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    दुकान तोड़ना अधिकारियों की मनमानी कार्रवाई, जमा करें 5.25 लाख; चतरा मामले पर झारखंड हाई कोर्ट का फैसला

    Updated: Wed, 05 Aug 2026 08:18 PM (IST)

    हाई कोर्ट ने चतरा में दुकान तोड़ने को मनमानी कार्रवाई बताते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने एक सप्ताह के भीतर 5.25 लाख रुपये जमा करने ...और पढ़ें

    चतरा में दुकान तोड़ने पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 5.25 लाख रुपये मुआवजे का आदेश।

    चतरा में दुकान तोड़ने पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 5.25 लाख रुपये मुआवजे का आदेश।

    HighLights

    1. झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज की।

    2. दुकान तोड़ने के लिए 5.25 लाख रुपये मुआवजे का आदेश।

    3. चतरा उपायुक्त को राशि जमा करने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी।

    राज्य ब्यूरो, रांची। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने चतरा में एक व्यक्ति की दुकान तोड़े जाने के मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने सरकार को एक सप्ताह के अंदर 5.25 लाख रुपये जमा करने का निर्देश दिया है।

    इस राशि को समय पर जमा कराने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी चतरा के उपायुक्त को दी गई है। मामला राजेंद्र प्रसाद साहू उर्फ राजेंद्र प्रसाद शौंडिक से जुड़ा है। राज्य सरकार ने एकलपीठ के आदेश के खिलाफ अपील दाखिल की थी।

    खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि प्रार्थी की दुकान तोड़ने की कार्रवाई मनमानी थी। अदालत ने कहा कि सरकारी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए बिना कानूनी अधिकार के भवन को तोड़ा गया था।

    खंडपीठ ने एकलपीठ के फैसले में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि एकलपीठ की ओर से तय निर्माण लागत और मुआवजे की राशि काफी कम है। इससे पहले कोर्ट की एकलपीठ ने 27 जून 2024 को मामले में फैसला सुनाया था।

    एकलपीठ ने राज्य सरकार और उसके अधिकारियों की कार्रवाई को मनमाना मानते हुए राजेंद्र प्रसाद साहू को दुकान के निर्माण की लागत के रूप में पांच लाख रुपये और मानसिक पीड़ा के लिए 25 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था।

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    यह राशि छह सप्ताह के भीतर देने को कहा गया था, लेकिन दो साल से अधिक समय बीतने के बाद भी आदेश का पालन नहीं हुआ। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका दाखिल की।

    अपील में सरकार ने दाखिल किया 13 साल पुराना दस्तावेज

    अपील की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पुराने दस्तावेज पेश करने के लिए आवेदन दिया गया। सरकार का दावा था कि जिस जमीन पर दुकान बनी थी, उसका अधिग्रहण वर्ष 1914 में ही कर लिया गया था।

    अदालत ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि वर्ष 2011 से मामला लंबित रहने के बाद 13 वर्षों तक सरकार ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सकी। एकलपीठ के आदेश और अवमानना याचिका दाखिल होने के बाद ये दस्तावेज सामने लाए गए।

    खंडपीठ ने कहा कि पेश किए गए दस्तावेज से भी यह स्पष्ट नहीं होता कि वे विवादित जमीन से ही संबंधित हैं। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि प्रार्थी ने पांच जनवरी 1973 को निबंधित बिक्री विलेख से संपत्ति खरीदी थी और सरकारी रिकार्ड में उसका म्यूटेशन भी किया गया था।

    एकल पीठ ने दोषी अधिकारियों से वसूली करने को कहा था

    हाई कोर्ट ने एकलपीठ की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें सरकार को दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर उनसे 5.25 लाख रुपये की राशि वसूलने की छूट दी गई थी। खंडपीठ ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि अपील उन अधिकारियों की ओर से कराई गई, जिन्हें अपने ऊपर जिम्मेदारी तय होने और मुआवजे की राशि की वसूली होने की आशंका है।

    अदालत ने सरकारी अपील को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग भी बताया। अदालत ने राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर 5.25 लाख रुपये हाई कोर्ट में जमा करने का निर्देश दिया है।

    इसके लिए चतरा के उपायुक्त को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार बनाया गया है। राशि जमा होने के बाद राजेंद्र प्रसाद साहू अपनी पहचान और बैंक खाते का विवरण देकर इसे प्राप्त कर सकेंगे।

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