मंगल मुद्दा: लाखों पौधे लगाने का दावा, 40 करोड़ खर्च... फिर भी क्यों तप रहा झारखंड?
झारखंड में पांच साल में 30 लाख पौधे लगाए गए, जिनमें से 70% जीवित रहे। पुराने पेड़ों की कटाई के कारण पर्यावरण पर असर दिख रहा। तापमान बढ़ रहा और भूजल स् ...और पढ़ें

झारखंड में लाखों पौधे लगाने के बावजूद क्यों बढ़ रहा तापमान और घट रहा भूजल।
HighLights
पांच साल में 30 लाख पौधे लगाए, 70% जीवित रहे।
पुराने पेड़ कटने से तापमान बढ़ा, भूजल स्तर घटा।
ग्रीन कवर बढ़ा पर पर्यावरण पर सकारात्मक असर नहीं।
राज्य ब्यूरो, रांची। बारिश के साथ ही राज्य में पौधरोपण को अभियान के तौर पर चलाया जाता है। वन एवं पर्यावरण विभाग, ग्रामीण विकास विभाग समेत नगर निकायों द्वारा भी पौधरोपण किया जाता है। पिछले पांच साल में करीब तीस लाख पौधे राज्य में लगाए गए हैं।
इनमें वन क्षेत्र की खाली पड़ी भूमि, सड़क किनारे और आवासीय क्षेत्रों में भी पौधे लगाए जाते हैं। वन उत्पादकता संस्थान के आंकड़ों के मुताबिक लगाए गए पौधों की उत्तरजीविता यानि जीवित रहने की दर 70 प्रतिशत है।
नेशनल हाइवे के किनारे लगाए जाने वाले पौधे बायोमास तो बढ़ाते हैं लेकिन इनमें ज्यादातर छोटे आकार के पौधे लगाए जाते हैं। राज्य में पिछले पांच सालों में सड़क परियोजनाओं की वजह से 1.25 लाख पौधे काटे गए हैं।
इनमें से 20 हजार पौधे ऐसे हैं जो 30 से 50 साल पुराने हैं। सड़क चौड़ीकरण और नई सड़क परियोजनाओं के लिए वन विभाग की स्वीकृति से ये पौधे काटे गए हैं। इसके अलावा कोयला और लौह खनन के लिए भी 2.5 लाख पौधे काटे गए हैं। इन काटे गए पौधों की क्षतिपूर्ति के लिए करीब चार लाख अतिरिक्त पौधे लगाए भी गए हैं।
बता दें कि कोरोना काल में जामताड़ा सहित झारखंड के कई जिलों में हजारों पेड़ काट दिए गए, मामला घ्हाई कोर्ट में चल रहा है। इसी तरह एनएचएआई को भी दावों के मुताबिक पेड़ नहीं लगाने पर फटकार मिल चुकी है।
पौधरोपण पर वर्षवार खर्च
2021- 5 करोड़
2022- 8.5 करोड़
2023- 7 करोड़
2024- 9 करोड़
2025- 10.5 करोड़
( इनमें वन विभाग द्वारा खर्च की गई राशि के अलावा क्षतिपूर्ति के लिए खनन कंपनियों द्वारा दी गई राशि भी शामिल है)
इन प्रजाति के पौधे लगाए गए
- जामुन, कटहल, आम, इमली, महुआ, साल या सखुआ, शीशम, करंज, महोगनी।
( यूकलिप्टस और केसिया जैसे पौधे पिछले पांच सालों में नहीं लगाए गए, ये झारखंड की पारिस्थितिकी के अनुकूल नहीं हैं।)
कैसे हो झारखंड में पर्यावरण संरक्षण
- पौधों की प्रजातियों में बदलाव: यूकेलिप्टस जैसे भूजल सोखने वाले पेड़ों के स्थान पर स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल और तापमान कम करने वाले देशी एवं फलदार पेड़ (जैसे- महुआ, साल, आम, नीम, करंज) ही लगाए जाएं।
