इंकैब इंडस्ट्रीज: दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को छिपाकर CoC गठन का आरोप, 5 सितंबर को होगी सुनवाई
इंकैब इंडस्ट्रीज के दिवाला समाधान मामले में NCLAT ने सुनवाई 5 सितंबर 2026 तक स्थगित कर दी है। मजदूरों ने आरोप लगाया कि रिजोल्यूशन प्रोफेशनल ने दिल्ली ...और पढ़ें

इंकैब इंडस्ट्रीज लिमिटेड के दिवाला समाधान मामले में मंगलवार को एनसीएलएटी में सुनवाई हुई।
HighLights
RP पर दिल्ली हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश छिपाने का आरोप।
फर्जी दावों पर कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) बनाने का आरोप।
जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। इंकैब इंडस्ट्रीज लिमिटेड के दिवाला समाधान (IBC) मामले में मंगलवार को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) की अध्यक्ष पीठ में सुनवाई हुई।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपील का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल ने इस मामले की अगली सुनवाई 5 सितंबर 2026 तक के लिए स्थगित कर दी है।
सुनवाई के दौरान मजदूरों का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि रिजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) ने दिल्ली हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण आदेश को NCLT, कोलकाता बेंच से छिपाया और फर्जी दावों के आधार पर कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) का गठन कर दिया।
मजदूर पक्ष के अधिवक्ता ने ट्रिब्यूनल को बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 6 जनवरी 2016 के अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि इंकैब पर बैंकों की कुल देनदारी केवल 21.63 करोड़ रुपये थी, जो वर्ष 1992 से पहले लिए गए ऋण से संबंधित थी और 1995 के बाद समाप्त हो चुकी थी।
इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। ऐसे में कंपनी पर बैंकों का कोई वैध बकाया नहीं बचता है और नियमानुसार केवल श्रमिक ही CoC के सदस्य बनने के पात्र हैं।
अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि तत्कालीन आरपी शशि अग्रवाल ने कमला मिल्स लिमिटेड, फस्क्वा इंवेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड और पेगाशस एसेट रिकंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के 2,009 करोड़ रुपये के फर्जी दावों को स्वीकार कर उन्हें CoC में शामिल किया।
बाद में 4 जून 2021 को NCLAT ने शशि अग्रवाल को हटा दिया था और IBBI ने भी उनकी पात्रता समाप्त कर दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया।
मजदूरों ने नए आरपी पंकज टिबरेवाल पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को छिपाकर ट्रॉपिकल वेंचर्स कंपनी लिमिटेड सहित चार कंपनियों के 3,074 करोड़ रुपये के फर्जी दावों के आधार पर CoC बनाई।
30 जून 2026 को NCLAT ने ट्रॉपिकल वेंचर्स के 1,646 करोड़ रुपये के दावे को खारिज करते हुए केवल 85 करोड़ रुपये पर विचार का निर्देश दिया था।
मजदूर पक्ष का दावा है कि यह 85 करोड़ रुपये का दावा भी अवैध है, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सिविल अपील दायर की गई है। सुनवाई के दौरान मजदूरों की ओर से अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव, आकाश शर्मा और रिशव रंजन उपस्थित रहे।