CUJ के वैज्ञानिकों का कमाल! संध्या मालती फूल से बना डाला सोलर सेल, बहुत सस्ती और सुरक्षित होगी सौर ऊर्जा
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड के वैज्ञानिकों ने संध्या मालती फूल की पंखुड़ियों से एक कम लागत वाला और पर्यावरण-अनुकूल सौर सेल विकसित किया है। यह शोध स् ...और पढ़ें

संध्या मालती फूल से बना पर्यावरण-अनुकूल सोलर सेल: सीयूजे की हरित ऊर्जा में बड़ी उपलब्धि।
HighLights
सीयूजे ने संध्या मालती फूल से बनाया पर्यावरण-अनुकूल सोलर सेल।
कम लागत, गैर-विषैला, पर्यावरण-अनुकूल सौर सेल विकसित किया।
शोध प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित, हरित ऊर्जा में बड़ी उपलब्धि।
कुमार गौरव, रांची। स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा (Green Energy) के क्षेत्र में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड (CUJ) के वैज्ञानिकों ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। यूनिवर्सिटी के ऊर्जा इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने हमारे आसपास पाए जाने वाले 'संध्या मालती' फूल की पंखुड़ियों से एक ऐसा सौर सेल (Solar Cell) विकसित किया है, जो न केवल बेहद कम लागत वाला है, बल्कि पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल भी है।
यह शोध भविष्य में सौर ऊर्जा तकनीक को आम लोगों के लिए अधिक सुलभ, सस्ती और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है।
शाम को खिलने वाले फूल से ऐसे बनी बिजली
शोधकर्ताओं ने मिराबिलिस जलापा (Mirabilis Jalapa) फूल की पंखुड़ियों से प्राकृतिक रंग (डाई) निकाला और उसका उपयोग 'डाई-सेंसिटाइज्ड सोलर सेल्स' (DSSC) या ग्रैट्जेल सेल्स में किया। यह तकनीक सूर्य के प्रकाश को सीधे बिजली में बदल देती है।
संध्या मालती को देश भर में फोर ओ-क्लाक फ्लावर, गुल-अब्बास और गुल-बख्शी के नाम से भी जाना जाता है। इसकी खासियत यह है कि इसके फूल आमतौर पर शाम चार बजे के बाद ही खिलते हैं। पारंपरिक चिकित्सा और सजावट में इसका इस्तेमाल सालों से होता आ रहा है, लेकिन अब इससे बिजली भी बनाई जा सकेगी।
यह तकनीक कैसे काम करती है?
ऊर्जा इंजीनियरिंग विभाग के सह-प्राध्यापक और इस शोध के मुख्य वैज्ञानिक डाॅ. बासुदेव प्रधान ने बताया कि फूल से निकाले गए प्राकृतिक रंग का इस्तेमाल सौर सेल में सेंसिटाइजर के रूप में किया गया है। यह सेंसिटाइजर सूर्य की रोशनी को सोखकर इलेक्ट्रॉन्स के फ्लो को एक्टिव करता है, जिससे बिजली पैदा होती है।
वैज्ञानिकों ने शुरुआती रिसर्च में 0.61 प्रतिशत की पावर कन्वर्जन एफिशिएंसी (PCE) और लगभग 250 घंटे तक की स्थिरता (Stability) हासिल की है। भले ही यह शुरुआती परिणाम है, लेकिन प्राकृतिक डाई आधारित सोलर सेल तकनीक के लिए इसे बहुत बड़ी कामयाबी माना जा रहा है।
केमिकल वाले सोलर पैनल से कितना बेहतर?
डाॅ. प्रधान के अनुसार, इस समय बाजार में मौजूद सोलर सेल्स में जिन सिंथेटिक डाई का इस्तेमाल किया जाता है, वे बहुत महंगी होती हैं और पर्यावरण के लिए भी खतरनाक हैं। विशेष रूप से रूथेनियम आधारित डाई प्रकृति के लिए सुरक्षित नहीं हैं।
इसके विपरीत, संध्या मालती फूल से तैयार यह प्राकृतिक डाई पूरी तरह से गैर-विषैली (Non-toxic) और बायो-डिग्रेडेबल है। यह रंग आसानी से इथेनॉल में घुल जाता है, जो इसे इस तकनीक के लिए सबसे बेस्ट बनाता है। सबसे अच्छी बात यह है कि यह किसी खाद्य स्रोत (फूड सोर्स) से नहीं आता, इसलिए इससे खाद्य सुरक्षा पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।
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अंतरराष्ट्रीय जर्नल में मिली जगह
डाॅ. बासुदेव प्रधान के नेतृत्व में इस शोध को प्रशांत कुमार, अंशु कुमार, आयुषी परीक, एनामूल हक और अनिक सेन की टीम ने मिलकर पूरा किया है। इस बड़ी खोज को दुनिया की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका 'जर्नल ऑफ पावर सोर्सेज' में प्रकाशित किया गया है।
इससे न केवल सीयूजे (CUJ) को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है, बल्कि यह झारखंड और पूरे देश के वैज्ञानिक समुदाय के लिए गर्व की बात है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तकनीक को बड़े पैमाने पर विकसित किया गया, तो आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा संकट और पर्यावरण प्रदूषण से निपटने में भारत दुनिया को नया रास्ता दिखाएगा।
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