- 'सर्वाइवल रेट' (जीवन दर) की अनिवार्यता: केवल पौधे लगाने का लक्ष्य न रखकर, उनके 3 साल तक जीवित रहने की गारंटी और नियमित मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए।
- वॉटर बॉडीज (जल स्रोतों) का पुनरुद्धार: जंगलों और आसपास के क्षेत्रों में चेक डैम, तालाब और पारंपरिक जल स्रोतों का निर्माण व संरक्षण किया जाए ताकि भूगर्भ जलस्तर में सुधार हो सके।
- पेड़ कटाई के नियमों में सख्ती: विकास परियोजनाओं (सड़क और खनन) के नाम पर पुराने और विशाल पेड़ों की कटाई को न्यूनतम किया जाए। यदि कटाई अनिवार्य हो, तो उसकी आनुपातिक भरपाई तुरंत और सही जगह पर हो।
- जन-भागीदारी अभियान: स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय समुदायों को जोड़कर 'हरित पंचायत' या 'हरित विद्यालय' जैसी पहल शुरू की जाए, जिससे जन-जागरूकता बढ़े।
राज्य का ग्रीन कवर बढ़ा
पौधारोपण और संरक्षण की वजह से राज्य के हरियाली वाले क्षेेत्र में वृद्धि हुई है। 2019 से 2023 के बीच राज्य के फारेस्ट कवर या वन क्षेत्र में 155 स्क्वायर किमी की वृद्धि हुई है। जबकि 2021 से 2023 के बीच 44.8 स्क्वायर किमी की वृद्धि हुई है। सेटेलाइट आधारित ये आंकड़े भारत के लेखा एवं महालेखा परीक्षक द्वारा भी सत्यापित किए गए हैं।
खबरें और भी
राज्य में बढ़ रहा तापमान
केंद्र सरकार ने झारखंड को हीट प्रोन स्टेट यानि तापमान की वृद्धि वाले राज्यों की श्रेणी में रखा है। रांची, पूर्वी सिंहभूम, धनबाद, बोकारो, देवघर और गढ़वा जैसे जिलों में पौधरोपण के बाद भी तापमान बढ़ा है।
इसका कारण यह है कि राज्य में फ्लोरा और फोना यानि सैकड़ों साल पुराने वृक्षों को काटा गया है। इसकी भरपाई नए लगे पौधों से नहीं हो सकती है। इस वजह से पौधरोपण की संख्या में बढ़ोतरी के बाद भी पर्यावरण पर उसका तात्कालिक असर नहीं हो रहा है।
राज्य में भूगर्भ जल का स्तर भी कईओ हिस्सों मं 400 फीट तक नीचे चला गया है। बरसात की संभावना में 60 प्रतिशत तक की अनिश्चितता रहती है। हम और आप मिल पेड़ों की चिंता करेंगे, तभी आनेवाली पीढ़ी के लिए पर्यावरण व जल बचा सकेंगे।
राज्य में लाखों की संख्या में पौधे लगाए गए हैं। लेकिन आज से दस साल पहले जो पौधे लगाए गए थे वो यहां की पारिस्थितिकी के लिए सही नहीं थे। जैसे यूकलिप्टस के पौधे बड़ी संख्या में सड़कों के किनारे लगाए गए। इससे जमीन के नीचे का पानी भी सूख गया। अब राज्य सरकार ने यहां की प्रकृति में पनपने वाले पौधे लगाने का निर्देश दिया है। वन विभाग के साथ स्वयंसेवी संस्थाओं, स्कूलों समेत अन्य संस्थानों ने अब ऐसे पौधे लगाने की नीति बनाई है जो गर्मी कम करने में सहायक हो। इसके साथ फलदार पौधे भी लगाए गए हैं। जंगलों में वाटर बाडीज यानि जलस्रोतों के संरक्षण से हरियाली बढ़ाने में सहायता मिल रही है।
-अर्चित आनंद, पर्यावरण एक्टिविस्ट, सचिव पेटसी
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