंतजार
बता दें कि निक्षय पोषण योजना भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही एक प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजना है। इसके तहत, पंजीकृत टीबी (क्षय रोग) रोगियों को उनके इलाज के दौरान पोषण संबंधी सहायता के लिए प्रतिमाह एक हजार रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है लेकिन ढाई हजार के करीब मरीजों का लाभ रुका हुआ है।
गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ा
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सरकार के नए नियम के अनुसार अब टीबी संक्रमण से जूझ रहे मरीजों को आभा आईडी बनने के बाद ही भुगतान प्रक्रिया शुरू हो सकेगी, इसके लिए मरीजों के चेहरे का स्कैन होगा। इस वजह से मरीज इस योजना के लाभ से वंचित हैं।
विभाग के अनुसार उनके द्वारा यह कार्य तेजी से किया जा रहा है, ताकी लाभार्थियों को फिर से सहायता राशि का लाभ मिल सके। वहीं मरीजों का कहना है कि बीमारी के दौरान पौष्टिक भोजन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, लेकिन सरकारी मदद रुकने से गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
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जिले में लगातार बढ़ रहा है टीबी का ग्राफ
एक तरफ जहां मरीजों को आर्थिक मदद नहीं मिल रही, वहीं दूसरी तरफ जिले में टीबी का ग्राफ नीचे आने के बजाय हर साल ऊपर जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ाने वाले हैं। 2021 में 2596 मामले सामने आए थे, जबकि इनमें से 2263 ठीक भी हो गए थे।
वहीं 2022 में 2868 मामले सामने आए, इनमें से 2559 सही हुए। 2023 में 2905 मामले टीबी के आए, जिनमें से 2652 सही हुए। 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 3300 पहुंच गया, इनमें से 2625 सही हो गए।
वर्ष 2025 में 3315 मामले सामने आए। इस वर्ष 2026 के शुरुआती साढ़े पांच महीनों में ही 1,533 नए मामले सामने आए। जिले में इस समय करीब 2,200 से 2,500 के बीच एक्टिव (सक्रिय) टीबी मरीज पंजीकृत हैं, जिनका इलाज चल रहा है।
प्रदूषण और वेंटिलेशन की कमी बनी मुख्य वजह
विशेषज्ञों के अनुसार, जिले में लगातार प्रदूषित होता वातावरण फेफड़ों की बीमारियों और टीबी को बढ़ावा दे रहा है। इसके अलावा शहर के घने रिहायशी इलाकों में धूप, ताजी हवा और वेंटिलेशन की भारी कमी है। कमरों में नमी रहने के कारण टीबी का संक्रमण बेहद तेजी से फैलता है।
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, जिले में करीब 5 से 7 प्रतिशत मरीज ऐसे हैं जो दोबारा संक्रमित हुए हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि कई मरीज स्वास्थ्य में थोड़ा सुधार होते ही खुद को ठीक मान लेते हैं। वे डाॅक्टर की सलाह के बिना ही इलाज के बीच में दवा खाना छोड़ देते हैं, जिससे बैक्टीरिया दोबारा और अधिक मजबूती से हमला करता है।
जल्द भुगतान करने का वादा
जिला स्वास्थ्य विभाग में टीबी मरीजों का विभाग देख रहे डाॅ. संजीव तंवर के अनुसार सरकार के नए नियम के अनुसार अब टीबी संक्रमण से जूझ रहे मरीजों को आभा आईडी बनने के बाद ही भुगतान प्रक्रिया शुरू हो सकेगी। उनका विभाग तेजी से काम कर रहा है और भुगतान प्रक्रिया शुरू की जा रही है। जल्द ही सभी मरीजों को भुगतान कर दिया जाएगा।